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Tansen ka jivan parichay: अकबर के नवरत्न, संगीत सम्राट तानसेन

ध्रुपद गायकअकबर के नवरत्नअपडेट: 16 Oct 2026

Tansen ka jivan parichay भारतीय शास्त्रीय संगीत के उस गायक की कहानी है जिसे सदियों से संगीत सम्राट कहा जाता है। ग्वालियर के पास जन्मे रामतनु ने वृंदावन के स्वामी हरिदास से ध्रुपद सीखा, रीवा के राजा रामचंद्र के दरबार में ख्याति पाई और फिर मुग़ल बादशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल हुए।

उनके जीवन के कई प्रसंग इतिहास और किंवदंती के बीच धुंधले हैं, इसलिए तानसेन का जीवन परिचय लिखते समय यह पेज हर उस जगह साफ़ बताता है जहाँ स्रोत अलग अलग बात कहते हैं। आख़िरी हिस्से में आठ दस पंक्तियों वाला उत्तर भी है जिसे सीधे याद किया जा सकता है।

तानसेन का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • बचपन का नाम

    रामतनु (कुछ स्रोतों में तन्ना मिश्र)
  • जन्म

    लगभग सन् 1500 (स्रोतों में 1493 से 1506 के बीच के वर्ष मिलते हैं)
  • जन्म स्थान

    ग्वालियर के पास, परंपरा के अनुसार बेहट गाँव
  • पिता

    मुकुंद मिश्र (मुकुंद राम)
  • गुरु

    स्वामी हरिदास, सूफ़ी संत मुहम्मद ग़ौस का भी प्रभाव
  • आश्रयदाता

    रीवा के राजा रामचंद्र बघेल, फिर बादशाह अकबर
  • उपाधि

    मियाँ, संगीत सम्राट, अकबर के नवरत्नों में एक
  • रचनाएँ / योगदान

    संगीत सार, श्री गणेश स्तोत्र, ध्रुपद पद, मियाँ की तोड़ी और मियाँ की मल्हार जैसे राग
  • मृत्यु

    26 अप्रैल 1589 (अकबरनामा के अनुसार, कुछ इतिहासकार 1586 मानते हैं)
  • समाधि

    ग्वालियर, मुहम्मद ग़ौस के मक़बरे के परिसर में

tansen ka jivan parichay: ग्वालियर में जन्म और आरंभिक वर्ष

तानसेन के जन्म का वर्ष निश्चित नहीं है। अधिकतर इतिहासकार सन् 1500 के आसपास का समय मानते हैं, जबकि अलग अलग पुस्तकों में 1493 से 1506 तक के वर्ष लिखे मिलते हैं। परंपरा के अनुसार उनका जन्म ग्वालियर से कुछ दूर बेहट नामक गाँव में हुआ। बचपन में उनका नाम रामतनु था।

उनके पिता मुकुंद मिश्र (जिन्हें मुकुंद राम भी कहा गया है) ग्वालियर के संपन्न कवि और संगीतप्रेमी थे। ग्वालियर उस समय ध्रुपद गायन का बड़ा केंद्र था, क्योंकि तोमर राजा मानसिंह ने इस शैली को ख़ूब बढ़ावा दिया था। ऐसे माहौल में पले बालक रामतनु की रुचि बहुत जल्दी स्वर और लय की ओर मुड़ गई। कहा जाता है कि वे बचपन में पशु पक्षियों की आवाज़ों की हूबहू नक़ल कर लेते थे।

गुरु स्वामी हरिदास और संगीत की शिक्षा

संगीत की गंभीर शिक्षा के लिए रामतनु वृंदावन गए, जहाँ कृष्णभक्त संत और गायक स्वामी हरिदास से उन्होंने ध्रुपद सीखा। स्वामी हरिदास की गायकी भक्ति से भरी थी और वे किसी दरबार के लिए नहीं, केवल अपने आराध्य के लिए गाते थे। गुरु से तानसेन ने राग की शुद्धता और स्वर साधना की गहराई पाई।

बाद में ग्वालियर लौटकर वे सूफ़ी संत शेख़ मुहम्मद ग़ौस के संपर्क में आए। इस संगति ने उनकी कला में सूफ़ी प्रभाव भी जोड़ा। तानसेन की इच्छा के अनुसार उन्हें इन्हीं संत के मक़बरे के पास दफ़नाया गया। तानसेन नाम उन्हें ग्वालियर के एक शासक से उपाधि के रूप में मिला बताया जाता है।

रीवा से अकबर के दरबार तक

तानसेन ने अपने वयस्क जीवन का बड़ा हिस्सा रीवा (बांधवगढ़) के बघेल राजा रामचंद्र के दरबार में बिताया। राजा स्वयं संगीत के पारखी थे और तानसेन वहाँ के सबसे सम्मानित कलाकार बन गए। उनकी ख्याति दूर दूर तक फैल गई।

सन् 1562 में, जब तानसेन लगभग साठ वर्ष के थे, राजा रामचंद्र ने उन्हें मुग़ल बादशाह अकबर के दरबार में भेज दिया। अकबर उनकी गायकी से इतना प्रभावित हुआ कि उन्हें अपने नवरत्नों में स्थान दिया और मियाँ की उपाधि दी। यह शब्द विद्वान या आदरणीय व्यक्ति के लिए प्रयोग होता था। अबुल फ़ज़ल की आइन-ए-अकबरी में दरबार के गायकों में तानसेन को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है। अकबर के दरबार के दूसरे नवरत्नों में कवि रहीम भी थे।

भारतीय संगीत में योगदान

तानसेन मूल रूप से ध्रुपद गायक थे। ध्रुपद गंभीर, धीमी और शुद्ध स्वर वाली गायन शैली है, जिसमें पद ब्रजभाषा में होते हैं। तानसेन ने अनेक ध्रुपद रचे, जिनमें देवताओं की स्तुति के साथ अपने आश्रयदाताओं की प्रशंसा भी है।

  • नए राग: मियाँ की तोड़ी, मियाँ की मल्हार और दरबारी कान्हड़ा जैसे राग उनके नाम से जुड़े हैं।
  • घराना परंपरा: उनके वंशजों और शिष्यों की परंपरा सेनिया घराना कहलाई, जिससे आगे कई वादन और गायन शैलियाँ निकलीं।
  • हिंदुस्तानी संगीत की पहचान: उत्तर भारत के शास्त्रीय संगीत को दरबारी प्रतिष्ठा दिलाने में उनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है।

प्रमुख रचनाएँ और राग

तानसेन के नाम से दो ग्रंथ प्रसिद्ध हैं और सैकड़ों ध्रुपद पद परंपरा में चले आए हैं। नीचे की तालिका में मुख्य कृतियाँ और उनसे जोड़े जाने वाले राग हैं।

तानसेन की रचनाएँ और उनसे जुड़े राग
रचना / रागप्रकारविशेषता
संगीत सारग्रंथसंगीत के सिद्धांतों पर आधारित ग्रंथ, तानसेन के नाम से मिलता है
श्री गणेश स्तोत्रस्तुति ग्रंथदेव वंदना की परंपरा में रचित
ध्रुपद पदगायन रचनाएँब्रजभाषा में गणेश, सरस्वती, शिव, विष्णु और आश्रयदाता राजाओं की स्तुति
मियाँ की तोड़ीरागतोड़ी राग का प्रसिद्ध रूप, नाम में मियाँ उपाधि जुड़ी है
मियाँ की मल्हाररागवर्षा ऋतु का राग, मेघ मल्हार की किंवदंती से जुड़ा
दरबारी कान्हड़ारागअकबर के दरबार से नाम जुड़ा, गंभीर रात्रिकालीन राग माना जाता है

परिवार और वंश

स्रोतों के अनुसार तानसेन की पत्नी का नाम हुसैनी था। उनके चार पुत्र बताए जाते हैं: सूरतसेन, शरतसेन, तरंग ख़ाँ और बिलास ख़ाँ, और एक पुत्री सरस्वती। सरस्वती का विवाह वीणा वादक मिसरी सिंह से हुआ, जो बाद में नौबत ख़ाँ के नाम से जाने गए। बिलास ख़ाँ के नाम पर राग बिलासख़ानी तोड़ी प्रसिद्ध है। इसी वंश परंपरा से सेनिया घराने का विस्तार हुआ।

समय रेखा

तानसेन के जीवन की अधिकतर तिथियाँ अनुमानित हैं, केवल अकबर के दरबार में आने और निधन के वर्ष समकालीन ग्रंथों से मिलते हैं।

तानसेन: प्रमुख वर्ष और घटनाएँ
वर्ष (लगभग)घटना
1500 के आसपासग्वालियर के निकट जन्म, बचपन का नाम रामतनु
किशोरावस्थावृंदावन जाकर स्वामी हरिदास से ध्रुपद की शिक्षा
युवावस्थाग्वालियर में सूफ़ी संत मुहम्मद ग़ौस के संपर्क में आए
लंबा समयरीवा (बांधवगढ़) के राजा रामचंद्र बघेल के दरबारी गायक
1562राजा रामचंद्र ने उन्हें अकबर के दरबार में भेजा, वहाँ नवरत्नों में स्थान
158926 अप्रैल को निधन (अकबरनामा के अनुसार), ग्वालियर में मुहम्मद ग़ौस के मक़बरे के पास दफ़न

किंवदंतियाँ और रोचक तथ्य

तानसेन के बारे में कई कहानियाँ लोकप्रिय हैं, पर इतिहासकार इन्हें प्रमाणित तथ्य नहीं मानते। फिर भी ये बताती हैं कि जनमानस में उनकी कला का कितना ऊँचा स्थान था।

  • कहा जाता है कि राग दीपक गाने पर दीये अपने आप जल उठते थे और मेघ मल्हार से वर्षा होने लगती थी।
  • बैजू बावरा और तानसेन के बीच संगीत मुक़ाबले की कहानी ख़ूब सुनाई जाती है, लेकिन किसी समकालीन ग्रंथ में इसका उल्लेख नहीं है।
  • ग्वालियर में उनकी समाधि के पास एक इमली का पेड़ है। लोक मान्यता है कि उसकी पत्तियाँ चबाने से आवाज़ मधुर होती है।
  • हर वर्ष दिसंबर में ग्वालियर के हज़ीरा क्षेत्र में उनकी समाधि के पास तानसेन संगीत समारोह होता है, जिसमें देश के बड़े शास्त्रीय कलाकार भाग लेते हैं। इसी अवसर पर तानसेन सम्मान दिया जाता है।

संगीत जगत में तानसेन का स्थान

तानसेन को भारतीय शास्त्रीय संगीत का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। आम बोलचाल में भी किसी अच्छे गायक की तारीफ़ के लिए कहा जाता है कि वह तो तानसेन है। उन्होंने भक्ति संगीत की परंपरा को दरबार तक पहुँचाया और सूफ़ी तथा वैष्णव दोनों धाराओं के मेल से एक समृद्ध गायकी रची। भक्तिकाल के कवियों के बारे में जानने के लिए सूरदास और अन्य कवियों के पेज देखिए। परीक्षा में परिचय लिखने का ढाँचा इस गाइड में है।

tansen ki jivani: बोर्ड उत्तर के रूप में

संगीत सम्राट तानसेन का जन्म लगभग सन् 1500 में ग्वालियर के पास बेहट गाँव में हुआ माना जाता है। उनका बचपन का नाम रामतनु और पिता का नाम मुकुंद मिश्र था। उन्होंने वृंदावन में स्वामी हरिदास से ध्रुपद गायन सीखा और सूफ़ी संत मुहम्मद ग़ौस से भी प्रभावित हुए। लंबे समय तक वे रीवा के राजा रामचंद्र के दरबारी गायक रहे। सन् 1562 में वे अकबर के दरबार में आए और नवरत्नों में शामिल हुए, अकबर ने उन्हें मियाँ की उपाधि दी। संगीत सार और श्री गणेश स्तोत्र उनकी रचनाएँ मानी जाती हैं। मियाँ की तोड़ी, मियाँ की मल्हार और दरबारी कान्हड़ा राग उनके नाम से जुड़े हैं। 26 अप्रैल 1589 को उनका निधन हुआ। ग्वालियर में उनकी समाधि के पास हर वर्ष तानसेन समारोह आयोजित होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

तानसेन का असली नाम क्या था?

तानसेन का बचपन का नाम रामतनु था। तानसेन नाम उन्हें उपाधि के रूप में मिला और बाद में अकबर ने उन्हें मियाँ की उपाधि दी, इसलिए उन्हें मियाँ तानसेन भी कहते हैं।

तानसेन के गुरु कौन थे?

तानसेन के संगीत गुरु वृंदावन के स्वामी हरिदास थे, जिनसे उन्होंने ध्रुपद सीखा। ग्वालियर के सूफ़ी संत मुहम्मद ग़ौस का भी उन पर गहरा प्रभाव था।

तानसेन अकबर के दरबार में कब आए?

सन् 1562 में रीवा के राजा रामचंद्र ने उन्हें अकबर के दरबार में भेजा। उस समय उनकी आयु लगभग साठ वर्ष थी।

तानसेन ने कौन से राग बनाए?

मियाँ की तोड़ी, मियाँ की मल्हार और दरबारी कान्हड़ा तानसेन से जुड़े सबसे प्रसिद्ध राग हैं। राग दीपक से जुड़ी कथाएँ भी उनके नाम से चलती हैं, पर वह राग अब प्रचलित रूप में नहीं मिलता।

तानसेन की समाधि कहाँ है?

तानसेन की समाधि ग्वालियर में उनके सूफ़ी गुरु मुहम्मद ग़ौस के मक़बरे के परिसर में है। यहीं हर वर्ष दिसंबर में तानसेन संगीत समारोह होता है।

क्या तानसेन कवि भी थे?

हाँ, तानसेन ने ब्रजभाषा में ध्रुपद पदों की रचना की, इसलिए उन्हें गायक के साथ पद रचयिता भी माना जाता है। उनके पदों में भक्ति और दरबारी प्रशस्ति दोनों मिलती हैं।