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Subhadra Kumari Chauhan ka Jivan Parichay: सुभद्रा कुमारी चौहान का जीवन परिचय

झाँसी की रानीमुकुलअपडेट: 16 Oct 2026

subhadra kumari chauhan ka jivan parichay शुरू होते ही मन में "खूब लड़ी मर्दानी" वाली पंक्ति गूँजने लगती है, पर उनका जीवन केवल एक कविता तक सीमित नहीं था। वे कवयित्री, कहानीकार, सत्याग्रही और जनप्रतिनिधि, चारों भूमिकाओं में सक्रिय रहीं और केवल 44 वर्ष की आयु में संसार से विदा हो गईं।

इस पृष्ठ पर सुभद्रा कुमारी चौहान का जीवन परिचय घटनाओं के क्रम में, उनकी कविता और कहानी संग्रहों की सूची, भाषा-शैली की पहचान और बोर्ड परीक्षा के लिए तैयार छोटा उत्तर दिया गया है। उत्तर लिखने का ढाँचा समझना हो तो जीवन परिचय कैसे लिखें वाला पृष्ठ और उसका लेखन टूल देखें।

सुभद्रा कुमारी चौहान का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • पूरा नाम

    सुभद्रा कुमारी चौहान (पहली कविता "सुभद्राकुँवरि" नाम से छपी)
  • जन्म

    16 अगस्त 1904, निहालपुर गाँव, इलाहाबाद (प्रयागराज), उत्तर प्रदेश
  • मृत्यु

    15 फरवरी 1948, सिवनी (मध्य प्रदेश) के पास सड़क दुर्घटना में
  • पिता

    ठाकुर रामनाथ सिंह
  • पति

    ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान, खंडवा (विवाह 1919)
  • काल / युग

    छायावाद युग, राष्ट्रीय काव्यधारा
  • रचनाएँ

    मुकुल, त्रिधारा (काव्य); बिखरे मोती, उन्मादिनी, सीधे-सादे चित्र (कहानी संग्रह)
  • प्रसिद्ध कविता

    झाँसी की रानी, वीरों का कैसा हो वसंत, मेरा नया बचपन, यह कदंब का पेड़
  • सम्मान

    सेकसरिया पुरस्कार; 6 अगस्त 1976 को डाक टिकट; तटरक्षक पोत का नामकरण

subhadra kumari chauhan ka jivan parichay: बचपन से सत्याग्रह तक

सुभद्रा जी का जन्म 16 अगस्त 1904 को प्रयाग के पास निहालपुर गाँव में हुआ। पिता ठाकुर रामनाथ सिंह जमींदार थे, पर बेटी की पढ़ाई के पक्ष में थे। प्रयाग के क्रास्थवेट गर्ल्स स्कूल में पढ़ते हुए उनकी भेंट महादेवी वर्मा से हुई, जो उनसे कुछ कक्षा पीछे थीं। दोनों कक्षा के बीच के समय में कविताएँ लिखतीं और यह मित्रता जीवन भर चली।

कविता का शौक बहुत छोटी उम्र में जागा। सन् 1913 में, जब वे केवल नौ बरस की थीं, नीम के पेड़ पर लिखी उनकी पहली कविता प्रयाग की पत्रिका "मर्यादा" में छपी। सन् 1919 में मिडिल परीक्षा के वर्ष ही उनका विवाह खंडवा के ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान से हुआ, जो स्वयं नाटककार और देशभक्त थे। विवाह के बाद वे जबलपुर में बस गईं।

सन् 1921 में वे असहयोग आंदोलन से जुड़ गईं और पढ़ाई नवीं कक्षा के आगे नहीं बढ़ सकी। सन् 1923 के जबलपुर झंडा सत्याग्रह में वे जेल जाने वाली पहली महिला सत्याग्रही बनीं। सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी वे जेल गईं। आगे चलकर वे मध्य प्रांत की विधानसभा की सदस्य चुनी गईं। 15 फरवरी 1948 को नागपुर से जबलपुर लौटते समय सिवनी के पास कार दुर्घटना में उनका देहांत हो गया।

साहित्यिक परिचय: कविता और कहानी, दोनों में बराबर पकड़

सुभद्रा जी को लोग प्रायः केवल वीर रस की कवयित्री मानते हैं, जबकि उनकी लगभग 88 कविताओं और 46 कहानियों में घर, माँ, बचपन, स्त्री का संघर्ष और समाज की कुरीतियाँ भी उतनी ही गहराई से आई हैं। उनकी राष्ट्रीय कविताएँ सभाओं में गाई जाती थीं और बच्चों के लिए लिखी कविताएँ पाठ्यपुस्तकों में पहुँचीं।

कहानियों में उन्होंने मध्यवर्गीय स्त्री के मन को बड़ी सहजता से खोला। छुआछूत, दहेज, पर्दा और विधवा जीवन जैसे प्रश्न वे बिना भाषण दिए, घटनाओं के माध्यम से सामने रखती हैं। हिंदी के अन्य कवियों की तुलना के लिए कवि परिचय पृष्ठ पर पूरी सूची है।

प्रमुख रचनाएँ (सारणी)

सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रमुख कृतियाँ
रचनाविधाविशेषता
मुकुल (1930)काव्य संग्रहपहला कविता संग्रह, इसी में "झाँसी की रानी" संकलित है
त्रिधाराकाव्य संग्रहराष्ट्रप्रेम और पारिवारिक भावों की कविताएँ
बिखरे मोती (1932)कहानी संग्रह15 कहानियाँ, इस पर सेकसरिया पुरस्कार मिला
उन्मादिनी (1934)कहानी संग्रह9 कहानियाँ, स्त्री मन का मनोवैज्ञानिक चित्रण
सीधे-सादे चित्र (1947)कहानी संग्रह14 कहानियाँ, सामान्य जीवन के सरल दृश्य
मेरा नया बचपनकवितामाँ और बेटी के बहाने बचपन की मधुर स्मृति

बच्चों के लिए "यह कदंब का पेड़", "खिलौनेवाला" जैसी कविताएँ भी बहुत लोकप्रिय हुईं।

झाँसी की रानी: कविता की कुछ पंक्तियाँ

यह कविता "मुकुल" में संकलित है और 1857 की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की कथा लोकगीत की लय में सुनाती है। इसका टेक वाला अंश इस प्रकार है:

सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

इन पंक्तियों में कवयित्री इतिहास की घटना को सुनी हुई लोककथा की तरह कहती हैं, इसलिए कविता पढ़ने वाले को भाषण नहीं, किस्सा लगती है। यही उसकी लोकप्रियता का रहस्य है। "मेरा नया बचपन" की पहली पंक्ति "बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी" भी विद्यार्थियों को खूब याद रहती है।

भाषा-शैली

  • भाषा: सरल, बोलचाल के निकट खड़ी बोली हिंदी, जिसमें तत्सम शब्द कम और घरेलू शब्द अधिक हैं।
  • शैली: कविता में वर्णनात्मक और गेय शैली, कहानियों में आत्मीय वर्णन और संवाद।
  • रस: राष्ट्रीय कविताओं में वीर रस, पारिवारिक कविताओं में वात्सल्य रस।
  • छंद और लय: लोकगीत जैसी लय, टेक की पुनरावृत्ति, जिससे कविता गाने में आसान बनती है।

छायावाद के समय में जब कई कवि सूक्ष्म और कल्पनाप्रधान भाषा में लिख रहे थे, सुभद्रा जी ने सीधी बात सीधे शब्दों में कही। इसी कारण उनकी कविता गाँव की चौपाल तक पहुँची।

हिंदी साहित्य में स्थान

राष्ट्रीय काव्यधारा में मैथिलीशरण गुप्त और माखनलाल चतुर्वेदी के साथ सुभद्रा कुमारी चौहान की गिनती प्रथम पंक्ति में होती है। स्त्री लेखन के इतिहास में वे उन पहली महिलाओं में हैं जिन्होंने लेखन और आंदोलन दोनों को एक साथ जिया। उनकी सखी महादेवी वर्मा ने उन पर संस्मरण लिखा, और पुत्री सुधा चौहान ने "मिला तेज से तेज" नाम से उनकी जीवनी लिखी। सुधा जी का विवाह प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय से हुआ था।

समय रेखा

वर्षघटना
190416 अगस्त को निहालपुर, प्रयाग में जन्म
1913पहली कविता "मर्यादा" पत्रिका में प्रकाशित
1919लक्ष्मण सिंह चौहान से विवाह
1921असहयोग आंदोलन में भागीदारी
1923झंडा सत्याग्रह में जेल जाने वाली पहली महिला सत्याग्रही
1930काव्य संग्रह "मुकुल" प्रकाशित
1932"बिखरे मोती" कहानी संग्रह
1942भारत छोड़ो आंदोलन में पुनः जेल
194815 फरवरी को सड़क दुर्घटना में निधन
19766 अगस्त को भारतीय डाक ने स्मृति टिकट जारी किया

रोचक तथ्य

  • उनका विवाह बिना दहेज और बिना पर्दे की शर्त के, दोनों की सहमति से हुआ, जो उस समय असामान्य बात थी।
  • पहली बार जेल जाते समय वे गर्भवती थीं, इसलिए कुछ महीनों बाद उन्हें छोड़ा गया।
  • जबलपुर केंद्रीय जेल के जिस महिला वार्ड में वे बंद रहीं, उसका नाम बाद में उनके नाम पर रखा गया।
  • भारतीय तटरक्षक बल के एक पोत का नाम "सुभद्रा कुमारी चौहान" रखा गया।
  • दुर्घटना के समय कार उनका बेटा चला रहा था; सड़क पर आए चूजों को बचाने में गाड़ी पेड़ से टकरा गई।

बोर्ड उत्तर पुस्तिका के लिए छोटा परिचय

सुभद्रा कुमारी चौहान (1904 से 1948)

जीवन परिचय: राष्ट्रीय चेतना की कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904 को इलाहाबाद के निहालपुर गाँव में हुआ। पिता ठाकुर रामनाथ सिंह थे। शिक्षा क्रास्थवेट गर्ल्स स्कूल, प्रयाग में हुई। 1919 में खंडवा के ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान से विवाह के बाद वे जबलपुर आ गईं। असहयोग आंदोलन से जुड़कर 1923 में वे जेल जाने वाली पहली महिला सत्याग्रही बनीं। 15 फरवरी 1948 को एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हुआ।

रचनाएँ: मुकुल, त्रिधारा (काव्य); बिखरे मोती, उन्मादिनी, सीधे-सादे चित्र (कहानी)।

भाषा-शैली: सरल खड़ी बोली, गेय और वर्णनात्मक शैली, वीर और वात्सल्य रस।

साहित्य में स्थान: "झाँसी की रानी" की रचयिता के रूप में वे राष्ट्रीय काव्यधारा की अमर कवयित्री हैं।

इस उत्तर को प्रिंट करके दोहराया जा सकता है; class 10 और class 12 के प्रश्न पत्र में यही क्रम अंक दिलाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सुभद्रा जी किस गाँव में जन्मी थीं?

उनका जन्म 16 अगस्त 1904 को इलाहाबाद (प्रयागराज) जिले के निहालपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम ठाकुर रामनाथ सिंह था।

"झाँसी की रानी" कविता किस संग्रह में है?

यह कविता उनके पहले काव्य संग्रह "मुकुल" में संकलित है, जो सन् 1930 में प्रकाशित हुआ। इसमें रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष को लोकगीत की लय में कहा गया है।

सुभद्रा कुमारी चौहान को पहली महिला सत्याग्रही क्यों कहा जाता है?

सन् 1923 में जबलपुर के झंडा सत्याग्रह में गिरफ्तारी देकर जेल जाने वाली वे पहली महिला थीं। इसके बाद 1942 के आंदोलन में भी वे जेल गईं।

उनके कहानी संग्रहों के नाम क्या हैं?

उनके तीन कहानी संग्रह हैं: बिखरे मोती (1932), उन्मादिनी (1934) और सीधे-सादे चित्र (1947)। "बिखरे मोती" पर उन्हें सेकसरिया पुरस्कार मिला था।

सुभद्रा कुमारी चौहान की मृत्यु कैसे हुई?

15 फरवरी 1948 को नागपुर से जबलपुर लौटते समय सिवनी के पास उनकी कार एक पेड़ से टकरा गई। तब वे मात्र 44 वर्ष की थीं।

सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा का क्या संबंध था?

दोनों प्रयाग के क्रास्थवेट गर्ल्स स्कूल में साथ पढ़ीं और गहरी सहेलियाँ बनीं। महादेवी जी ने उन पर संस्मरण भी लिखा।