aryabhatt ka jivan parichay लिखना बाकी लोगों से अलग है, क्योंकि उनके जीवन के बारे में लगभग सारी पक्की जानकारी उनकी अपनी पुस्तक आर्यभटीय के एक श्लोक और बाद के टीकाकारों से मिलती है। फिर भी पंद्रह सौ साल पहले लिखे उनके गणित और खगोल विज्ञान ने भारत की वैज्ञानिक परंपरा को नई दिशा दी।
इस पृष्ठ पर आर्यभट्ट का जीवन परिचय, यानी aryabhatta ka jivan parichay या aryabhata ka jivan parichay, तीन हिस्सों में है: पहले जन्म, स्थान और नाम से जुड़े प्रमाण और मतभेद, फिर आर्यभटीय की बनावट, और अंत में उनकी खोजें जिन्हें स्कूली उदाहरणों से समझाया गया है।

मुख्य बातें
नाम
आर्यभट (प्रचलित रूप आर्यभट्ट)जन्म
सन् 476 ई. (आर्यभटीय के कथन के आधार पर); स्थान पर विद्वानों में मतभेद हैकार्यस्थल
कुसुमपुर (पाटलिपुत्र, वर्तमान पटना के पास)काल
गुप्त कालरचनाएँ
आर्यभटीय (499 ई., 121 श्लोक), आर्य सिद्धांत (अब पूरी उपलब्ध नहीं)योगदान
पाई का मान 3.1416, पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना, ग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या, ज्या सारणी, स्थानीय मान पर आधारित गणनामृत्यु
लगभग 550 ई. (मान्य अनुमान, पक्का प्रमाण उपलब्ध नहीं)स्मृति
भारत का पहला उपग्रह आर्यभट (19 अप्रैल 1975)
aryabhatt ka jivan parichay: जन्म वर्ष कैसे पता चला
आर्यभट ने आर्यभटीय के कालक्रियापाद में बताया है कि जब कलियुग के 3600 वर्ष बीत चुके थे, तब उनकी आयु 23 वर्ष थी। गणना करने पर कलियुग के 3600 वर्ष पूरे होने का समय सन् 499 ई. आता है। इसका अर्थ है कि उनका जन्म 499 में से 23 घटाकर लगभग सन् 476 ई. में हुआ। अधिकतर पाठ्यपुस्तकें यही वर्ष मानती हैं।
कुछ विद्वान इस श्लोक का अर्थ यह भी लेते हैं कि 499 ई. ग्रंथ की रचना का वर्ष है, न कि केवल आयु बताने का संकेत। दोनों ही व्याख्याओं में 476 ई. का जन्म वर्ष लगभग वही रहता है। मृत्यु के बारे में कोई सीधा प्रमाण नहीं मिलता, इसलिए सामान्यतः लगभग 550 ई. लिखा जाता है।
जन्म स्थान और नाम पर मतभेद
आर्यभट ने लिखा है कि वे कुसुमपुर में प्रचलित ज्ञान का वर्णन कर रहे हैं। कुसुमपुर को पाटलिपुत्र माना जाता है, जो उस समय गुप्त साम्राज्य का प्रमुख नगर और शिक्षा का केंद्र था। इसलिए उनका कार्यक्षेत्र पाटलिपुत्र माना जाता है।
जन्म स्थान पर विद्वानों में मतभेद है। उनके टीकाकार भास्कर प्रथम ने उन्हें अश्मक का बताया है, जिससे कुछ लोग दक्षिण भारत के अश्मक प्रदेश को जन्म स्थान मानते हैं। केरल में उनकी परंपरा के गहरे प्रभाव के कारण कुछ विद्वान केरल से भी संबंध जोड़ते हैं। कुछ लेखक उन्हें नालंदा से जोड़ते हैं, पर इसका पक्का प्रमाण नहीं है।
आर्यभट या आर्यभट्ट?
पुराने ग्रंथों में नाम आर्यभट लिखा मिलता है और विद्वान यही रूप सही मानते हैं। बोलचाल और कई किताबों में आर्यभट्ट रूप चल पड़ा, इसलिए आर्यभट जीवन परिचय और आर्यभट्ट जीवन परिचय दोनों एक ही व्यक्ति के बारे में हैं।
आर्यभटीय: छोटा ग्रंथ, बड़ा प्रभाव
आर्यभटीय संस्कृत के छंदों में लिखा गया है और इसमें कुल 121 श्लोक हैं। श्लोकों में लिखने से विद्यार्थी इसे याद रख सकते थे। ग्रंथ चार भागों में बँटा है, जिन्हें पाद कहा जाता है।
| पाद | श्लोक | विषय |
|---|---|---|
| गीतिकापाद | 13 | बड़ी संख्याएँ लिखने की अक्षर पद्धति, समय की बड़ी इकाइयाँ, ज्या सारणी |
| गणितपाद | 33 | वर्गमूल, घनमूल, क्षेत्रफल, श्रेणियाँ, समीकरण |
| कालक्रियापाद | 25 | समय की गणना, ग्रहों की गति |
| गोलपाद | 50 | आकाशीय गोला, पृथ्वी का घूमना, ग्रहण |
खोजें जिन्हें विद्यार्थी आसानी से समझ सकते हैं
1. पाई का मान
आर्यभट ने एक नियम दिया जिससे 20,000 व्यास वाले वृत्त की परिधि लगभग 62,832 आती है। भाग देने पर पाई का मान 3.1416 मिलता है, जो चार दशमलव स्थान तक सही है। उन्होंने इसे आसन्न यानी लगभग मान कहा, जिससे कुछ विद्वान मानते हैं कि उन्हें आभास था कि पाई का ठीक ठीक मान भिन्न के रूप में नहीं लिखा जा सकता।
2. पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है
उन्होंने समझाया कि तारे पश्चिम की ओर जाते हुए इसलिए दिखते हैं क्योंकि पृथ्वी स्वयं घूमती है। इसके लिए उन्होंने नाव का उदाहरण दिया: चलती नाव में बैठे व्यक्ति को किनारे की स्थिर चीजें उलटी दिशा में जाती दिखती हैं। स्कूल की भूगोल और विज्ञान की पुस्तकों में दिन और रात का कारण इसी घूर्णन से समझाया जाता है।
3. ग्रहण का असली कारण
उस समय ग्रहण को राहु और केतु से जोड़ा जाता था। आर्यभट ने बताया कि चंद्र ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में आता है, और सूर्य ग्रहण तब जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आता है। उन्होंने यह भी कहा कि चंद्रमा और ग्रह सूर्य के प्रकाश से चमकते हैं।
4. ज्या सारणी और गणना की विधियाँ
त्रिकोणमिति में जिसे आज साइन कहते हैं, उसके लिए आर्यभट ने ज्या की सारणी दी। उन्होंने स्थानीय मान वाली दशमलव पद्धति का उपयोग करके वर्गमूल और घनमूल निकालने की विधियाँ बताईं और कुट्टक नाम की विधि दी, जिससे ऐसे समीकरण हल होते हैं जिनके उत्तर पूर्ण संख्याएँ हों।
भारतीय विज्ञान में आर्यभट का स्थान
आर्यभट के बाद भास्कर प्रथम, ब्रह्मगुप्त और आगे के कई गणितज्ञों ने उनके कार्य पर चर्चा की, टीकाएँ लिखीं या उनसे असहमति जताई। दसवीं सदी के विद्वान अल बीरूनी ने भी आर्यभट के अनुयायियों के विचारों का उल्लेख किया। केरल की गणित परंपरा में उनके ग्रंथ सदियों तक पढ़ाए गए।
भारत ने अपना पहला उपग्रह 19 अप्रैल 1975 को छोड़ा और उसका नाम आर्यभट रखा। यह सम्मान बताता है कि देश अपनी वैज्ञानिक परंपरा का आरंभ किसे मानता है। आधुनिक युग के गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन और मिसाइल वैज्ञानिक डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की कहानियाँ भी इस विषय में रुचि बढ़ाती हैं। गुप्त काल के महाकवि कालिदास का परिचय भी उसी युग की झलक देता है।
समय रेखा (अनुमानित)
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| लगभग 476 ई. | जन्म |
| 499 ई. | 23 वर्ष की आयु, आर्यभटीय से जुड़ा वर्ष |
| लगभग 550 ई. | मृत्यु (अनुमान) |
| 629 ई. | भास्कर प्रथम की टीका |
| 1975 | भारत के पहले उपग्रह का नाम आर्यभट |
आर्यभट्ट का जीवन परिचय: उत्तर लिखने का नमूना
आर्यभट प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे।
आर्यभटीय के अनुसार 499 ई. में उनकी आयु 23 वर्ष थी, अतः उनका जन्म 476 ई. माना जाता है।
उनका कार्यक्षेत्र कुसुमपुर (पाटलिपुत्र) था, जन्म स्थान पर विद्वानों में मतभेद है।
उनकी प्रसिद्ध रचना आर्यभटीय है, जिसमें 121 श्लोक और चार पाद हैं।
उन्होंने पाई का मान 3.1416 बताया।
उन्होंने कहा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है।
उन्होंने ग्रहण को छाया से समझाया और बताया कि चंद्रमा सूर्य के प्रकाश से चमकता है।
उन्होंने ज्या सारणी और वर्गमूल, घनमूल की विधियाँ दीं।
उनकी मृत्यु लगभग 550 ई. मानी जाती है।
भारत का पहला उपग्रह (1975) उनके नाम पर रखा गया।
यह नमूना छापकर अभ्यास करने योग्य है। उत्तर के शीर्षक और क्रम के लिए जीवन परिचय लेखन का तरीका देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
आर्यभट का जन्म कब हुआ था?
पाठ्यपुस्तकों में उनका जन्म 476 ई. माना जाता है। यह वर्ष आर्यभटीय के उस श्लोक से निकाला गया है जिसमें वे बताते हैं कि 499 ई. के आसपास उनकी आयु 23 वर्ष थी।
आर्यभटीय में कितने श्लोक हैं?
आर्यभटीय में कुल 121 श्लोक हैं। ये चार पादों में बँटे हैं: गीतिकापाद 13, गणितपाद 33, कालक्रियापाद 25 और गोलपाद 50।
क्या आर्यभट ने शून्य की खोज की थी?
आर्यभट ने स्थानीय मान वाली दशमलव पद्धति के आधार पर गणनाएँ कीं, जिसमें शून्य की धारणा निहित है। पर शून्य के लिए अलग चिह्न का प्रयोग उनके ग्रंथ में सीधे नहीं मिलता, इसलिए शून्य की खोज का पूरा श्रेय केवल उन्हें देने पर विद्वानों में मतभेद है।
आर्यभट ने पाई का क्या मान दिया?
उन्होंने पाई का मान लगभग 3.1416 बताया, जो 62,832 को 20,000 से भाग देने पर आता है। यह चार दशमलव स्थान तक सही है।
आर्यभट की मृत्यु कब हुई?
उनकी मृत्यु का कोई पक्का लिखित प्रमाण नहीं है। सामान्यतः लगभग 550 ई. मानी जाती है।
भारत के पहले उपग्रह का नाम आर्यभट क्यों रखा गया?
आर्यभट को भारतीय गणित और खगोल विज्ञान की परंपरा का प्रमुख आरंभकर्ता माना जाता है। उनके सम्मान में 19 अप्रैल 1975 को छोड़े गए पहले भारतीय उपग्रह का नाम आर्यभट रखा गया।