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Mannu Bhandari ka jivan parichay: नई कहानी की प्रमुख लेखिका

नई कहानीआपका बंटीअपडेट: 16 Oct 2026

Mannu bhandari ka jivan parichay पढ़ते हुए एक ऐसी लेखिका सामने आती है जिसने घर, परिवार, विवाह और स्त्री मन की उलझनों को बिना शोर के, पर गहरी सच्चाई से लिखा। आपका बंटी में एक बच्चे की आँखों से टूटते परिवार को दिखाना हो या महाभोज में गाँव की राजनीति का चेहरा, उनकी कलम हर जगह ईमानदार रही।

दसवीं की क्षितिज पुस्तक में उनका आत्मकथ्य एक कहानी यह भी पढ़ाया जाता है, इसलिए मन्नू भंडारी का जीवन परिचय बोर्ड परीक्षा में बार बार पूछा जाता है। इस पेज पर उनका जीवन क्रम, रचनाएँ, पाठ की मूल बातें, भाषा-शैली, सम्मान और लिखने योग्य उत्तर एक साथ हैं। पेज प्रिंट करने योग्य है।

मन्नू भंडारी का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • बचपन का नाम

    महेंद्र कुमारी
  • जन्म

    3 अप्रैल 1931, भानपुरा, ज़िला मंदसौर, मध्य प्रदेश (कुछ स्रोतों में 2 अप्रैल)
  • मृत्यु

    15 नवंबर 2021, गुरुग्राम, हरियाणा
  • पिता

    सुखसंपत राय भंडारी (स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, शब्दकोश निर्माता)
  • शिक्षा

    अजमेर में स्कूली शिक्षा, कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक, काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए.
  • जीवनसाथी

    हिंदी कथाकार और संपादक राजेंद्र यादव
  • प्रमुख रचनाएँ

    आपका बंटी, महाभोज, एक इंच मुस्कान, यही सच है, एक प्लेट सैलाब, त्रिशंकु, एक कहानी यह भी
  • सम्मान

    व्यास सम्मान 2008 (एक कहानी यह भी), हिंदी अकादमी दिल्ली का शलाका सम्मान
  • आंदोलन

    नई कहानी

Mannu bhandari ka jivan parichay: भानपुरा की महेंद्र कुमारी

मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल 1931 को मध्य प्रदेश के मंदसौर ज़िले के भानपुरा कस्बे में हुआ। कुछ स्रोत 2 अप्रैल भी लिखते हैं, पर पाठ्य सामग्री में प्रायः 3 अप्रैल ही मिलता है। घर में उनका नाम महेंद्र कुमारी रखा गया था; मन्नू उनका घरेलू नाम था, जो आगे चलकर लेखन का नाम बन गया।

पिता सुखसंपत राय भंडारी स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और शब्दकोश बनाने वाले विद्वान थे। वे स्त्री शिक्षा के समर्थक थे, पर स्वभाव से क्रोधी और शक्की भी थे। माँ धैर्य और सहनशीलता की मूर्ति थीं। परिवार बाद में राजस्थान के अजमेर में आकर बस गया, और मन्नू का बचपन तथा किशोर अवस्था वहीं बीती।

अजमेर से बनारस: पढ़ाई और व्यक्तित्व का निर्माण

अजमेर में दसवीं पास करके कॉलेज के पहले वर्ष में पहुँचने पर उनकी भेंट हिंदी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से हुई। उन्होंने मन्नू को केवल किताबें पढ़ना ही नहीं, उन पर सोचना और बहस करना भी सिखाया। उन्हीं की प्रेरणा से मन्नू देश की आज़ादी के आंदोलन में सक्रिय हुईं, जुलूसों और सभाओं में भाषण देने लगीं।

इसके बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक किया और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा और साहित्य में एम.ए. की उपाधि ली। घर का खुला वैचारिक माहौल, पिता की किताबें और शीला अग्रवाल जैसी शिक्षिका, इन तीनों ने मिलकर उनकी लेखिका को आकार दिया।

कोलकाता, दिल्ली और अध्यापन का जीवन

पढ़ाई के बाद उन्होंने कलकत्ता के बालीगंज शिक्षा सदन में हिंदी पढ़ाई। 1961 से 1965 तक वे कलकत्ता के रानी बिड़ला कॉलेज में प्राध्यापिका रहीं। कलकत्ता में ही उनकी भेंट लेखक राजेंद्र यादव से हुई और दोनों ने विवाह किया। 1964 में वे दिल्ली आ गए। दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में उन्होंने लंबे समय तक हिंदी साहित्य पढ़ाया। उनकी एक बेटी हैं, रचना।

1992 से 1994 तक वे उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय में प्रेमचंद सृजनपीठ की निदेशक रहीं। जीवन के अंतिम वर्ष उन्होंने दिल्ली और आसपास बिताए। 15 नवंबर 2021 को 90 वर्ष की आयु में गुरुग्राम में उनका निधन हुआ।

नई कहानी में स्त्री का स्वर

1950 के दशक में हिंदी में नई कहानी आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें कहानी बड़े आदर्शों के बजाय रोज़मर्रा के अनुभव और मन के द्वंद्व पर टिकी। मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव के साथ मन्नू भंडारी इस आंदोलन की प्रमुख लेखिका बनीं। 1957 में उनका पहला कहानी संग्रह मैं हार गई छपा।

उनकी कहानियों में मध्यवर्गीय स्त्री का अकेलापन, नौकरीपेशा स्त्री का द्वंद्व, प्रेम और विवाह के बीच की खींचतान, बच्चों पर टूटते रिश्तों का असर और शहरी जीवन की बेचैनी बार बार आती है। वे किसी पात्र पर फ़ैसला नहीं सुनातीं; पाठक को सोचने के लिए छोड़ देती हैं। प्रेमचंद जहाँ गाँव और किसान की कथा लेकर आए, वहीं मन्नू भंडारी ने शहर के घर के भीतर की कथा को केंद्र में रखा।

प्रमुख रचनाएँ और उनकी विशेषता

रचनाविधाविशेषता
मैं हार गई (1957)कहानी संग्रहपहला संग्रह
तीन निगाहों की एक तस्वीर (1959)कहानी संग्रहआरंभिक दौर की कहानियाँ
एक प्लेट सैलाब (1962)कहानी संग्रहशहरी मध्यवर्ग का जीवन
यही सच हैकहानीदो प्रेम संबंधों के बीच उलझी नायिका; इसी पर रजनीगंधा फ़िल्म बनी
त्रिशंकु (1978)कहानी संग्रहपीढ़ियों के बीच का द्वंद्व
एक इंच मुस्कानउपन्यासराजेंद्र यादव के साथ लिखा गया
आपका बंटी (1971)उपन्यासमाता पिता के अलगाव में पिसता बच्चा
महाभोज (1979)उपन्यासएक ग्रामीण की मृत्यु के बहाने राजनीति और व्यवस्था का चित्र
बिना दीवारों के घर (1966)नाटकदांपत्य संबंधों का तनाव
एक कहानी यह भी (2007)आत्मकथालेखकीय जीवन की कहानी, व्यास सम्मान प्राप्त

महाभोज का बाद में मंच रूपांतर भी हुआ और यह कई बार खेला गया।

एक कहानी यह भी: दसवीं के पाठ के मुख्य बिंदु

यह पाठ उनकी आत्मकथा का अंश है। इसमें वे अपने किशोर जीवन के उन लोगों और घटनाओं को याद करती हैं जिन्होंने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। विद्यार्थी इन बिंदुओं को याद रखें:

  1. पिता का व्यक्तित्व: विद्वान, उदार विचारों वाले, पर आर्थिक संकट के बाद क्रोधी और शक्की हो गए थे। लेखिका मानती हैं कि उनके स्वभाव की कई कमियाँ और खूबियाँ पिता से आईं।
  2. हीन भावना: रंग साँवला होने और बड़ी बहन से तुलना के कारण उनके मन में बचपन से हीन भावना बैठ गई।
  3. शीला अग्रवाल का प्रभाव: इस प्राध्यापिका ने उन्हें साहित्य चुनने और विचार बनाने की दृष्टि दी।
  4. आज़ादी का आंदोलन: 1946 और 1947 के दिनों में वे हड़तालों, प्रभात फेरियों और भाषणों में आगे रहीं।
  5. पिता की दुविधा: पिता बेटी की प्रसिद्धि पर गर्व भी करते थे और समाज के डर से नाराज़ भी होते थे।

आत्मकथ्य, आत्मकथा और जीवनी में क्या फ़र्क है, यह इस पेज पर पढ़ें।

फ़िल्म और मंच तक पहुँची कहानियाँ

मन्नू भंडारी की रचनाएँ पढ़ने के साथ देखी भी गईं। 1974 में बासु चटर्जी ने उनकी कहानी यही सच है पर रजनीगंधा फ़िल्म बनाई, जो बहुत सराही गई। 1979 की फ़िल्म जीना यहाँ भी उनकी एक कहानी पर आधारित थी। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की एक कहानी का उनका रूपांतर 1977 में स्वामी फ़िल्म के रूप में आया। आपका बंटी पर आधारित 1986 की फ़िल्म समय की धारा में कहानी बदलने पर उन्होंने आपत्ति की और मामला अदालत तक गया, जो बाद में आपसी समझौते से सुलझा।

भाषा-शैली

उनकी भाषा सरल, साफ़ और बोलचाल के बहुत करीब है। शहरी पढ़े लिखे परिवारों में जैसी हिंदी बोली जाती है, उसमें अंग्रेज़ी और उर्दू के आम शब्द सहज रूप से आते हैं। वे भारी अलंकारों से बचती हैं और छोटे वाक्यों में मन की बड़ी हलचल पकड़ लेती हैं।

  • मनोवैज्ञानिक शैली: पात्रों के भीतर चल रहे द्वंद्व को खोलने में।
  • आत्मकथात्मक शैली: एक कहानी यह भी और डायरी रूप वाली कहानियों में।
  • संवाद शैली: रिश्तों की खटास और अपनापन दिखाने में।
  • व्यंग्यात्मक शैली: महाभोज में व्यवस्था पर चोट करते समय।

मन्नू भंडारी की समयरेखा और सम्मान

वर्षघटना
1931भानपुरा में जन्म
1957पहला कहानी संग्रह मैं हार गई
1961 से 1965रानी बिड़ला कॉलेज, कलकत्ता में अध्यापन
1964दिल्ली आगमन, बाद में मिरांडा हाउस
1971आपका बंटी
1974यही सच है पर रजनीगंधा फ़िल्म
1979महाभोज
1992 से 1994प्रेमचंद सृजनपीठ, उज्जैन की निदेशक
2007आत्मकथा एक कहानी यह भी
2008व्यास सम्मान
202115 नवंबर को गुरुग्राम में निधन

व्यास सम्मान के अलावा उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सम्मान (महाभोज के लिए), भारतीय भाषा परिषद कोलकाता का सम्मान, बिहार राज्य भाषा परिषद का सम्मान और हिंदी अकादमी दिल्ली का शलाका सम्मान मिला। हिंदी कथा साहित्य में स्त्री दृष्टि को मज़बूती से रखने वाली लेखिकाओं में उनका नाम सबसे आगे लिया जाता है।

परीक्षा के लिए लेखिका परिचय, आठ से दस पंक्तियाँ

मन्नू भंडारी का जन्म 3 अप्रैल 1931 को मध्य प्रदेश के भानपुरा में हुआ। बचपन का नाम महेंद्र कुमारी था। पिता सुखसंपत राय भंडारी स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थे। उनकी आरंभिक शिक्षा अजमेर में हुई, जहाँ प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया और दिल्ली के मिरांडा हाउस में अध्यापन किया।

प्रमुख रचनाएँ: कहानी संग्रह, मैं हार गई, तीन निगाहों की एक तस्वीर, एक प्लेट सैलाब, यही सच है, त्रिशंकु; उपन्यास, आपका बंटी, महाभोज, एक इंच मुस्कान; आत्मकथा, एक कहानी यह भी।

भाषा सरल, सहज, बोलचाल की खड़ी बोली; शैली मनोवैज्ञानिक, आत्मकथात्मक और संवादात्मक। 2008 में व्यास सम्मान मिला। 15 नवंबर 2021 को उनका निधन हुआ। नई कहानी आंदोलन की वे प्रमुख लेखिका हैं।

उत्तर में कौन सा शीर्षक पहले आए, इसके लिए यह लेखन विधि देखें, और दूसरे गद्यकारों की सूची यहाँ मिलेगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मन्नू भंडारी का जीवन परिचय में असली नाम क्या लिखें?

उनका असली या बचपन का नाम महेंद्र कुमारी था। मन्नू घर का नाम था, जो बाद में लेखन का नाम बन गया।

एक कहानी यह भी किस विधा की रचना है?

यह मन्नू भंडारी की आत्मकथा है, जो 2007 में प्रकाशित हुई। दसवीं की क्षितिज पुस्तक में इसका एक अंश आत्मकथ्य के रूप में पढ़ाया जाता है। इसी पुस्तक पर उन्हें 2008 में व्यास सम्मान मिला।

शीला अग्रवाल कौन थीं?

शीला अग्रवाल अजमेर में मन्नू भंडारी की हिंदी प्राध्यापिका थीं। उन्होंने मन्नू को अच्छा साहित्य पढ़ने, उस पर विचार करने और आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।

आपका बंटी उपन्यास किस बारे में है?

यह 1971 का उपन्यास है जिसमें माता पिता के अलग होने का असर उनके छोटे बेटे बंटी पर दिखाया गया है। बच्चे के मन को केंद्र में रखने के कारण यह हिंदी के बहुत चर्चित उपन्यासों में है।

रजनीगंधा फ़िल्म किस कहानी पर बनी?

1974 की फ़िल्म रजनीगंधा मन्नू भंडारी की कहानी यही सच है पर आधारित है। इसका निर्देशन बासु चटर्जी ने किया था।

मन्नू भंडारी किस आंदोलन से जुड़ी थीं?

वे नई कहानी आंदोलन की प्रमुख लेखिका थीं। इस आंदोलन में मोहन राकेश, कमलेश्वर और उनके पति राजेंद्र यादव भी प्रमुख नाम थे।