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Raskhan ka jivan parichay: कृष्णभक्त कवि रसखान का जीवन परिचय

कृष्णभक्तिसवैया छंदअपडेट: 16 Oct 2026

raskhan ka jivan parichay की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ब्रज और कृष्ण पर सबसे रसीले सवैये लिखने वाला कवि मूल रूप से सैयद इब्राहीम नाम का एक मुस्लिम युवक था। रसखान ने अपना पूरा जीवन ब्रजभूमि और गोकुल के ग्वालों के प्रति प्रेम में बिता दिया और कहा कि अगला जन्म मिले तो इसी धरती पर मिले।

कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में रसखान के सवैये पढ़ाए जाते हैं, इसलिए यहाँ उनका जीवन, रचनाएँ, काव्य की विशेषताएँ और भाषा-शैली उसी ज़रूरत को ध्यान में रखकर समझाई गई हैं। उनके जीवन की तिथियाँ अनुमान पर आधारित हैं, इसलिए जहाँ मतभेद है वहाँ दोनों बातें दी गई हैं।

रसखान का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • मूल नाम

    सैयद इब्राहीम
  • उपनाम

    रसखान (रस की खान)
  • जन्म

    सन् 1548 के आसपास (अनुमानित); अन्य मत भी हैं
  • जन्म स्थान

    दिल्ली के आसपास; कुछ विद्वान पिहानी (हरदोई, उत्तर प्रदेश) मानते हैं
  • गुरु

    गोस्वामी विट्ठलनाथ (पुष्टिमार्ग)
  • काल / धारा

    भक्तिकाल, सगुण कृष्णभक्ति
  • रचनाएँ

    सुजान रसखान, प्रेमवाटिका; दानलीला, अष्टयाम भी उनके नाम से
  • भाषा

    सरस ब्रजभाषा
  • मृत्यु

    सन् 1628 के आसपास, ब्रज में; समाधि महावन (मथुरा के पास)

सैयद इब्राहीम से रसखान: नाम की कहानी

रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहीम माना जाता है। 'रसखान' उनका काव्य नाम है, जिसका अर्थ है रस की खान। यह नाम उनके काव्य पर पूरी तरह खरा उतरता है, क्योंकि उनके हर छंद में प्रेम रस छलकता है। अपने सवैयों में वे स्वयं को 'रसखानि' कहते हैं। कुछ विद्वान 'खान' को पठान परिवार की उपाधि से जोड़ते हैं।

उनके जीवन की सबसे पुरानी जानकारी पुष्टिमार्ग के वार्ता ग्रंथ 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता' से मिलती है, जिसमें गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्यों के जीवन प्रसंग हैं। शिवसिंह सरोज जैसे बाद के ग्रंथ भी उनके बारे में बताते हैं।

raskhan ka jivan parichay: जीवन यात्रा क्रम से

  1. जन्म: कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक के अनुसार रसखान का जन्म सन् 1548 में माना जाता है और वे दिल्ली के आसपास के रहने वाले थे। कुछ इतिहासकार उनका जन्मस्थान हरदोई जिले का पिहानी बताते हैं और कुछ अन्य वर्ष भी सुझाते हैं; इस विषय पर विद्वान एकमत नहीं हैं।
  2. संपन्न परिवार: वे एक संपन्न परिवार में पले और फ़ारसी तथा हिंदी दोनों का ज्ञान रखते थे।
  3. मन का परिवर्तन: वार्ता में कथा है कि पहले वे एक लौकिक प्रेम में डूबे थे। बाद में श्रीनाथ जी के चित्र या भागवत कथा के प्रभाव से उनका प्रेम कृष्ण की ओर मुड़ गया। ये प्रसंग जनश्रुति हैं, पर इतना निश्चित है कि लौकिक प्रेम ही आगे चलकर अलौकिक प्रेम बना।
  4. दीक्षा: ब्रज पहुँचकर उन्होंने वल्लभाचार्य के पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ से पुष्टिमार्ग की दीक्षा ली।
  5. ब्रज में जीवन: इसके बाद उन्होंने पूरा जीवन वृंदावन और गोकुल के आसपास कृष्ण लीला गाने में बिताया।
  6. देहांत: लगभग सन् 1628 में ब्रज में ही उनका देहांत हुआ। मथुरा के पास महावन में उनकी समाधि बनी है।

रचनाएँ

रसखान की रचनाएँ
रचनाछंद / रूपविषय
सुजान रसखानसवैया, कवित्त, दोहा, सोरठाकृष्ण का रूप, लीला, ब्रज प्रेम और भक्ति; सबसे प्रसिद्ध संग्रह
प्रेमवाटिकादोहे (लगभग 53)प्रेम के स्वरूप और महत्व का दार्शनिक वर्णन
दानलीलापद / छंदराधा-कृष्ण के दान प्रसंग का वर्णन
अष्टयामदोहेकृष्ण की दिनचर्या के आठ पहर

सुजान रसखान और प्रेमवाटिका उनकी प्रामाणिक और मुख्य रचनाएँ हैं; परीक्षा में इन्हीं दो के नाम पहले लिखें। कहा जाता है कि उन्होंने भागवत का फ़ारसी में अनुवाद भी किया, पर यह प्रमाणित नहीं है।

ब्रज के लिए अगला जन्म: प्रसिद्ध सवैया

कक्षा 9 में पढ़ाया जाने वाला पहला सवैया रसखान के ब्रज प्रेम का सबसे सुंदर उदाहरण है:

मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥

भावार्थ: कवि कहता है कि यदि मनुष्य बनूँ तो गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच रहूँ, और यदि पशु बनूँ तो नंद की गायों के साथ चरूँ। आगे के अंश में वे गोवर्धन का पत्थर और यमुना किनारे कदंब की डाल पर बसेरा करने वाला पक्षी बनने की इच्छा भी जताते हैं। ब्रज की हर वस्तु से कृष्ण का संबंध है, इसलिए कवि को हर रूप में वहीं रहना स्वीकार है।

काव्य की विशेषताएँ

  • प्रेम ही भक्ति: रसखान के लिए भक्ति का अर्थ ज्ञान या कर्मकांड नहीं, केवल प्रेम है। प्रेमवाटिका में उन्होंने प्रेम को सबसे बड़ा तत्त्व बताया।
  • रूप माधुरी: कृष्ण की मुरली, मोर मुकुट, पीतांबर और लकुटी कामरिया का वर्णन बहुत आकर्षक है।
  • ब्रज भूमि का प्रेम: करील के कुंज, यमुना तट और ग्वाल बाल उनके काव्य में बार बार आते हैं।
  • गोपियों का प्रेम: कई सवैयों में गोपियाँ कृष्ण के रूप पर मोहित होकर लोक लाज भूल जाती हैं।

भाषा-शैली

रसखान की भाषा शुद्ध, सरल और प्रवाहपूर्ण ब्रजभाषा है, जिसमें कहीं भी बनावट नहीं लगती। उन्होंने फ़ारसी जानते हुए भी ब्रज के ठेठ शब्दों को अपनाया। सवैया छंद पर उनका ऐसा अधिकार था कि सवैया और रसखान लगभग पर्याय माने जाते हैं। कवित्त और दोहे भी उन्होंने लिखे। शैली मुक्तक है, जिसमें हर छंद अपने में पूर्ण चित्र है। श्रृंगार और भक्ति रस प्रधान हैं, और अनुप्रास, यमक, रूपक तथा उपमा अलंकार बिना प्रयास के आ जाते हैं। माधुर्य गुण उनके छंदों की पहचान है।

साहित्य में स्थान

कृष्णभक्ति शाखा में सूरदास और मीराबाई के साथ रसखान का नाम आदर से लिया जाता है। वे इस बात का उदाहरण हैं कि भक्ति और प्रेम किसी एक संप्रदाय या जन्म से बँधे नहीं होते। रहीम की तरह उन्होंने भी हिंदी कविता को समृद्ध किया और ब्रजभाषा के सवैयों को सबसे लोकप्रिय बनाया। रीतिकाल के अनेक कवियों ने सवैया शैली में उन्हीं का अनुसरण किया।

रसखान: याद करने योग्य संक्षिप्त परिचय

रसखान का परिचय प्रायः छोटा ही पूछा जाता है, इसलिए नीचे के अनुच्छेद में केवल वे बातें रखी गई हैं जिन पर अंक मिलते हैं। पन्ना छपाई के अनुकूल है।

जीवन परिचय: कृष्णभक्त कवि रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहीम था। उनका जन्म सन् 1548 के आसपास दिल्ली के निकट माना जाता है; कुछ विद्वान पिहानी (हरदोई) को जन्मस्थान बताते हैं। वे संपन्न परिवार से थे। कृष्ण प्रेम जागने पर वे ब्रज आए और गोस्वामी विट्ठलनाथ से पुष्टिमार्ग की दीक्षा ली। जीवन भर ब्रज में रहे और लगभग सन् 1628 में वहीं देह त्यागी।
रचनाएँ: सुजान रसखान, प्रेमवाटिका, दानलीला, अष्टयाम।
भाषा-शैली: सरल ब्रजभाषा, मुक्तक शैली, सवैया और कवित्त छंद, श्रृंगार और भक्ति रस।
साहित्य में स्थान: सवैया छंद के अद्वितीय कवि और कृष्णभक्ति के श्रेष्ठ गायक।

सवैयों वाले कवि का परिचय किस क्रम में लिखें, इसके लिए लेखन सहायक पृष्ठ खोलें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

रसखान का असली नाम क्या था?

रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहीम माना जाता है। रसखान उनका काव्य नाम है, जिसका अर्थ है रस की खान।

रसखान का जीवन परिचय में जन्म कब और कहाँ लिखें?

सन् 1548 के आसपास, दिल्ली के निकट। यह अनुमानित तिथि है; कुछ विद्वान पिहानी (हरदोई) को जन्मस्थान और अन्य वर्षों को जन्म वर्ष मानते हैं।

raskhan ji ka jivan parichay में रसखान के गुरु कौन बताए जाते हैं?

वल्लभाचार्य के पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ। उन्हीं से रसखान ने पुष्टिमार्ग की दीक्षा ली थी।

रसखान किस छंद के लिए प्रसिद्ध हैं?

सवैया छंद के लिए। सुजान रसखान में उनके सवैये और कवित्त संकलित हैं, जो ब्रजभाषा के सबसे मधुर छंदों में गिने जाते हैं।

प्रेमवाटिका में क्या है?

प्रेमवाटिका दोहों की छोटी रचना है, जिसमें प्रेम के स्वरूप, उसकी कठिनाई और उसके महत्व को समझाया गया है। रसखान इसमें प्रेम को ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं।

रसखान की मृत्यु कब हुई?

लगभग सन् 1628 में, ब्रज में। मथुरा के पास महावन में उनकी समाधि है। ब्रज के दूसरे भक्त कवियों तक पहुँचने के लिए कवि परिचय वाली तालिका खोलें।