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Harivansh Rai Bachchan ka Jivan Parichay: मधुशाला के कवि

मधुशालाहालावादअपडेट: 16 Oct 2026

Harivansh Rai Bachchan ka jivan parichay पढ़ने वाले ज़्यादातर विद्यार्थी पहले मधुशाला का नाम सुन चुके होते हैं। 1935 में छपी इस छोटी सी पुस्तक ने बच्चन को रातों-रात लोकप्रिय बना दिया, और कवि सम्मेलनों में उसे सुनने के लिए भीड़ उमड़ने लगी।

पर बच्चन का जीवन केवल एक पुस्तक तक सीमित नहीं था। वे अंग्रेज़ी के प्राध्यापक, कैम्ब्रिज से शोध करने वाले विद्वान, विदेश मंत्रालय में हिंदी अधिकारी और चार खंडों में लिखी गई प्रसिद्ध आत्मकथा के लेखक भी थे। यह पेज हरिवंश राय बच्चन का जीवन परिचय, यानी harivansh rai bachchan biography in hindi, क्रम से और परीक्षा के ढंग से प्रस्तुत करता है।

हरिवंश राय बच्चन का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • जन्म

    27 नवंबर 1907
  • जन्म स्थान

    बाबूपट्टी, प्रतापगढ़ (कुछ स्रोत इलाहाबाद लिखते हैं), उत्तर प्रदेश
  • माता-पिता

    सरस्वती देवी, प्रताप नारायण श्रीवास्तव
  • शिक्षा

    एम.ए. अंग्रेज़ी (इलाहाबाद विश्वविद्यालय), पीएचडी (कैम्ब्रिज, डब्ल्यू. बी. यीट्स पर)
  • पत्नी

    श्यामा (1926), तेजी सूरी (1941)
  • काव्य धारा

    हालावाद, उत्तर छायावाद
  • रचनाएँ

    मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशा निमंत्रण, एकांत संगीत, दो चट्टानें; चार खंडों की आत्मकथा
  • सम्मान

    साहित्य अकादमी 1968, पद्म भूषण 1976, पहला सरस्वती सम्मान 1991
  • मृत्यु

    18 जनवरी 2003, मुंबई

Harivansh Rai Bachchan ka jivan parichay: परिवार और जन्मभूमि

हरिवंश राय का जन्म 27 नवंबर 1907 को उत्तर प्रदेश में हुआ। कई स्रोत जन्म स्थान प्रतापगढ़ ज़िले का बाबूपट्टी गाँव बताते हैं, जबकि कुछ इलाहाबाद लिखते हैं, क्योंकि परिवार वहीं रहता था और उनका बचपन भी वहीं बीता। पिता प्रताप नारायण श्रीवास्तव और माता सरस्वती देवी के वे बड़े पुत्र थे। माता-पिता उन्हें बचपन में प्यार से बच्चन कहते थे; यही घरेलू नाम आगे उनका उपनाम और पहचान बन गया।

शिक्षा: पाठशाला से कैम्ब्रिज तक

  1. आरंभिक पढ़ाई पाठशाला में हुई, जहाँ उन्होंने पहले उर्दू सीखी।
  2. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया।
  3. 1952 से 1954 तक इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में आयरिश कवि डब्ल्यू. बी. यीट्स पर शोध किया और पीएचडी की उपाधि पाई।

अंग्रेज़ी साहित्य के गहरे अध्ययन से उनकी कविता में पश्चिम की रोमांटिक कविता की भावुकता आई, पर भाषा और संस्कार पूरी तरह भारतीय रहे। शेक्सपियर के मैकबेथ जैसे नाटकों का हिंदी अनुवाद भी उन्होंने किया।

निजी जीवन: शोक और नई शुरुआत

1926 में उन्नीस वर्ष की आयु में बच्चन का विवाह श्यामा से हुआ। दस वर्ष बाद, 1936 में, क्षय रोग से श्यामा का निधन हो गया। यह आघात इतना गहरा था कि उनकी कविता का रंग ही बदल गया; मधुशाला की मस्ती के बाद निशा निमंत्रण और एकांत संगीत (1939) जैसे संग्रहों में अकेलेपन और वेदना के गीत आए।

1941 में उन्होंने तेजी सूरी से विवाह किया, जो रंगमंच और संगीत से जुड़ी थीं। इसके बाद की कविताओं में फिर से आशा और जीवन के प्रति उत्साह लौटता है; 1945 में सतरंगिनी और 1950 में मिलन यामिनी इसी बदले हुए मन के संग्रह हैं। उनके दो पुत्र हुए, अमिताभ और अजिताभ।

कार्यक्षेत्र और पद

वर्षकार्य
1941 से 1952इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक
कुछ समयआकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से जुड़ाव
1955दिल्ली में विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ
1966राज्यसभा के लिए मनोनीत

विदेश मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने सरकारी कामकाज में हिंदी को बढ़ाने का काम किया। यह भूमिका साहित्य से अलग दिखती है, पर इससे हिंदी के प्रशासनिक प्रयोग को बल मिला।

साहित्यिक परिचय: हालावाद और मधुशाला

मधुशाला, मधुबाला और मधुकलश, इन तीन पुस्तकों से हिंदी में एक नई काव्य धारा चली जिसे हालावाद कहा गया। हाला यानी मदिरा, प्याला, साकी और मधुशाला यहाँ प्रतीक हैं: मधुशाला जीवन है, हाला जीवन का रस है और पीने वाला मनुष्य। उमर ख़य्याम की रुबाइयों की परंपरा से प्रेरित इन कविताओं में जीवन को पूरी तरह जीने का संदेश है, नशे का प्रचार नहीं।

छायावाद की रहस्यमय और कठिन भाषा के बाद बच्चन ने सीधी, गेय और दिल को छूने वाली कविता लिखी। यही कारण है कि वे मंच के सबसे लोकप्रिय कवियों में रहे। बाद में उनकी कविता सामाजिक और राष्ट्रीय विषयों की ओर भी गई। सुमित्रानंदन पंत के साथ उन्होंने खादी के फूल भी रचा।

प्रमुख रचनाएँ

बच्चन की कृतियाँ
रचनाविधाविशेषता
मधुशाला (1935)रुबाई शैली का काव्यहालावाद की सबसे प्रसिद्ध कृति
मधुबाला, मधुकलशकाव्य संग्रहउसी मस्ती भरे स्वर का विस्तार
निशा निमंत्रण, एकांत संगीतगीत संग्रहपत्नी के निधन के बाद की वेदना
मिलन यामिनी, सतरंगिनीगीत संग्रहप्रेम और आशा
दो चट्टानेंकाव्य संग्रहसाहित्य अकादमी पुरस्कार 1968
तेरा हार (1929), आरती और अंगारे (1958)काव्य संग्रहआरंभिक और परिपक्व दौर की कविताएँ
मैकबेथ (अनुवाद)नाट्य अनुवादशेक्सपियर का हिंदी रूपांतर

चार खंडों की आत्मकथा

बहुत से आलोचक मानते हैं कि बच्चन का गद्य उनकी कविता जितना ही महत्वपूर्ण है। उनकी आत्मकथा हिंदी की सबसे प्रसिद्ध आत्मकथाओं में गिनी जाती है:

  1. क्या भूलूँ क्या याद करूँ (1969): पहला खंड, जिसमें परिवार और आरंभिक जीवन की स्मृतियाँ हैं।
  2. नीड़ का निर्माण फिर (1970): शीर्षक ही बताता है कि यह टूटे घोंसले को फिर बनाने, यानी जीवन को दोबारा सँवारने की कथा है।
  3. बसेरे से दूर (1977): तीसरा खंड।
  4. दशद्वार से सोपान तक (1985): अंतिम खंड।

इन्हीं चार खंडों के लिए 1991 में उन्हें पहला सरस्वती सम्मान मिला। आत्मकथा और जीवनी का अंतर जानने हेतु जीवनी और आत्मकथा पेज पढ़ें।

भाषा-शैली और सम्मान

भाषा: सरल, बोलचाल की खड़ी बोली, जिसमें उर्दू और फ़ारसी के प्रचलित शब्द सहज रूप से घुले हैं। कठिन तत्सम शब्द बहुत कम हैं। शैली: गीतात्मक, भावात्मक और आत्मकथात्मक; रुबाई और गीत उनके प्रिय रूप हैं। गद्य में वे आत्मीय और ईमानदार हैं, अपनी कमज़ोरियाँ भी खुलकर लिखते हैं।

सम्मान: दो चट्टानें पर साहित्य अकादमी पुरस्कार (1968), पद्म भूषण (1976), आत्मकथा पर पहला सरस्वती सम्मान (1991), इसके अलावा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार और एफ्रो-एशियाई सम्मेलन का कमल पुरस्कार। 18 जनवरी 2003 को मुंबई में उनका देहांत हुआ।

उत्तर छायावाद के गीतकारों में बच्चन का स्थान सबसे ऊपर है। और भी कवियों के परिचय कवि परिचय पर हैं; समकालीन रामधारी सिंह दिनकर का परिचय भी पढ़ें।

बच्चन जी पर संक्षिप्त उत्तर (बोर्ड परीक्षा)

harivansh rai bachchan ka jeevan parichay परीक्षा में लिखना हो तो नीचे का उत्तर काम आएगा। पेज प्रिंट करने योग्य है, और लेखन टूल से आप इसे अपने शब्दों में ढाल सकते हैं।

हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ ज़िले के बाबूपट्टी गाँव में हुआ; कुछ स्रोत इलाहाबाद बताते हैं।
पिता प्रताप नारायण श्रीवास्तव और माता सरस्वती देवी थीं।
उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में एम.ए. और कैम्ब्रिज से यीट्स पर पीएचडी की।
वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, फिर विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ रहे और 1966 में राज्यसभा के लिए मनोनीत हुए।
वे हालावाद के प्रवर्तक कवि हैं।
काव्य: मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशा निमंत्रण, एकांत संगीत, दो चट्टानें।
चार भागों वाली आत्मकथा का पहला भाग क्या भूलूँ क्या याद करूँ है और अंतिम दशद्वार से सोपान तक।
बोलचाल के निकट की सरल भाषा और गीत जैसी भावपूर्ण शैली उनकी विशेषता है।
उन्हें साहित्य अकादमी, पद्म भूषण और पहला सरस्वती सम्मान मिला।
18 जनवरी 2003 को मुंबई में उनका निधन हुआ।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हालावाद क्या है और इसके प्रवर्तक कौन हैं?

हालावाद वह काव्य धारा है जिसमें हाला, प्याला और मधुशाला के प्रतीकों से जीवन का दर्शन कहा गया। इसके प्रवर्तक हरिवंश राय बच्चन माने जाते हैं, और मधुशाला इसकी प्रतिनिधि रचना है।

बच्चन ने पीएचडी किस विषय पर की?

उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में 1952 से 1954 के बीच आयरिश कवि डब्ल्यू. बी. यीट्स पर शोध करके पीएचडी प्राप्त की।

बच्चन की आत्मकथा के कितने खंड हैं?

चार खंड हैं: पहला क्या भूलूँ क्या याद करूँ, दूसरा नीड़ का निर्माण फिर, तीसरा बसेरे से दूर और चौथा दशद्वार से सोपान तक। इन्हीं के लिए उन्हें 1991 में पहला सरस्वती सम्मान मिला।

दो चट्टानें किस सम्मान से जुड़ी है?

बच्चन के इस काव्य संग्रह को 1968 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।

बच्चन उपनाम कैसे पड़ा?

माता-पिता बचपन में उन्हें प्यार से बच्चन पुकारते थे। यही घरेलू नाम आगे चलकर उनका उपनाम बना, जबकि मूल कुलनाम श्रीवास्तव था।

हरिवंश राय बच्चन की मृत्यु कब हुई?

मुंबई में 18 जनवरी 2003 को, 95 वर्ष की उम्र पूरी करके, वे संसार से चले गए।