Suryakant Tripathi Nirala ka jivan parichay पढ़ते हुए लगता है कि यह किसी कवि की नहीं, किसी योद्धा की कथा है। जीवन ने उनसे माँ, पिता, पत्नी और बेटी सब छीन लिए, फिर भी उन्होंने हिंदी कविता को छंद की बेड़ियों से मुक्त करने का साहस दिखाया। हिंदी जगत उन्हें आदर से महाप्राण कहता है।
इस लेख में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जीवन परिचय, उनकी पत्रकारिता, कविता संग्रह, उपन्यास, कहानियाँ, भाषा-शैली तथा हिंदी कविता में उनका योगदान सरल भाषा में समझाया गया है। अंत में परीक्षा में लिखने योग्य छोटा उत्तर भी है।

मुख्य बातें
पूरा नाम
सूर्यकांत त्रिपाठी, उपनाम निरालाजन्म
21 फरवरी 1896 (कुछ स्रोतों में 1899)जन्म स्थान
महिषादल, मेदिनीपुर, बंगालपैतृक गाँव
गढ़ाकोला, ज़िला उन्नाव, उत्तर प्रदेशपिता
पंडित रामसहाय त्रिपाठीपत्नी
मनोहरा देवीरचनाएँ
अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते; अप्सरा, अलका, कुल्ली भाटयुग
छायावाद, आगे चलकर प्रगतिशील स्वरमृत्यु
15 अक्टूबर 1961, दारागंज, प्रयाग (इलाहाबाद)
Suryakant Tripathi Nirala ka jivan parichay: बंगाल में जन्म, उन्नाव से नाता
निराला का जन्म बंगाल की महिषादल रियासत में हुआ, जो मेदिनीपुर ज़िले में है। अधिकतर पाठ्यपुस्तकें जन्म तिथि 21 फरवरी 1896 बताती हैं, जबकि कुछ विद्वान 1899 (माघ शुक्ल एकादशी, संवत् 1955) और कुछ 1897 मानते हैं; इस पर विद्वान एकमत नहीं हैं, यानी विद्वानों में मतभेद है। जन्म रविवार को हुआ था, इसलिए नाम रखा गया सूर्यकांत।
पिता पंडित रामसहाय त्रिपाठी मूल रूप से उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के गढ़ाकोला गाँव के थे और महिषादल राज्य की सेवा में थे। इस तरह बालक का बचपन बंगाल में बीता और घर की भाषा तथा पढ़ाई का माहौल बांग्ला रहा। हिंदी उन्होंने बाद में सीखी, और इसमें पत्नी मनोहरा देवी की बड़ी प्रेरणा मानी जाती है। लगभग पंद्रह वर्ष की उम्र में उनका विवाह हुआ था। संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेज़ी का ज्ञान भी उन्होंने अधिकतर अपने परिश्रम से पाया।
दुखों की लंबी शृंखला
बहुत कम कवियों ने इतना व्यक्तिगत शोक सहा होगा जितना निराला ने:
- लगभग तीन वर्ष की आयु में माँ का निधन हो गया।
- युवावस्था में पिता भी चल बसे।
- प्रथम विश्व युद्ध के बाद फैली महामारी में पत्नी मनोहरा देवी और परिवार के कई सदस्य नहीं रहे।
- युवा बेटी सरोज की असमय मृत्यु ने उन्हें तोड़ दिया; इसी पीड़ा से 1935 में सरोज स्मृति नामक शोक गीत निकला।
आर्थिक तंगी जीवन भर साथ रही। फिर भी वे स्वभाव से अत्यंत उदार थे; जो कुछ मिलता, अक्सर ज़रूरतमंदों को दे देते। अंतिम वर्ष उन्होंने प्रयाग के दारागंज मोहल्ले के एक छोटे कमरे में बिताए, जहाँ 15 अक्टूबर 1961 को उनका देहांत हुआ।
नौकरी, संपादन और पत्रकारिता
1918 से 1922 तक निराला महिषादल राज्य की सेवा में रहे। फिर वे कोलकाता पहुँचे, जहाँ रामकृष्ण मिशन की पत्रिका समन्वय (1922 से 1923) का संपादन किया। अगस्त 1923 से वे मतवाला के संपादक मंडल में रहे; इसी पत्रिका में लिखते हुए उन्होंने निराला उपनाम अपनाया। बाद में लखनऊ की गंगा पुस्तक माला और सुधा पत्रिका से जुड़े। 1942 के बाद वे प्रयाग में रहकर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद करते रहे। आनंदमठ और रामकृष्ण वचनामृत जैसे बांग्ला ग्रंथों के अनुवाद भी उन्होंने किए।
साहित्यिक परिचय: मुक्त छंद का विद्रोह
निराला छायावाद के चार स्तंभों में से एक हैं; बाकी तीन नाम हैं महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद और सुमित्रानंदन पंत। पर उनकी सबसे बड़ी पहचान है मुक्त छंद। जब हिंदी कविता तुक और मात्रा के बंधन में थी, तब उन्होंने ऐसी कविताएँ लिखीं जिनमें लय तो थी, पर निश्चित छंद नहीं था। उस समय कई लोगों ने इसका विरोध और उपहास किया, किंतु आगे चलकर यही रास्ता आधुनिक हिंदी कविता का मुख्य मार्ग बना।
उनकी कविता का दायरा बहुत बड़ा है। एक ओर जूही की कली जैसी कोमल प्रेम कविता है, दूसरी ओर राम की शक्ति पूजा जैसी ओजस्वी लंबी कविता। फिर वह तोड़ती पत्थर और भिक्षुक में मज़दूर और भूखे आदमी का यथार्थ है, तो कुकुरमुत्ता में पूँजी और दिखावे पर तीखा व्यंग्य। इस तरह वे छायावाद से निकलकर प्रगतिशील चेतना तक पहुँचे।
प्रमुख रचनाएँ
| रचना | विधा | विशेषता |
|---|---|---|
| अनामिका (1923) | काव्य संग्रह | पहला संग्रह; 1939 में इसी नाम से दूसरा, बड़ा संग्रह भी आया |
| परिमल (1930) | काव्य संग्रह | मुक्त छंद के प्रयोग, जूही की कली |
| गीतिका (1936) | गीत संग्रह | संगीतात्मक गीत |
| तुलसीदास (1939) | खंड काव्य | तुलसी के मन का संघर्ष और जागरण |
| कुकुरमुत्ता (1942) | व्यंग्य काव्य | गुलाब और कुकुरमुत्ते के बहाने वर्ग भेद पर चोट |
| अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना, आराधना | काव्य संग्रह | बाद के दौर की सरल और यथार्थवादी कविताएँ |
| अप्सरा (1931), अलका (1933), प्रभावती, निरुपमा | उपन्यास | सामाजिक और रोमानी कथाएँ |
| कुल्ली भाट (1939), बिल्लेसुर बकरिहा (1942) | रेखाचित्र या लघु उपन्यास | ग्रामीण जीवन पर व्यंग्य और करुणा |
| लिली, सखी, सुकुल की बीवी, चतुरी चमार | कहानी संग्रह | समाज के साधारण पात्र |
चार प्रसिद्ध कविताओं का सार
निराला का निधन 1961 में हुआ, इसलिए यहाँ उनकी पंक्तियाँ उद्धृत न करके कविताओं का भाव सरल शब्दों में दिया जा रहा है:
- राम की शक्ति पूजा: रावण से युद्ध में निराश राम शक्ति की आराधना करते हैं; अंत में शक्ति उन्हें विजय का आशीर्वाद देती है। यह कविता संघर्ष में हिम्मत न हारने का संदेश देती है।
- सरोज स्मृति: बेटी की मृत्यु पर पिता का शोक, साथ में अपनी असफलताओं और समाज की रूढ़ियों पर आत्म-स्वीकृति।
- वह तोड़ती पत्थर: इलाहाबाद की सड़क पर तपती धूप में पत्थर तोड़ती श्रमिक स्त्री का चित्र, जो श्रम की गरिमा और विषमता दोनों दिखाता है।
- भिक्षुक: भूख से टूटे व्यक्ति और उसके बच्चों का करुण दृश्य, जिसे पढ़कर मन द्रवित हो जाता है।
भाषा-शैली
निराला की भाषा एक जैसी नहीं है, विषय के साथ बदलती है। राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास में लंबे समास वाली, संस्कृतनिष्ठ और गंभीर खड़ी बोली है। इसके विपरीत कुकुरमुत्ता, बेला और नए पत्ते में बोलचाल के शब्द, उर्दू के शब्द और चुटीला व्यंग्य मिलता है। उनकी शैली के चार रूप पहचाने जाते हैं: ओजपूर्ण, गीतात्मक, व्यंग्यात्मक और चित्रात्मक। संगीत की समझ के कारण उनके गीतों में राग और ताल का ध्यान रखा गया है। गद्य में भी वे स्पष्ट, निर्भीक और कभी-कभी कटु व्यंग्य करने वाले लेखक हैं।
हिंदी साहित्य में स्थान
आधुनिक हिंदी कविता को आत्मविश्वास देने वाले कवियों में निराला सबसे आगे हैं। छायावाद की कोमलता, प्रगतिवाद का यथार्थ और प्रयोगवाद की नई राह, तीनों की झलक उनमें मिलती है। बाद की पीढ़ी के नागार्जुन जैसे जनकवियों पर भी उनका असर दिखता है। अन्य कवियों का क्रम से अध्ययन करने के लिए कवि परिचय वाला पेज देखें।
बोर्ड परीक्षा हेतु निराला का संक्षिप्त परिचय
नीचे दिया उत्तर बोर्ड परीक्षा में 4 से 5 अंक के प्रश्न के लिए पर्याप्त है। अपने शब्दों में उत्तर बनाने के लिए जीवन परिचय लेखन टूल का उपयोग करें।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म 21 फरवरी 1896 को बंगाल के महिषादल (मेदिनीपुर) में हुआ; कुछ विद्वान जन्म वर्ष 1899 मानते हैं।
उनके पिता पंडित रामसहाय त्रिपाठी उन्नाव ज़िले के गढ़ाकोला गाँव के निवासी थे।
बचपन में माँ का और युवावस्था में पिता, पत्नी मनोहरा देवी तथा बेटी सरोज का निधन हुआ।
उन्होंने समन्वय और मतवाला जैसी पत्रिकाओं में संपादन का काम किया।
वे छायावाद के चार स्तंभों में से एक और हिंदी में मुक्त छंद के प्रवर्तक हैं।
काव्य: अनामिका, परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते।
गद्य: अप्सरा, अलका, निरुपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा।
भाषा संस्कृतनिष्ठ भी है और बोलचाल वाली भी; शैली ओजपूर्ण, गीतात्मक और व्यंग्यात्मक है।
15 अक्टूबर 1961 को प्रयाग में उनका देहांत हुआ।
विद्रोही तेवर और करुणा के कारण वे महाप्राण कहलाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
निराला को मुक्त छंद का प्रवर्तक क्यों कहा जाता है?
उन्होंने हिंदी में सबसे पहले बड़े पैमाने पर ऐसी कविताएँ लिखीं जिनमें तुक और मात्रा का बंधन नहीं था, केवल भीतर की लय थी। परिमल की कविताएँ इसका उदाहरण हैं। आरंभ में विरोध हुआ, पर बाद में यही शैली आधुनिक कविता की पहचान बनी।
सरोज स्मृति किस पर लिखी गई है?
यह निराला ने अपनी बेटी सरोज की मृत्यु के बाद 1935 में लिखी। इसे हिंदी का सबसे मार्मिक शोक गीत माना जाता है।
निराला का जन्म कहाँ हुआ था?
उनका जन्म बंगाल के मेदिनीपुर ज़िले की महिषादल रियासत में हुआ। उनका पैतृक गाँव उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले में गढ़ाकोला है।
निराला ने किन पत्रिकाओं में काम किया?
कोलकाता में उन्होंने समन्वय का संपादन किया और मतवाला के संपादक मंडल में रहे। लखनऊ में वे सुधा पत्रिका और गंगा पुस्तक माला से जुड़े रहे।
कुकुरमुत्ता कविता का विषय क्या है?
इसमें गुलाब को अमीर वर्ग और कुकुरमुत्ते को साधारण जन का प्रतीक बनाकर समाज की विषमता पर व्यंग्य किया गया है। यह निराला के प्रगतिशील दौर की रचना है।
निराला ने अंतिम दिन कहाँ बिताए?
जीवन के अंतिम वर्ष वे प्रयाग (इलाहाबाद) के दारागंज मोहल्ले में रहे। वहीं 15 अक्टूबर 1961 को उनका निधन हुआ।