Harishankar parsai ka jivan parichay असल में उस लेखक की कहानी है जिसने हँसी को हथियार बनाया। उनसे पहले हिंदी में व्यंग्य किसी निबंध या कहानी में मसाले की तरह आता था; परसाई ने उसे स्वतंत्र विधा का दर्जा दिलाया और समाज के ढोंग, भ्रष्टाचार और खोखले आदर्शों को बेबाकी से उघाड़ा।
इस पेज में हरिशंकर परसाई का जीवन परिचय समय के क्रम से है, फिर उनकी रचनाएँ विधा के अनुसार, नौवीं के पाठ प्रेमचंद के फटे जूते की मूल बात, भाषा-शैली, सम्मान और परीक्षा में लिखने लायक उत्तर। कोई इसे harishankar parsai ji ka jivan parichay लिखकर खोजे या केवल harishankar parsai jivan parichay, उसे यहाँ पूरी सामग्री मिलेगी। पेज प्रिंट करने योग्य है।

मुख्य बातें
जन्म
22 अगस्त 1924, जमानी गाँव, इटारसी के पास, ज़िला होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम), मध्य प्रदेशमृत्यु
10 अगस्त 1995, जबलपुरशिक्षा
नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए.व्यवसाय
वन विभाग, फिर अध्यापक; 1957 से पूर्णकालिक लेखनविधा
व्यंग्य निबंध, कहानी, उपन्यास, संस्मरणप्रमुख रचनाएँ
विकलांग श्रद्धा का दौर, भोलाराम का जीव, सदाचार का ताबीज, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, रानी नागफनी की कहानीपत्रिका
वसुधा (जबलपुर से)सम्मान
साहित्य अकादमी पुरस्कार 1982 (विकलांग श्रद्धा का दौर), मध्य प्रदेश शासन का शिक्षा सम्मान, शरद जोशी सम्मान
Harishankar parsai ka jivan parichay: जमानी से जबलपुर
परसाई जी का जन्म 22 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले में इटारसी के पास जमानी गाँव में हुआ। प्रारंभिक पढ़ाई गाँव में ही हुई। घर की आर्थिक स्थिति साधारण थी और किशोर अवस्था में ही परिवार की ज़िम्मेदारी उन पर आ पड़ी। यही संघर्ष आगे उनके लेखन की ज़मीन बना, क्योंकि उन्होंने आम आदमी की परेशानियों को बहुत पास से देखा था।
अठारह वर्ष की उम्र में उन्होंने वन विभाग में नौकरी की। फिर खंडवा में छह महीने अध्यापन किया। 1941 से 1943 तक जबलपुर में अध्यापक प्रशिक्षण लिया और 1943 से वहीं के मॉडल हाई स्कूल में पढ़ाने लगे। इसी बीच हिंदी में एम.ए. की उपाधि नागपुर विश्वविद्यालय से ली। जबलपुर ही आगे उनका स्थायी घर बना।
नौकरी छोड़कर कलम का रास्ता
1952 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी। 1953 से 1957 तक निजी स्कूलों में पढ़ाया, फिर 1957 में वह नौकरी भी छोड़कर पूरी तरह लेखन को समर्पित हो गए। उस समय केवल लिखकर घर चलाना बड़ा जोखिम था, पर उन्होंने यह रास्ता चुना और जीवन भर इसी पर चले।
जबलपुर से उन्होंने वसुधा नाम की साहित्यिक पत्रिका निकाली। पत्रिका की बहुत प्रशंसा हुई, पर आर्थिक घाटे के कारण उसे बंद करना पड़ा। अख़बारों में उनके नियमित स्तंभ बहुत लोकप्रिय रहे। पूछिए परसाई से स्तंभ में वे पाठकों के सवालों के छोटे, चुटीले और विचारशील जवाब देते थे, जिससे हज़ारों पाठक उनसे सीधे जुड़ गए। 10 अगस्त 1995 को जबलपुर में उनका निधन हुआ।
व्यंग्य को स्वतंत्र विधा बनाने वाला लेखक
परसाई का व्यंग्य केवल हँसाने के लिए नहीं है। हँसी के पीछे एक चुभन है जो पाठक को सोचने पर मजबूर करती है। उन्होंने दफ़्तरों की लालफ़ीताशाही, धर्म के नाम पर पाखंड, दिखावटी देशभक्ति, शिक्षा व्यवस्था की कमियाँ और मध्यवर्ग के दोहरे चरित्र पर लिखा। उनके पात्र हमारे आसपास के ही लोग हैं: क्लर्क, मास्टर, नेता, साधु, दुकानदार।
उनकी मान्यता थी कि व्यंग्यकार का काम समाज की बीमारी की पहचान करना है। इसीलिए उनका लेखन कड़वा होते हुए भी करुणा से भरा है। प्रेमचंद के प्रति उनके मन में गहरा सम्मान था, और प्रेमचंद की तरह ही वे आम आदमी की तरफ़ खड़े होकर लिखते रहे। बाद के लगभग सभी व्यंग्यकार उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। उनके समकालीन कथा लेखन की झलक के लिए मन्नू भंडारी का परिचय भी पढ़ें।
परसाई की किताबें: कहानी, उपन्यास, व्यंग्य
| रचना | विधा | विशेषता |
|---|---|---|
| हँसते हैं रोते हैं | कहानी संग्रह | आरंभिक कहानियाँ |
| जैसे उनके दिन फिरे | कहानी संग्रह | व्यंग्य कथाएँ |
| भोलाराम का जीव | कहानी | पेंशन के लिए भटकती आत्मा, दफ़्तरी भ्रष्टाचार |
| रानी नागफनी की कहानी | उपन्यास | फ़ैंटेसी के रूप में व्यवस्था पर व्यंग्य |
| तट की खोज | उपन्यास | लघु उपन्यास |
| ज्वाला और जल | उपन्यास | कथा के माध्यम से सामाजिक चित्र |
| तब की बात और थी | निबंध संग्रह | व्यंग्य निबंध |
| भूत के पाँव पीछे | निबंध संग्रह | सामाजिक व्यंग्य निबंध |
| सदाचार का ताबीज | व्यंग्य संग्रह | भ्रष्टाचार मिटाने के ढोंग पर चोट |
| शिकायत मुझे भी है | व्यंग्य संग्रह | सामाजिक विसंगतियाँ |
| ठिठुरता हुआ गणतंत्र | व्यंग्य निबंध | आज़ादी के बाद की व्यवस्था का चित्र |
| विकलांग श्रद्धा का दौर | व्यंग्य संग्रह | 1982 में साहित्य अकादमी पुरस्कार |
| तिरछी रेखाएँ | संस्मरण | जीवन के अनुभव |
इनके अलावा पगडंडियों का ज़माना, वैष्णव की फिसलन, बेईमानी की परत, माटी कहे कुम्हार से और इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर भी बहुत पढ़ी जाती हैं।
प्रेमचंद के फटे जूते: नौवीं के पाठ की मूल बात
एनसीईआरटी की नौवीं की पुस्तक क्षितिज में परसाई जी का व्यंग्य प्रेमचंद के फटे जूते पढ़ाया जाता है। इसमें लेखक प्रेमचंद की एक पुरानी फ़ोटो देखते हैं जिसमें वे पत्नी के साथ खड़े हैं और उनके एक जूते में बड़ा छेद है, जिससे उँगली बाहर दिख रही है।
इसी छोटे से दृश्य से लेखक दो बातें सामने रखते हैं। एक ओर प्रेमचंद की सादगी और ईमानदारी है, जो फटे जूते के साथ भी बेझिझक फ़ोटो खिंचवाते हैं। दूसरी ओर आज के लोगों का दिखावा है, जो इत्र लगाकर फ़ोटो खिंचवाना चाहते हैं और अपनी कमियाँ छिपाते हैं। लेखक यह भी कहते हैं कि प्रेमचंद ने किसी कठोर चीज़ को ठोकर मारी होगी, यानी उन्होंने समाज की बुराइयों से समझौता करने के बजाय उनसे टक्कर ली। परीक्षा में इस पाठ से व्यंग्य का उद्देश्य और प्रेमचंद के व्यक्तित्व वाले प्रश्न अक्सर आते हैं।
भाषा-शैली
परसाई की भाषा बोलचाल की सहज हिंदी है। तत्सम, उर्दू, अंग्रेज़ी और ठेठ देसी, हर तरह के शब्द उसमें बिना रुकावट आते हैं। छोटे वाक्य, अचानक मोड़ और अप्रत्याशित तुलना उनकी भाषा को धारदार बनाते हैं।
- व्यंग्यात्मक शैली: उनकी मुख्य शैली, जिसमें सीधी बात को उलटकर कहा जाता है।
- वर्णनात्मक शैली: घटना या पात्र का चित्र खींचने में।
- संवाद शैली: पात्रों की बातचीत से विसंगति दिखाने में।
- फ़ैंटेसी शैली: भोलाराम का जीव जैसी रचनाओं में, जहाँ यमराज और नारद तक पात्र बन जाते हैं।
- आत्मकथात्मक शैली: संस्मरणों और कई निबंधों में, जहाँ लेखक स्वयं पर भी हँसता है।
जीवन और सम्मान की समयरेखा
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1924 | 22 अगस्त को जमानी में जन्म |
| 1941 से 1943 | जबलपुर में अध्यापक प्रशिक्षण |
| 1943 | मॉडल हाई स्कूल, जबलपुर में अध्यापक |
| 1952 | सरकारी नौकरी छोड़ी |
| 1957 | अध्यापन छोड़कर पूर्णकालिक लेखन |
| 1982 | विकलांग श्रद्धा का दौर पर साहित्य अकादमी पुरस्कार |
| 1995 | 10 अगस्त को जबलपुर में निधन |
साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा उन्हें मध्य प्रदेश शासन का शिक्षा सम्मान और शरद जोशी सम्मान मिला। जबलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट्. की उपाधि दी। हिंदी व्यंग्य के इतिहास में उन्हें सबसे बड़ा नाम माना जाता है; वे व्यंग्य को हल्के मनोरंजन से उठाकर गंभीर सामाजिक आलोचना तक ले गए।
परसाई जी पर परीक्षा में लिखा जाने वाला उत्तर
हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के जमानी गाँव में हुआ। हिंदी साहित्य में एम.ए. उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से किया। कुछ समय वन विभाग में और फिर अध्यापक के रूप में काम किया, पर 1957 में नौकरी छोड़कर स्वतंत्र लेखन अपना लिया। जबलपुर से वसुधा पत्रिका निकाली।
रचनाएँ: कहानी संग्रह, हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे; उपन्यास, रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज; व्यंग्य और निबंध संग्रह, तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, सदाचार का ताबीज, शिकायत मुझे भी है, विकलांग श्रद्धा का दौर; संस्मरण, तिरछी रेखाएँ।
भाषा सरल, बोलचाल की और चुटीली; शैली व्यंग्यात्मक, वर्णनात्मक और संवादात्मक। 1982 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 10 अगस्त 1995 को जबलपुर में निधन हुआ। व्यंग्य को स्वतंत्र विधा बनाने वाले लेखक के रूप में उनका स्थान अद्वितीय है।
दूसरे गद्यकारों के परिचय लेखक और कवि सूची में हैं, और उत्तर लिखने का ढाँचा जीवन परिचय कैसे लिखें पर समझाया गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
हरिशंकर परसाई का जीवन परिचय में जन्म तिथि क्या लिखें?
22 अगस्त 1924 लिखें। जन्म स्थान मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले का जमानी गाँव है, जो इटारसी के पास है। होशंगाबाद ज़िले का नया नाम नर्मदापुरम है।
परसाई जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार किस रचना पर मिला?
1982 में साहित्य अकादमी ने विकलांग श्रद्धा का दौर को पुरस्कृत किया। यह व्यंग्य रचनाओं का संग्रह है।
भोलाराम का जीव कहानी किस बारे में है?
इसमें भोलाराम नाम के एक गरीब आदमी का जीव मृत्यु के बाद भी अपनी पेंशन की फ़ाइल में अटका रहता है। कहानी फ़ैंटेसी के सहारे सरकारी दफ़्तरों की रिश्वतख़ोरी और देरी पर व्यंग्य करती है।
वसुधा पत्रिका किसने निकाली थी?
हरिशंकर परसाई ने जबलपुर से वसुधा पत्रिका निकाली थी। साहित्यिक जगत में इसकी बहुत प्रशंसा हुई, पर घाटे के कारण यह बंद करनी पड़ी।
परसाई को व्यंग्य का शिखर लेखक क्यों कहा जाता है?
उन्होंने व्यंग्य को किसी दूसरी विधा का हिस्सा न रखकर स्वतंत्र विधा बनाया। उनके व्यंग्य में हँसी के साथ समाज सुधार की गंभीर चिंता है, इसलिए वे इस विधा के आदर्श माने जाते हैं।
क्या परसाई की रचनाओं की पंक्तियाँ उत्तर में लिखनी चाहिए?
परीक्षा में रचनाओं के नाम, उनकी विधा और विषय लिखना पर्याप्त है। उद्धरण केवल वही दें जो आपकी पाठ्यपुस्तक में छपा हो, अपनी ओर से पंक्तियाँ न गढ़ें।