Ayodhya singh upadhyay hariaudh ka jivan parichay पढ़ने पर सबसे पहले यह ध्यान खींचता है कि जिन दिनों कविता की भाषा ब्रजभाषा मानी जाती थी, उन्हीं दिनों इस कवि ने खड़ी बोली में पूरा महाकाव्य लिखकर दिखा दिया। उनका प्रियप्रवास खड़ी बोली हिंदी का पहला सफल महाकाव्य माना जाता है।
अयोध्या सिंह उपाध्याय का जीवन परिचय बोर्ड परीक्षाओं में अक्सर पूछा जाता है। हरिऔध उनका उपनाम था। उन्होंने भारतेन्दु युग के अंत से लेकर छायावाद तक लगातार लिखा, और कविता के साथ उपन्यास, नाटक, आलोचना और संपादन में भी काम किया। नीचे उनका जीवन, रचनाएँ, भाषा-शैली तथा याद करने योग्य संक्षिप्त उत्तर इसी क्रम में रखे गए हैं।

मुख्य बातें
पूरा नाम
अयोध्यासिंह उपाध्याय, उपनाम 'हरिऔध'जन्म
15 अप्रैल 1865जन्म स्थान
निज़ामाबाद, ज़िला आज़मगढ़ (उत्तर प्रदेश)माता-पिता
रुक्मिणी देवी, पंडित भोलानाथ उपाध्याययुग
द्विवेदी युग (भारतेन्दु युग से छायावाद तक सक्रिय)भाषा
खड़ी बोली और ब्रजभाषाप्रमुख रचनाएँ
प्रियप्रवास, वैदेही वनवास, चोखे चौपदे, चुभते चौपदे, रसकलशसम्मान
प्रियप्रवास पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक, विद्यावाचस्पति की उपाधि, 1924 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापतिमृत्यु
16 मार्च 1947, निज़ामाबाद
ayodhya singh upadhyay hariaudh ka jivan parichay: जन्म, शिक्षा और नौकरी
अयोध्यासिंह उपाध्याय का जन्म 15 अप्रैल 1865 को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के निज़ामाबाद क़स्बे में हुआ। उनके पिता पंडित भोलानाथ उपाध्याय और माता रुक्मिणी देवी थीं। पाँच वर्ष की आयु में उन्होंने अपने चाचा से फ़ारसी पढ़ना शुरू किया।
निज़ामाबाद से मिडिल उत्तीर्ण करके वे आगे पढ़ने के लिए काशी के क्वींस कॉलेज गए, पर ख़राब स्वास्थ्य के कारण पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी। इसके बाद उन्होंने घर पर ही संस्कृत, उर्दू, फ़ारसी, बांग्ला और अंग्रेज़ी का अच्छा अध्ययन किया। यही बहुभाषी पृष्ठभूमि आगे चलकर उनकी भाषा की विविधता का आधार बनी।
सन् 1883 में वे निज़ामाबाद के मिडिल स्कूल में प्रधानाध्यापक बने। लगभग 1890 में क़ानूनगो की परीक्षा पास करके वे राजस्व विभाग में क़ानूनगो हो गए और लंबे समय तक इसी पद पर रहे। सरकारी सेवा से अवकाश लेने के बाद उन्होंने बनारस के हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाने का काम बिना वेतन लिए किया। इस काम के वर्षों को लेकर स्रोतों में थोड़ा अंतर है। जीवन के अंतिम वर्ष वे निज़ामाबाद लौट आए और 16 मार्च 1947 को वहीं उनका निधन हुआ।
साहित्यिक परिचय
हरिऔध ने लगभग 1890 के आसपास लिखना शुरू किया। उनका रचनाकाल इतना लंबा है कि उसमें भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग और छायावाद तीनों आ जाते हैं। आरंभ में उन्होंने ब्रजभाषा में कविता की, फिर आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के समय खड़ी बोली को काव्य भाषा बनाने के आंदोलन में पूरी शक्ति से जुड़ गए।
उनकी सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने सिद्ध किया कि खड़ी बोली में भी लंबा, गंभीर और रसपूर्ण प्रबंध काव्य रचा जा सकता है। प्रियप्रवास ने यह काम किया। दूसरी ओर चोखे चौपदे और चुभते चौपदे में उन्होंने आम बोलचाल और मुहावरों की भाषा को कविता में उतारा। कबीर की वाणी का संपादन करके उन्होंने आलोचना और शोध में भी योगदान दिया। सन् 1924 में वे हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन के सभापति बने और उन्हें विद्यावाचस्पति की उपाधि मिली।
प्रमुख रचनाएँ
हरिऔध ने पद्य और गद्य दोनों में विपुल लेखन किया। परीक्षा के लिए प्रियप्रवास, वैदेही वनवास, चोखे चौपदे और रसकलश अवश्य याद रखें।
| रचना | विधा | विशेषता |
|---|---|---|
| प्रियप्रवास | महाकाव्य | खड़ी बोली का पहला सफल महाकाव्य, सत्रह सर्ग, कृष्ण के ब्रज छोड़ने के बाद की विरह कथा |
| वैदेही वनवास | प्रबंध काव्य | राम द्वारा सीता के त्याग और वनवास की करुण कथा |
| चोखे चौपदे, चुभते चौपदे | मुक्तक | बोलचाल की मुहावरेदार हिंदी में चार पंक्तियों के छंद |
| रसकलश | रीति ग्रंथ | ब्रजभाषा में रस और नायिका भेद का निरूपण |
| पारिजात, बोलचाल, कल्पलता | काव्य संग्रह | अलग अलग विषयों की फुटकर कविताएँ |
| ठेठ हिंदी का ठाट, अधखिला फूल | उपन्यास | सरल ठेठ हिंदी में लिखे गए आरंभिक उपन्यास |
| रुक्मिणी परिणय, प्रद्युम्न विजय व्यायोग | नाटक | पौराणिक कथानक पर आधारित |
| हिंदी भाषा और साहित्य का विकास | इतिहास और आलोचना | भाषा और साहित्य के विकास का अध्ययन |
| कबीर वचनावली | संपादन | कबीर की वाणी का संपादित संकलन, विस्तृत भूमिका सहित |
प्रियप्रवास: खड़ी बोली का पहला महाकाव्य
प्रियप्रवास की रचना 1909 से 1913 के बीच हुई और यह 1914 में प्रकाशित हुआ। इसका आधार श्रीमद्भागवत का दशम स्कंध है, पर कवि ने कथा को अपने ढंग से नया रूप दिया। सत्रह सर्गों के इस काव्य में अक्रूर के आने, कृष्ण के मथुरा जाने और फिर उद्धव के ब्रज आने तक की कथा है। पूरा काव्य संस्कृत के वर्णिक छंदों में अतुकांत शैली में लिखा गया है।
इसकी शुरुआत संध्या के सुंदर चित्र से होती है:
दिवस का अवसान समीप था।
गगन था कुछ लोहित हो चला।
प्रियप्रवास की राधा केवल विरहिणी नहीं है। वह अपने दुख से ऊपर उठकर लोक कल्याण की कामना करती है। उसकी यह पंक्ति बहुत प्रसिद्ध है:
प्यारे जीवें जगहित करें, गेह चाहे न आवें।
इस तरह कृष्ण और राधा दोनों को कवि ने लोकसेवक के रूप में प्रस्तुत किया, जो रीतिकालीन श्रृंगारी चित्रण से बिलकुल अलग दृष्टि थी। इसी कृति पर उन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक मिला।
भाषा-शैली
हरिऔध की भाषा के कई रूप मिलते हैं, इसलिए उन्हें भाषा पर असाधारण अधिकार रखने वाला कवि कहा जाता है।
- संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली: प्रियप्रवास और वैदेही वनवास में तत्सम शब्दों से भरी, समासयुक्त, गंभीर भाषा।
- बोलचाल की मुहावरेदार हिंदी: चोखे चौपदे और चुभते चौपदे में सरल, चुटीली, आम जीवन से जुड़ी भाषा।
- ब्रजभाषा: रसकलश में पुरानी काव्य परंपरा की मधुर ब्रजभाषा।
- छंद: संस्कृत के वर्णिक वृत्त जैसे द्रुतविलंबित, वंशस्थ और मंदाक्रांता, साथ ही कवित्त, सवैया और चौपदे।
- शैली: प्रबंधात्मक, वर्णनात्मक और उपदेशात्मक। प्रकृति चित्रण और करुण रस में विशेष सफलता।
हिंदी साहित्य में स्थान
द्विवेदी युग के कवियों में हरिऔध का स्थान बहुत ऊँचा है। मैथिलीशरण गुप्त के साथ उन्हें खड़ी बोली कविता को प्रतिष्ठा दिलाने वाला कवि माना जाता है। प्रियप्रवास ने यह साबित किया कि ब्रजभाषा के बिना भी हिंदी में महाकाव्य संभव है, और आगे के कवियों ने इसी रास्ते पर साकेत और कामायनी जैसे काव्य रचे। उनके समकालीन मैथिलीशरण गुप्त और बाद के जयशंकर प्रसाद के परिचय भी इस साइट पर हैं।
समय रेखा
नीचे हरिऔध के जीवन की मुख्य तिथियाँ हैं।
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1865 | 15 अप्रैल को निज़ामाबाद, आज़मगढ़ में जन्म |
| 1883 | निज़ामाबाद के मिडिल स्कूल में प्रधानाध्यापक नियुक्त |
| 1890 के आसपास | क़ानूनगो की परीक्षा पास कर सरकारी सेवा में |
| 1909 से 1913 | प्रियप्रवास की रचना, प्रकाशन 1914 में |
| 1924 | हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन के सभापति |
| सेवानिवृत्ति के बाद | काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अवैतनिक अध्यापन |
| 1947 | 16 मार्च को निज़ामाबाद में निधन |
रोचक तथ्य
- उन्होंने कविता के साथ उपन्यास भी लिखे। ठेठ हिंदी का ठाट में उन्होंने जानबूझकर संस्कृत और फ़ारसी के कठिन शब्दों से बचकर लिखा।
- कर्मवीर और एक बूँद जैसी उनकी छोटी कविताएँ लंबे समय तक विद्यालयों की पुस्तकों में पढ़ाई जाती रहीं।
- उन्होंने अपने जीवन से जुड़ी बातें इतिवृत्त नाम की रचना में लिखीं।
जीवनी और आत्मकथात्मक लेखन का अंतर समझने के लिए यह लेख पढ़िए।
हरिऔध: बोर्ड परीक्षा के लिए परिचय
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' का जन्म 15 अप्रैल 1865 को आज़मगढ़ ज़िले के निज़ामाबाद में हुआ। पिता पंडित भोलानाथ उपाध्याय और माता रुक्मिणी देवी थीं। स्वास्थ्य ख़राब होने से कॉलेज की पढ़ाई अधूरी रही, पर घर पर संस्कृत, उर्दू, फ़ारसी, बांग्ला और अंग्रेज़ी सीखी। वे प्रधानाध्यापक, फिर क़ानूनगो रहे और सेवानिवृत्ति पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अवैतनिक अध्यापक बने। 1924 में वे हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति बने। प्रियप्रवास खड़ी बोली का पहला सफल महाकाव्य है, जिस पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक मिला। अन्य रचनाएँ वैदेही वनवास, चोखे चौपदे, चुभते चौपदे और रसकलश हैं। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली, मुहावरेदार बोलचाल और ब्रजभाषा, तीनों रूपों में मिलती है। 16 मार्च 1947 को निज़ामाबाद में उनका निधन हुआ। द्विवेदी युग के कवियों में उनका स्थान अग्रणी है।
कागज़ पर दोहराना हो तो इस पेज का प्रिंट निकाल लीजिए। उत्तर लिखने का क्रम इस पेज पर समझाया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अयोध्यासिंह उपाध्याय का उपनाम क्या था?
उनका उपनाम हरिऔध था। इसी नाम से वे कविताएँ लिखते थे और हिंदी जगत में इसी नाम से अधिक जाने जाते हैं।
प्रियप्रवास किस प्रकार की रचना है?
प्रियप्रवास खड़ी बोली हिंदी का पहला सफल महाकाव्य है। इसमें सत्रह सर्ग हैं और कृष्ण के मथुरा प्रवास से ब्रज में फैली विरह वेदना का वर्णन है।
हरिऔध का जन्म कहाँ हुआ था?
हरिऔध का जन्म 15 अप्रैल 1865 को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ ज़िले के निज़ामाबाद में हुआ था।
ayodhya singh upadhyay ka jeevan parichay लिखते समय कौन सी रचनाएँ ज़रूर लिखें?
प्रियप्रवास, वैदेही वनवास, चोखे चौपदे, चुभते चौपदे और रसकलश अवश्य लिखिए। गद्य में ठेठ हिंदी का ठाट और अधखिला फूल उपन्यास भी जोड़ सकते हैं।
हरिऔध किस युग के कवि हैं?
हरिऔध द्विवेदी युग के प्रमुख कवि माने जाते हैं, हालाँकि उनका लेखन भारतेन्दु युग के अंत से छायावाद तक फैला रहा।
हरिऔध को कौन से सम्मान मिले?
प्रियप्रवास पर उन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक मिला और विद्यावाचस्पति की उपाधि दी गई। वे 1924 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति भी चुने गए।