सीधे सामग्री पर जाएँ

Sant ravidas ka jivan parichay: रैदास का जीवन परिचय, पद और संदेश

निर्गुण संतगुरु ग्रंथ साहिबअपडेट: 16 Oct 2026

sant ravidas ka jivan parichay बताता है कि सच्ची भक्ति के लिए न मंदिर की सीढ़ियाँ चाहिए, न तीर्थ की यात्रा; काशी के एक साधारण कारीगर ने अपने काम की जगह बैठे बैठे ही वह पा लिया जिसकी खोज में लोग दूर दूर भटकते हैं। रैदास निर्गुण संत परंपरा के ऐसे कवि हैं जिनकी वाणी में विनम्रता और बराबरी का संदेश सबसे साफ़ सुनाई देता है।

उत्तर भारत में उन्हें रैदास और रविदास, महाराष्ट्र में रोहिदास और बंगाल में रुइदास के नाम से जाना जाता है। कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में उनके दो पद हैं, इसलिए यहाँ उनका जीवन, विचार, रचनाएँ और भाषा उसी क्रम में दी गई हैं जिसमें परीक्षा में लिखी जाती हैं।

संत रैदास का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • नाम

    संत रैदास (रविदास, रोहिदास, रुइदास)
  • जन्म

    सन् 1388 (पाठ्यपुस्तक के अनुसार); परंपरा में माघ पूर्णिमा, संवत् 1433 (सन् 1377)
  • जन्म स्थान

    काशी (वाराणसी), सीर गोवर्धनपुर
  • माता-पिता

    माता कलसा (कलसी) देवी, पिता संतोख दास
  • पत्नी और पुत्र

    लोना देवी; पुत्र विजयदास
  • गुरु

    स्वामी रामानंद (भक्तमाल के अनुसार)
  • काल / धारा

    भक्तिकाल, निर्गुण ज्ञानाश्रयी संत परंपरा
  • रचनाएँ

    स्फुट पद और साखियाँ; 40 पद गुरु ग्रंथ साहिब में; संग्रह रैदास बानी
  • भाषा

    सरल ब्रजभाषा, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्द
  • मृत्यु

    सन् 1518, बनारस (पाठ्यपुस्तक के अनुसार); कुछ मत सन् 1528

रैदास का जीवन परिचय: जन्म, परिवार और काम

कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक के अनुसार रैदास का जन्म सन् 1388 में बनारस में हुआ और देहावसान सन् 1518 में वहीं हुआ। उनके अनुयायी उनकी जयंती माघ पूर्णिमा को मनाते हैं, और एक परंपरा उनका जन्म संवत् 1433 (सन् 1377) में बताती है। कुछ विद्वान इससे भी अलग वर्ष मानते हैं; रैदास के जन्म वर्ष पर विद्वानों में मतभेद है, यह ध्यान रखें। जन्मस्थान वाराणसी के पास सीर गोवर्धनपुर गाँव माना जाता है, जहाँ उनका एक बड़ा मंदिर बना है।

पिता संतोख दास और माता कलसा देवी (कुछ स्रोतों में कलसी) जूते बनाने का काम करते थे। रैदास ने भी यही पैतृक काम अपनाया और जीवन भर नहीं छोड़ा। उनका विवाह लोना देवी से हुआ और पुत्र का नाम विजयदास बताया जाता है। बचपन से ही उनका मन साधु संतों की सेवा में लगता था; जनश्रुति है कि वे अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा साधुओं को जूते और भोजन देने में लगा देते थे।

sant ravidas ka jivan parichay: गुरु, साधना और प्रसिद्धि

नाभादास के भक्तमाल के अनुसार रैदास स्वामी रामानंद के शिष्य थे, और इस नाते कबीर के गुरुभाई माने जाते हैं। दोनों समकालीन थे और दोनों ने निर्गुण राम की भक्ति का प्रचार किया।

रैदास का मानना था कि भक्ति के लिए घर और काम छोड़ना ज़रूरी नहीं। वे अपनी दुकान पर बैठकर काम करते हुए ही भजन गाते थे। इसी से जुड़ी प्रसिद्ध कहावत है 'मन चंगा तो कठौती में गंगा'। लोककथा के अनुसार किसी ने उन्हें गंगा स्नान चलने को कहा, तो उन्होंने काम में व्यस्त होने के कारण मना कर दिया और कहा कि मन शुद्ध हो तो चमड़ा भिगोने की कठौती में भी गंगा है।

उनकी ख्याति काशी से बाहर दूर दूर तक फैली। परंपरा कहती है कि मीराबाई ने उन्हें गुरु माना। मीरा मंदिर परिसर (चित्तौड़) की एक छतरी में रैदास के पदचिह्न अंकित माने जाते हैं। कुछ कथाओं में सिकंदर लोदी से उनकी भेंट का भी उल्लेख है, पर इन प्रसंगों का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता।

रैदास के पद और उनका भाव

कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में रैदास के पद पढ़ाए जाते हैं। उनका सबसे चर्चित पद, जो भक्त और भगवान के अटूट संबंध को दिखाता है, इन पंक्तियों से शुरू होता है:

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग अँग बास समानी॥

भावार्थ: अब राम नाम की रट छूट नहीं सकती। प्रभु चंदन हैं और भक्त पानी; जैसे चंदन के साथ घिसने पर पानी के हर अंश में सुगंध बस जाती है, वैसे ही प्रभु की भक्ति भक्त के रोम रोम में समा गई है। आगे के अंश में घन-मोर, चंद-चकोर, दीपक-बाती, मोती-धागा और सोना-सुहागा की जोड़ियाँ इसी भाव को आगे बढ़ाती हैं।

गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित उनके एक अन्य पद 'ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै' में वे कहते हैं कि प्रभु गरीबों पर कृपा करने वाले हैं, जिन्हें दुनिया नीचा समझती है उन्हें भी वे ऊँचा स्थान देते हैं। इसमें नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना और सैन जैसे संतों का उल्लेख है।

बेगमपुरा: रैदास का आदर्श समाज

रैदास के एक प्रसिद्ध पद में 'बेगमपुरा' नाम के ऐसे नगर का चित्र है जहाँ कोई ग़म नहीं, कोई कर नहीं, कोई डर नहीं और कोई ऊँचा नीचा नहीं। सब लोग बराबर हैं और जहाँ चाहें आ जा सकते हैं। यह कल्पना बताती है कि उनकी भक्ति केवल निजी मुक्ति की नहीं, बल्कि बराबरी वाले समाज की भी चाह रखती थी।

  • ईश्वर निराकार है और हर मनुष्य के भीतर है।
  • जन्म से कोई बड़ा या छोटा नहीं, आचरण से मनुष्य की पहचान होती है।
  • बाहरी पूजा, तीर्थ और व्रत से अधिक मन की पवित्रता ज़रूरी है।
  • अपना काम ईमानदारी से करना भी भक्ति का रूप है।
  • अहंकार छोड़कर विनम्र बनना ही ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता है।

रचनाएँ और वाणी का संकलन

रैदास ने कोई ग्रंथ स्वयं नहीं लिखा। उनके पद और साखियाँ भक्तों के कंठ में सुरक्षित रहीं और बाद में संकलित हुईं।

रैदास की वाणी कहाँ मिलती है
संग्रहरूपविशेषता
गुरु ग्रंथ साहिब40 पद (कुछ गिनती में 41)सिखों के पवित्र ग्रंथ में भगत रविदास की वाणी के रूप में
रैदास बानीपद और साखियाँउनकी उपलब्ध रचनाओं का संग्रह
स्फुट पदगेय पदभजन मंडलियों और लोक परंपरा में प्रचलित

उनके नाम से कई और पद भी मिलते हैं, पर विद्वान गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित पदों को सबसे प्रामाणिक मानते हैं।

भाषा-शैली

रैदास की भाषा सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्द घुले मिले हैं। गुरु ग्रंथ साहिब वाले पदों में पंजाबी का प्रभाव भी दिखता है। उनकी शैली गेय पद शैली है, जिसमें भाव सीधे दिल तक पहुँचता है। कबीर की तरह तीखा व्यंग्य उनके यहाँ कम है; उसकी जगह दीनता, आत्मनिवेदन और करुणा है। दृष्टांत, उपमा और रूपक अलंकार बहुत स्वाभाविक ढंग से आते हैं, जैसे चंदन-पानी और दीपक-बाती की जोड़ियाँ।

समय रेखा और रोचक तथ्य

रैदास: मुख्य वर्ष
वर्षघटना
सन् 1388 (पाठ्यपुस्तक) / सन् 1377 (परंपरा)काशी में जन्म
युवावस्थालोना देवी से विवाह, पैतृक काम के साथ भक्ति
बाद के वर्षरामानंद की शिष्य परंपरा, उत्तर भारत में ख्याति
सन् 1518 (पाठ्यपुस्तक)बनारस में देहावसान
  • उनकी जयंती माघ पूर्णिमा को पूरे देश में मनाई जाती है।
  • सीर गोवर्धनपुर (वाराणसी) में उनका जन्मस्थान मंदिर प्रमुख तीर्थ है।
  • उनके अनुयायियों का एक समुदाय रविदासिया कहलाता है।

साहित्य में स्थान

निर्गुण संत काव्य में कबीर के बाद रैदास का नाम सबसे आदर से लिया जाता है। जहाँ कबीर आडंबर पर चोट करते हैं, वहाँ रैदास प्रेम और दीनता से वही बात कहते हैं। उन्होंने साधारण कामकाजी लोगों को यह विश्वास दिया कि भक्ति पर सबका बराबर अधिकार है। गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान मिलना उनकी वाणी के व्यापक प्रभाव का प्रमाण है।

रैदास का कवि परिचय: उत्तर पुस्तिका के लिए

रैदास पर प्रश्न छोटा हो या बड़ा, नीचे के बिंदु क्रम से लिखने पर कोई ज़रूरी बात नहीं छूटती; इस अंश का प्रिंट भी लिया जा सकता है।

जीवन परिचय: संत रैदास का जन्म सन् 1388 में काशी (बनारस) में माना जाता है; परंपरा माघ पूर्णिमा, संवत् 1433 बताती है। पिता संतोख दास और माता कलसा देवी थीं। उन्होंने पैतृक काम करते हुए भक्ति की। पत्नी लोना देवी थीं। वे स्वामी रामानंद के शिष्य और कबीर के समकालीन थे। परंपरा के अनुसार मीराबाई ने उन्हें गुरु माना। सन् 1518 में बनारस में उनका देहावसान हुआ।
रचनाएँ: स्फुट पद और साखियाँ; 40 पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित।
भाषा-शैली: सरल ब्रजभाषा, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्द; गेय पद शैली।
साहित्य में स्थान: निर्गुण संत परंपरा के प्रमुख कवि और समता के संदेशवाहक।

संत कवियों पर लंबा उत्तर तैयार करने में लेखन विधि वाला पन्ना सहायक रहेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

संत रविदास का जीवन परिचय: उनका जन्म सन् 1388 है या 1377?

कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक सन् 1388 देती है, वही लिखें। परंपरा में माघ पूर्णिमा, संवत् 1433 (सन् 1377) का मत भी है, इसलिए मतभेद का उल्लेख कर सकते हैं।

रविदास जी का जीवन परिचय में माता-पिता के नाम क्या हैं?

पिता संतोख दास और माता कलसा देवी। कुछ स्रोतों में माता का नाम कलसी लिखा मिलता है।

रैदास और रविदास एक ही व्यक्ति हैं क्या?

हाँ। संत रैदास का जीवन परिचय और रविदास का जीवन परिचय एक ही संत का है। अलग अलग प्रदेशों में उन्हें रोहिदास और रुइदास भी कहा जाता है।

मन चंगा तो कठौती में गंगा का अर्थ क्या है?

यदि मन पवित्र है तो घर के बर्तन में रखा पानी भी गंगा जितना पवित्र है। यह कहावत रैदास से जुड़ी है और बताती है कि बाहरी तीर्थ से अधिक मन की शुद्धता ज़रूरी है।

ravidas ji ka jivan parichay में उनकी रचनाएँ क्या लिखें?

उन्होंने स्फुट पद और साखियाँ कहीं, जिनमें से 40 पद गुरु ग्रंथ साहिब में हैं। sant ravidas ji ka jivan parichay में रैदास बानी का नाम भी लिख सकते हैं।

raidas ka jivan parichay में गुरु का नाम क्या है?

भक्तमाल के अनुसार स्वामी रामानंद। ravidas ka jivan parichay या sant ravidas ki jivani लिखते समय यह भी जोड़ें कि वे कबीर के समकालीन थे।

रैदास जैसे दूसरे संत कवि कौन हैं?

कबीर, दादू और नानक निर्गुण धारा के, जबकि तुलसीदास और सूरदास सगुण धारा के प्रमुख कवि हैं। पूरी सूची कवि परिचय पर है।