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Premchand ka jivan parichay: मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय और साहित्य

उपन्यास सम्राटगोदानअपडेट: 16 Oct 2026

Premchand ka jivan parichay पढ़ते समय सबसे पहले यह जान लीजिए कि जिस लेखक को हम मुंशी प्रेमचंद कहते हैं, उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था और उन्होंने गाँव, किसान, स्त्री और गरीब आदमी के दुख को हिंदी कहानी के केंद्र में रख दिया। गोदान, गबन, निर्मला, ईदगाह और कफ़न जैसी रचनाएँ उन्हीं की कलम से निकलीं।

आगे मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय इस क्रम में चलता है: बचपन, नौकरी, नाम बदलने की घटना, पत्रिकाएँ, उपन्यास, कहानियाँ, लेखन की भाषा, और सबसे नीचे उत्तर पुस्तिका के लिए एक संक्षिप्त अनुच्छेद। प्रिंट निकालकर इसे प्रोजेक्ट फाइल या नोट्स में लगाया जा सकता है। कोई इसे munshi premchand ji ka jivan parichay लिखकर खोजता है तो कोई munshi premchand ka jeevan parichay, पर प्रेमचंद जी का जीवन परिचय हर रूप में एक ही है। दूसरे लेखकों के लिए कवि और लेखक परिचय सूची देखें।

मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • मूल नाम

    धनपत राय श्रीवास्तव (उर्दू लेखन में पहले नवाब राय)
  • जन्म

    31 जुलाई 1880, लमही गाँव, वाराणसी के पास
  • मृत्यु

    8 अक्टूबर 1936, वाराणसी
  • माता-पिता

    माता आनंदी देवी, पिता अजायब राय (डाकखाने में मुंशी)
  • पत्नी

    दूसरा विवाह 1906 में शिवरानी देवी से
  • शिक्षा

    1897 में मैट्रिक, 1919 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए.
  • युग

    आधुनिक काल, प्रेमचंद युग (कथा साहित्य)
  • प्रमुख रचनाएँ

    गोदान, गबन, निर्मला, सेवासदन, कर्मभूमि, रंगभूमि, मानसरोवर (8 भाग)
  • पत्रिकाएँ

    हंस (1930), जागरण; मर्यादा और माधुरी का संपादन

Premchand ka jivan parichay: लमही के धनपत राय

प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गाँव में हुआ। पिता अजायब राय डाकखाने में मुंशी थे और माता आनंदी देवी थीं। सात वर्ष की उम्र में उन्हें लालपुर के मदरसे में भेजा गया, जहाँ उन्होंने उर्दू और फ़ारसी सीखी। यही कारण है कि उनका शुरुआती लेखन उर्दू में हुआ।

बचपन में ही माँ का देहांत हो गया और घर में सौतेली माँ आईं। पंद्रह वर्ष की आयु में, सन् 1895 में, उनका पहला विवाह हुआ जो सफल नहीं रहा। 1897 में पिता भी चल बसे, उसी वर्ष उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। घर का बोझ कम उम्र में कंधों पर आ गया, इसलिए ट्यूशन पढ़ाकर पढ़ाई जारी रखी। 1906 में उन्होंने बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया, जो उस समय के समाज में साहसी कदम माना गया। शिवरानी देवी ने आगे चलकर प्रेमचंद घर में नाम से उनके घरेलू जीवन पर पुस्तक लिखी।

अध्यापक से लेखक तक: नौकरी, सोज़े वतन और नया नाम

1899 में चुनार के एक मिशनरी स्कूल में पढ़ाने के बाद 1900 में वे बहराइच के सरकारी ज़िला स्कूल में सहायक अध्यापक बने। फिर प्रतापगढ़, कानपुर, महोबा और हमीरपुर में काम किया, जहाँ वे स्कूलों के सब डिप्टी इंस्पेक्टर रहे। 1916 में गोरखपुर के नॉर्मल हाई स्कूल में आए और नौकरी के साथ पढ़ते हुए 1919 में बी.ए. पूरा किया।

1907 में नवाब राय नाम से उनका कहानी संग्रह सोज़े वतन छपा। अंग्रेज़ अधिकारियों ने इसे राजद्रोही माना, प्रतियाँ जलवा दीं और लिखने पर रोक लगा दी। तब ज़माना पत्रिका के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम सुझाया। यही नाम आगे पूरे देश में पहचाना गया। 1921 में गांधीजी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और मार्च 1921 में गोरखपुर से बनारस लौट आए।

साहित्यिक परिचय और पत्रकारिता

प्रेमचंद ने उर्दू से शुरुआत की और फिर हिंदी में भी उतनी ही ताकत से लिखा। हिंदी में उनकी पहली कहानी सौत दिसंबर 1915 में सरस्वती में छपी। उनके यहाँ कहानी राजा रानी या जादू की दुनिया से निकलकर खेत, चौपाल, दफ़्तर और रसोई तक आ गई। किसान का कर्ज़, दहेज, बेमेल विवाह, छुआछूत, रिश्वत और शहर गाँव का अंतर उनके मुख्य विषय बने।

1923 में उन्होंने बनारस में सरस्वती प्रेस शुरू किया। वे मर्यादा और लखनऊ की माधुरी के संपादक रहे। मार्च 1930 में हंस निकाला और बाद में जागरण भी चलाया। दोनों पत्र घाटे में चले, फिर भी उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। 1934 में वे बंबई गए और मजदूर फ़िल्म की कहानी लिखी, पर फ़िल्मी दुनिया उन्हें रास नहीं आई और अप्रैल 1935 में लौट आए। 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता उन्होंने ही की।

प्रमुख उपन्यास: कौन सा कब और किस विषय पर

उपन्यासों के कारण ही उन्हें उपन्यास सम्राट कहा जाता है। नीचे दिए वर्ष हिंदी पाठ्यपुस्तकों में प्रायः यही मिलते हैं, कुछ स्रोतों में एक दो वर्ष का अंतर है।

प्रेमचंद के उपन्यास
रचनावर्षविशेषता
सेवासदन1918स्त्री की सामाजिक स्थिति, उर्दू रूप बाज़ारे हुस्न
प्रेमाश्रम1922ज़मींदार और किसान का संघर्ष
रंगभूमि1925अंधे सूरदास की ज़मीन बचाने की लड़ाई
कायाकल्प1926पुनर्जन्म और राजसी जीवन का चित्र
निर्मला1927दहेज और बेमेल विवाह की त्रासदी
गबन1931गहनों का मोह और मध्यवर्ग का दिखावा
कर्मभूमि1932राष्ट्रीय आंदोलन और सुधार
गोदान1936होरी और धनिया के माध्यम से किसान जीवन का महाकाव्य
मंगलसूत्रअधूराकेवल शुरू के चार अध्याय लिखे जा सके

कहानियाँ, मानसरोवर और नाटक

प्रेमचंद ने लगभग तीन सौ कहानियाँ लिखीं, जो आठ भागों में मानसरोवर नाम से संकलित हैं। विद्यार्थियों को ये कहानियाँ विशेष रूप से याद रखनी चाहिए:

  • ईदगाह: हामिद अपनी दादी के लिए मेले से चिमटा लाता है।
  • कफ़न: घीसू और माधव की गरीबी और संवेदनहीनता।
  • पूस की रात: हल्कू किसान और ठंडी रात।
  • पंच परमेश्वर: न्याय की कुर्सी पर बैठकर मित्रता से ऊपर उठना।
  • नमक का दारोगा: ईमानदार वंशीधर की कथा।
  • बड़े भाई साहब, दो बैलों की कथा, बूढ़ी काकी, शतरंज के खिलाड़ी, गुल्ली डंडा।

नाटकों में कर्बला, संग्राम और प्रेम की वेदी प्रमुख हैं। उन्होंने निबंध, संपादकीय और अनुवाद भी किए।

भाषा-शैली

प्रेमचंद की भाषा को हिंदुस्तानी कहा जाता है, यानी वह भाषा जो आम आदमी बोलता है। इसमें संस्कृत के तत्सम शब्द, उर्दू फ़ारसी के शब्द और गाँव की बोली के ठेठ शब्द, तीनों घुले मिले हैं। मुहावरे और लोकोक्तियाँ उनकी भाषा में ऐसे बैठते हैं जैसे बातचीत में अपने आप आ जाते हैं।

  • वर्णनात्मक शैली: गाँव, मेले और खेत का सजीव चित्र।
  • संवाद शैली: पात्र अपनी ही बोली में बोलते हैं।
  • व्यंग्य शैली: समाज के ढोंग पर हल्की चोट।
  • भावात्मक और मनोवैज्ञानिक शैली: पात्रों के मन की उलझन का चित्रण।

उनकी रचनाएँ आदर्शोन्मुख यथार्थवाद का उदाहरण मानी जाती हैं: वे सच्चाई दिखाते हैं, पर अंत में मनुष्य की अच्छाई पर भरोसा बनाए रखते हैं।

प्रेमचंद के जीवन की समयरेखा

वर्षघटना
188031 जुलाई को लमही में जन्म
1895पहला विवाह
1897पिता का देहांत, मैट्रिक पास
1900बहराइच में सहायक अध्यापक
1906शिवरानी देवी से विवाह
1907सोज़े वतन प्रकाशित, बाद में ज़ब्त
1915हिंदी में पहली कहानी सौत
1921असहयोग आंदोलन में सरकारी नौकरी छोड़ी
1923बनारस में सरस्वती प्रेस
1930हंस पत्रिका आरंभ
1934बंबई में मजदूर फ़िल्म की कहानी
1936गोदान, प्रगतिशील लेखक संघ अधिवेशन, 8 अक्टूबर को निधन

हिंदी कथा साहित्य में प्रेमचंद का स्थान

हिंदी कहानी और उपन्यास का इतिहास प्रेमचंद से पहले और प्रेमचंद के बाद, इन दो हिस्सों में बाँटकर पढ़ाया जाता है। उनसे पहले तिलिस्म और ऐयारी वाले उपन्यास लोकप्रिय थे; उन्होंने कथा को जीवन की ज़मीन पर उतारा। इसलिए 1918 से 1936 तक के समय को कथा साहित्य में प्रेमचंद युग कहा जाता है। जैनेंद्र, यशपाल और बाद के लेखकों ने जिस रास्ते पर काम किया, उसकी नींव यहीं पड़ी। बाद के व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने तो उन पर प्रेमचंद के फटे जूते नाम से प्रसिद्ध निबंध भी लिखा। आधुनिक हिंदी गद्य की शुरुआत समझने के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र का परिचय भी पढ़ें।

परीक्षा में लिखने के लिए मुंशी प्रेमचंद का संक्षिप्त परिचय

जीवन परिचय: मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ। उनका मूल नाम धनपत राय था। पिता अजायब राय डाकखाने में मुंशी और माता आनंदी देवी थीं। 1919 में उन्होंने बी.ए. किया और शिक्षा विभाग में अध्यापक तथा सब डिप्टी इंस्पेक्टर रहे। 1921 में असहयोग आंदोलन के समय नौकरी छोड़ दी। उन्होंने हंस और जागरण पत्र निकाले। 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हुआ।

रचनाएँ: उपन्यास: सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान। कहानी संग्रह: मानसरोवर (8 भाग)। नाटक: कर्बला, संग्राम।

भाषा-शैली: सरल, मुहावरेदार हिंदुस्तानी; वर्णनात्मक, संवाद, व्यंग्य और भावात्मक शैली।

साहित्य में स्थान: उपन्यास सम्राट कहे जाने वाले प्रेमचंद कहानी को यथार्थ से जोड़ने वाले युग प्रवर्तक लेखक हैं।

इस अनुच्छेद को अपनी भाषा में ढालना हो तो लेखन विधि वाला पेज मदद करेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रेमचंद का असली नाम क्या था?

प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उर्दू में वे पहले नवाब राय नाम से लिखते थे। सोज़े वतन ज़ब्त होने के बाद मुंशी दयानारायण निगम के सुझाव पर उन्होंने प्रेमचंद नाम अपनाया।

premchand ka jeevan parichay लिखते समय जन्म और मृत्यु क्या लिखें?

जन्म 31 जुलाई 1880, लमही (वाराणसी) और मृत्यु 8 अक्टूबर 1936, वाराणसी लिखें। ये दोनों तिथियाँ सभी प्रमुख स्रोतों में एक जैसी मिलती हैं।

प्रेमचंद का अंतिम पूरा उपन्यास कौन सा है?

गोदान (1936) उनका अंतिम पूरा उपन्यास है। इसके बाद वे मंगलसूत्र लिख रहे थे, जो उनके निधन के कारण अधूरा रह गया।

मानसरोवर क्या है?

मानसरोवर प्रेमचंद की कहानियों का आठ भागों वाला संकलन है। इसमें ईदगाह, कफ़न, पूस की रात, पंच परमेश्वर जैसी लगभग सभी प्रसिद्ध कहानियाँ मिलती हैं।

प्रेमचंद को उपन्यास सम्राट क्यों कहते हैं?

उन्होंने हिंदी उपन्यास को मनोरंजन की कहानियों से निकालकर किसान, स्त्री और आम आदमी की समस्याओं से जोड़ा। सेवासदन से गोदान तक उनके उपन्यासों ने हिंदी कथा की दिशा बदल दी, इसी कारण यह उपाधि उनके साथ जुड़ गई।

munshi premchand ki jivani project file के लिए यह पेज कैसे काम आएगा?

यह पेज प्रिंट करने योग्य है। समयरेखा वाली तालिका, उपन्यासों की तालिका और अंत का संक्षिप्त उत्तर प्रोजेक्ट फाइल में अलग अलग भागों के रूप में लगाए जा सकते हैं।

क्या premchand biography in hindi और premchand ki jivani एक ही बात है?

हाँ, दोनों से मतलब उनके जीवन की कहानी से है। परीक्षा में घटनाओं वाले हिस्से के अलावा कृतियाँ, लिखने का ढंग और हिंदी में उनका महत्व भी लिखना पड़ता है, जो इस पेज में अलग अलग दिए गए हैं। जीवनी और आत्मकथा का अंतर जानने के लिए यह पेज देखें।