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Ramanujan ka Jivan Parichay: श्रीनिवास रामानुजन का जीवन परिचय

गणितज्ञसंख्या 1729अपडेट: 16 Oct 2026

ramanujan ka jivan parichay पढ़कर हर विद्यार्थी को एक बात चौंकाती है: जिस युवक को कॉलेज की परीक्षा में दूसरे विषयों में फेल होने के कारण छात्रवृत्ति गँवानी पड़ी, उसी के नोटबुक के सूत्रों पर गणितज्ञ उसकी मृत्यु के सौ साल बाद तक शोध करते रहे। केवल बत्तीस वर्ष के जीवन में श्रीनिवास रामानुजन ने लगभग 3900 परिणाम लिखे।

यह srinivasa ramanujan ka jivan parichay दो भागों में है। पहले भाग में इरोड और कुंभकोणम से कैम्ब्रिज तक का सफर है, दूसरे भाग में श्रीनिवास रामानुजन का जीवन परिचय गणित में योगदान के साथ उदाहरणों से समझाया गया है, ताकि कक्षा 9 का विद्यार्थी भी उनकी खोजों का अर्थ पकड़ सके।

श्रीनिवास रामानुजन का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • पूरा नाम

    श्रीनिवास रामानुजन अयंगर
  • जन्म

    22 दिसंबर 1887, इरोड, तमिलनाडु (तब मद्रास प्रेसीडेंसी)
  • माता-पिता

    कोमलताम्मल और के. श्रीनिवास अयंगर (कपड़े की दुकान में मुनीम)
  • पत्नी

    जानकी अम्माल (विवाह 1909)
  • गुरु और सहयोगी

    जी. एच. हार्डी, जे. ई. लिटिलवुड (ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज)
  • योगदान

    संख्या सिद्धांत, विभाजन फलन (हार्डी के साथ), उच्च भाज्य संख्याएँ, पाई की तेज श्रेणियाँ, मॉक थीटा फलन
  • सम्मान

    फेलो ऑफ रॉयल सोसाइटी (2 मई 1918), ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो (13 अक्टूबर 1918)
  • मृत्यु

    26 अप्रैल 1920, कुंभकोणम (आयु 32 वर्ष)

ramanujan ka jivan parichay: इरोड से कुंभकोणम

रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को इरोड में अपने ननिहाल में हुआ। परिवार कुंभकोणम में रहता था, जहाँ पिता के. श्रीनिवास अयंगर एक साड़ी की दुकान में मुनीम का काम करते थे। माता कोमलताम्मल धार्मिक स्वभाव की थीं और मंदिर में भजन गाती थीं। घर की आर्थिक स्थिति साधारण थी।

कुंभकोणम के टाउन हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ते हुए ही उनकी गणित की प्रतिभा सबको दिखने लगी। कहा जाता है कि वे बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों के सवाल भी हल कर देते थे और त्रिकोणमिति की कठिन किताब उन्होंने किशोर अवस्था में ही समझ ली थी।

कार की पुस्तक और कॉलेज की कठिनाइयाँ

सन् 1903 के आसपास उनके हाथ जी. एस. कार की पुस्तक ए सिनॉप्सिस ऑफ एलीमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड एप्लाइड मैथमेटिक्स लगी। इसमें हजारों सूत्र बिना पूरे प्रमाण के लिखे थे। रामानुजन ने हर सूत्र को खुद सिद्ध करने की कोशिश की और फिर अपने नए सूत्र खोजने लगे। यहीं से उनकी प्रसिद्ध नोटबुक भरनी शुरू हुई।

मैट्रिक के बाद उन्हें कुंभकोणम के सरकारी कॉलेज में छात्रवृत्ति मिली, पर गणित में डूबे रहने के कारण वे दूसरे विषयों में फेल हुए और छात्रवृत्ति छिन गई। बाद में मद्रास के पचैयप्पा कॉलेज में भी 1906 और 1907 की फेलो ऑफ आर्ट्स परीक्षा वे पास नहीं कर सके। डिग्री न होने से नौकरी मिलना कठिन हो गया।

विवाह, नौकरी और पहला शोधपत्र

सन् 1909 में उनका विवाह जानकी अम्माल से हुआ। परिवार चलाने के लिए वे ट्यूशन पढ़ाते रहे और गणित के जानकारों से मिलकर काम की तलाश करते रहे। सन् 1911 में भारतीय गणितीय सोसाइटी की पत्रिका में बरनौली संख्याओं पर उनका पहला शोधपत्र छपा। 1 मार्च 1912 को उन्हें मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में लेखा क्लर्क की नौकरी मिली, जहाँ के अधिकारियों ने उनके गणित को आगे बढ़ाने में मदद की।

हार्डी को लिखा गया ऐतिहासिक पत्र

16 जनवरी 1913 को रामानुजन ने कैम्ब्रिज के प्रसिद्ध गणितज्ञ जी. एच. हार्डी को पत्र लिखा और साथ में कई पन्नों के सूत्र भेजे। हार्डी ने अपने साथी लिटिलवुड के साथ इन सूत्रों को जाँचा। कुछ सूत्र पहले से ज्ञात थे, कुछ गलत थे, पर कई इतने नए और गहरे थे कि हार्डी समझ गए कि यह असाधारण प्रतिभा है। 8 फरवरी 1913 को उन्होंने उत्तर भेजा और रामानुजन को कैम्ब्रिज बुलाने का प्रयास शुरू किया।

कैम्ब्रिज के पाँच वर्ष

17 मार्च 1914 को रामानुजन जहाज से इंग्लैंड रवाना हुए और ट्रिनिटी कॉलेज पहुँचे। हार्डी के साथ मिलकर उन्होंने कई महत्वपूर्ण शोधपत्र लिखे। मार्च 1916 में उन्हें उच्च भाज्य संख्याओं पर शोध के लिए शोध द्वारा बी.ए. की उपाधि मिली।

2 मई 1918 को वे रॉयल सोसाइटी के फेलो चुने गए, और 13 अक्टूबर 1918 को ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो बनने वाले पहले भारतीय बने। पर इंग्लैंड की ठंड, युद्ध के समय का भोजन और शाकाहार की कठिनाई ने उनका स्वास्थ्य बिगाड़ दिया। सन् 1919 में वे भारत लौट आए।

श्रीनिवास रामानुजन का जीवन परिचय गणित में योगदान सहित

1729: हार्डी रामानुजन संख्या

एक बार हार्डी अस्पताल में उनसे मिलने आए और बोले कि जिस टैक्सी से आए उसका नंबर 1729 बड़ा नीरस था। रामानुजन ने तुरंत कहा कि यह तो बहुत रोचक संख्या है, क्योंकि यह सबसे छोटी संख्या है जिसे दो घनों के जोड़ के रूप में दो अलग तरीकों से लिखा जा सकता है: 1729 = 1³ + 12³ = 9³ + 10³।

विभाजन फलन

किसी संख्या को धनात्मक पूर्ण संख्याओं के जोड़ के रूप में कितने तरीकों से लिखा जा सकता है, इसे विभाजन कहते हैं। जैसे 4 को 4, 3+1, 2+2, 2+1+1 और 1+1+1+1, इन पाँच तरीकों से लिखा जा सकता है, इसलिए p(4) = 5। बड़ी संख्याओं के लिए गिनना असंभव जैसा हो जाता है। हार्डी और रामानुजन ने 1918 में ऐसा सूत्र दिया जो बड़ी संख्याओं के विभाजन लगभग सही बता देता है। रामानुजन ने यह भी देखा कि 4, 9, 14 जैसी संख्याओं (5 के गुणज में 4 जोड़कर) के विभाजन हमेशा 5 से विभाज्य होते हैं, जैसे p(9) = 30।

उच्च भाज्य संख्याएँ

जिस संख्या के भाजक अपने से छोटी हर संख्या से अधिक हों, उसे उच्च भाज्य संख्या कहते हैं। जैसे 12 के छह भाजक हैं, जबकि उससे छोटी किसी संख्या के इतने भाजक नहीं। रामानुजन ने इन संख्याओं के गुणों का गहरा अध्ययन किया।

पाई की श्रेणियाँ और मॉक थीटा फलन

उन्होंने पाई के लिए ऐसी अनंत श्रेणियाँ दीं जो बहुत तेजी से सही मान तक पहुँचती हैं। कंप्यूटर से पाई के करोड़ों अंक निकालने की कई विधियाँ इन्हीं विचारों पर टिकी हैं। जीवन के अंतिम वर्ष में उन्होंने मॉक थीटा फलन खोजे, जिन्हें गणितज्ञ दशकों बाद पूरी तरह समझ सके।

अंतिम दिन और खोई हुई नोटबुक

भारत लौटने के बाद भी वे बीमारी के बीच गणित लिखते रहे। 26 अप्रैल 1920 को कुंभकोणम में बत्तीस वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके अंतिम दिनों के कागजों का एक बंडल बहुत समय तक अनदेखा पड़ा रहा। सन् 1976 में गणितज्ञ जॉर्ज एंड्रयूज ने कैम्ब्रिज के पुस्तकालय में इसे फिर खोजा, जिसे खोई हुई नोटबुक कहा जाता है।

उनकी 125वीं जयंती के अवसर पर भारत सरकार ने 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस घोषित किया। प्राचीन काल के गणितज्ञ आर्यभट और वैज्ञानिक अब्दुल कलाम के जीवन परिचय भी इसी साइट पर हैं।

वर्ष और घटनाएँ

वर्षघटना
1887इरोड में जन्म
1903कार की पुस्तक से परिचय
1909जानकी अम्माल से विवाह
1911पहला शोधपत्र प्रकाशित
1912मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क
1913हार्डी को पत्र
1914इंग्लैंड यात्रा
1916शोध द्वारा बी.ए.
1918रॉयल सोसाइटी और ट्रिनिटी के फेलो
1919भारत वापसी
1920कुंभकोणम में निधन

रामानुजन का जीवन परिचय: परीक्षा के लिए दस वाक्य

श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को इरोड (तमिलनाडु) में हुआ।
पिता के. श्रीनिवास अयंगर और माता कोमलताम्मल थीं।
कुंभकोणम में पढ़ते हुए कार की पुस्तक से उनकी गणित साधना शुरू हुई।
दूसरे विषयों में असफल होने से उनकी कॉलेज शिक्षा पूरी न हो सकी।
1912 में वे मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में क्लर्क बने।
1913 में उन्होंने जी. एच. हार्डी को अपने सूत्र भेजे।
1914 में वे कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए।
1918 में वे रॉयल सोसाइटी के फेलो चुने गए।
संख्या सिद्धांत, विभाजन फलन और पाई की श्रेणियों में उनका योगदान अमूल्य है।
26 अप्रैल 1920 को कुंभकोणम में 32 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

यह उत्तर छपाई योग्य है। शीर्षकों का क्रम जीवन परिचय कैसे लिखें पर है और बाकी नाम मुख्य पृष्ठ पर मिलेंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

रामानुजन किस शहर में पैदा हुए थे?

उनका जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के इरोड में हुआ। उनका बचपन कुंभकोणम में बीता।

1729 को रामानुजन संख्या क्यों कहते हैं?

1729 सबसे छोटी संख्या है जिसे दो घनों के जोड़ के रूप में दो तरीकों से लिखा जा सकता है: 1³ + 12³ और 9³ + 10³। हार्डी के साथ हुई बातचीत में रामानुजन ने यह बात तुरंत बता दी थी, इसलिए इसे हार्डी रामानुजन संख्या कहते हैं।

राष्ट्रीय गणित दिवस किस तारीख को होता है?

22 दिसंबर को, यानी रामानुजन के जन्मदिन पर। सरकार ने उनकी 125वीं जयंती के अवसर पर इसकी घोषणा की।

रामानुजन किस गणितज्ञ के साथ कैम्ब्रिज में काम करते थे?

वे जी. एच. हार्डी के साथ ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज में काम करते थे। जे. ई. लिटिलवुड ने भी उनके कार्य को परखने में मदद की।

रामानुजन की मृत्यु कब हुई?

26 अप्रैल 1920 को कुंभकोणम में उनका निधन हुआ। इंग्लैंड में बिगड़ा स्वास्थ्य भारत लौटने के बाद भी नहीं सुधरा और वे केवल 32 वर्ष के थे।

रामानुजन को कौन से बड़े सम्मान मिले?

2 मई 1918 को वे रॉयल सोसाइटी के फेलो चुने गए। उसी वर्ष 13 अक्टूबर को वे ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो बनने वाले पहले भारतीय बने।