Dr rajendra prasad ka jivan parichay पढ़कर पता चलता है कि कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में पहला स्थान पाने वाला बिहार का एक युवक कैसे सफल वकालत छोड़कर किसानों के बीच गया और अंत में स्वतंत्र भारत का पहला राष्ट्रपति बना। जो छात्र dr rajendra prasad jivan parichay या dr rajendra prasad ki jivani खोजते हैं, उनके लिए यहाँ तथ्य, तालिकाएँ और संक्षिप्त उत्तर क्रम से दिए गए हैं।
राजेंद्र बाबू की कहानी हिंदी में पढ़ते समय उनकी सादगी पर ध्यान दें। बिहार के लोग उन्हें देशरत्न कहते थे और राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी उनका रहन सहन किसान परिवार जैसा ही रहा। अन्य राष्ट्रीय नेताओं के बारे में स्वतंत्रता सेनानी पेज पर पढ़ें।

मुख्य बातें
पूरा नाम
डॉ राजेंद्र प्रसादजन्म
3 दिसंबर 1884, जीरादेई, सिवान (बिहार)माता-पिता
कमलेश्वरी देवी और महादेव सहायपत्नी
राजवंशी देवीशिक्षा
एम.ए. अर्थशास्त्र (1907), मास्टर ऑफ लॉ (1915, स्वर्ण पदक), कानून में डॉक्टरेटप्रमुख कार्य / योगदान
संविधान सभा के अध्यक्ष, भारत के पहले राष्ट्रपति (1950 से 1962)रचनाएँ
आत्मकथा, इंडिया डिवाइडेड, बापू के कदमों मेंसम्मान
भारत रत्न (1962)मृत्यु
28 फरवरी 1963, सदाकत आश्रम, पटना
Rajendra Prasad ka jivan parichay: जीरादेई से कलकत्ता तक
राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सिवान जिले के जीरादेई गाँव में हुआ। पिता महादेव सहाय फारसी और संस्कृत के जानकार थे, माता कमलेश्वरी देवी उन्हें रामायण की कथाएँ सुनाती थीं। आरंभिक पढ़ाई गाँव में एक मौलवी से फारसी में हुई, फिर छपरा के जिला स्कूल और पटना के टी. के. घोष एकेडमी में।
जून 1896 में बारह बरस के राजेंद्र का विवाह राजवंशी देवी से कर दिया गया। कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान पाने पर उन्हें तीस रुपये मासिक छात्रवृत्ति मिली और 1902 में वे प्रेसिडेंसी कॉलेज, कलकत्ता में दाखिल हुए। दिसंबर 1907 में उन्होंने अर्थशास्त्र में एम.ए. प्रथम श्रेणी में पास किया। गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी में आने का निमंत्रण दिया था, पर परिवार की जिम्मेदारी के कारण वे पढ़ाई और वकालत की राह पर ही रहे।
वकालत, चंपारण और गांधी जी का प्रभाव
कलकत्ता के रिपन कॉलेज से कानून पढ़ने के बाद 1915 में उन्होंने मास्टर ऑफ लॉ की परीक्षा स्वर्ण पदक के साथ पास की और बाद में कानून में डॉक्टरेट भी प्राप्त की। पहले कलकत्ता और फिर पटना उच्च न्यायालय में उनकी वकालत खूब चली।
1917 में जब महात्मा गांधी नील किसानों की शिकायतें सुनने चंपारण आए, तो राजेंद्र बाबू स्वयंसेवकों के साथ उनके दल में शामिल हो गए। किसानों के बयान लिखना, कानूनी पक्ष तैयार करना और गाँव गाँव जाना उनका काम था। गांधी जी के साथ रहकर उन्होंने जात पात और छुआछूत की पुरानी धारणाएँ छोड़ दीं और अपना काम खुद करने की आदत डाली। इस अनुभव पर उन्होंने चंपारण में सत्याग्रह नाम की पुस्तक लिखी।
असहयोग, बिहार विद्यापीठ और भूकंप राहत
- 1921: असहयोग आंदोलन में वकालत छोड़ दी और पटना के पास राष्ट्रीय विद्यालय शुरू किया, जो बाद में सदाकत आश्रम में चला गया। साथियों के साथ बिहार विद्यापीठ की नींव रखी।
- पत्रकारिता: सर्चलाइट और देश जैसे पत्रों के लिए लेख लिखे और धन जुटाया।
- 1930: नमक सत्याग्रह में पटना के नखास तालाब पर आंदोलन का नेतृत्व किया और छह महीने की जेल हुई।
- 1934: 15 जनवरी को बिहार में भीषण भूकंप आया। उस समय वे जेल में थे। रिहा होते ही 17 जनवरी 1934 को बिहार केंद्रीय राहत समिति बनाई और राहत कार्य संभाला।
भूकंप राहत के काम ने उन्हें पूरे देश में एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में पहचान दिलाई।
कांग्रेस अध्यक्ष और संविधान सभा के अध्यक्ष
राजेंद्र प्रसाद तीन बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने: अक्टूबर 1934 में बंबई अधिवेशन में, 1939 में सुभाष चंद्र बोस के त्यागपत्र के बाद, और नवंबर 1947 में। स्वतंत्रता से पहले की अंतरिम सरकार में वे खाद्य और कृषि मंत्री रहे।
11 दिसंबर 1946 को वे संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष चुने गए। लगभग तीन वर्ष तक उन्होंने सभा की कार्यवाही निष्पक्षता से चलाई। प्रारूप समिति का नेतृत्व डॉ भीमराव अंबेडकर कर रहे थे। 24 जनवरी 1950 को सभा ने उन्हें भारत का पहला राष्ट्रपति चुना।
भारत के पहले राष्ट्रपति के बारह वर्ष
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ वे राष्ट्रपति बने और 13 मई 1962 तक इस पद पर रहे। 1952 और 1957 में वे फिर चुने गए। लगातार दो पूरे कार्यकाल पूरे करने वाले वे अकेले राष्ट्रपति हैं। पहले राष्ट्रपति होने के कारण इस पद की अनेक परंपराएँ उन्हीं के समय में बनीं।
पद छोड़ने के बाद 1962 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वे पटना के सदाकत आश्रम लौट आए, जहाँ 28 फरवरी 1963 को उनका निधन हुआ।
डॉ राजेंद्र प्रसाद की पुस्तकें
| पुस्तक | वर्ष | विधा / विशेषता |
|---|---|---|
| चंपारण में सत्याग्रह | 1922 | आंदोलन का प्रत्यक्ष विवरण |
| आत्मकथा | 1946 | हिंदी में लिखी आत्मकथा, बचपन से स्वतंत्रता संग्राम तक |
| इंडिया डिवाइडेड | 1946 | विभाजन के प्रश्न का विश्लेषण |
| महात्मा गांधी एंड बिहार, सम रेमिनिसेंसेज | 1949 | संस्मरण |
| बापू के कदमों में | 1954 | गांधी जी के साथ बिताए दिनों की यादें |
| सिंस इंडिपेंडेंस | 1960 | भाषणों का संग्रह |
उनकी हिंदी सरल, घरेलू और बोलचाल के करीब है। उनकी आत्मकथा इस विधा का अच्छा उदाहरण है, विधा की पहचान के लिए जीवनी और आत्मकथा पेज पढ़ें।
जीवन की मुख्य घटनाएँ: टाइम लाइन
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1884 | जीरादेई में जन्म |
| 1902 | प्रेसिडेंसी कॉलेज, कलकत्ता में प्रवेश |
| 1915 | मास्टर ऑफ लॉ, स्वर्ण पदक |
| 1917 | चंपारण में गांधी जी के साथ |
| 1921 | वकालत छोड़ी, बिहार विद्यापीठ |
| 1934 | भूकंप राहत, कांग्रेस अध्यक्ष |
| 1946 | संविधान सभा के अध्यक्ष |
| 1950 | भारत के पहले राष्ट्रपति |
| 1962 | पद से निवृत्ति, भारत रत्न |
| 1963 | पटना में निधन |
दस पंक्तियों का परीक्षा उत्तर
डॉ राजेंद्र प्रसाद (1884 से 1963)
डॉ राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सिवान जिले के जीरादेई गाँव में हुआ। उनके पिता महादेव सहाय और माता कमलेश्वरी देवी थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में प्रथम आए और 1915 में स्वर्ण पदक के साथ मास्टर ऑफ लॉ किया। 1917 में चंपारण सत्याग्रह में गांधी जी के सहयोगी बने और 1921 में वकालत छोड़ दी। वे तीन बार कांग्रेस अध्यक्ष और 1946 में संविधान सभा के अध्यक्ष बने। 26 जनवरी 1950 से 13 मई 1962 तक वे भारत के पहले राष्ट्रपति रहे। आत्मकथा, इंडिया डिवाइडेड और बापू के कदमों में उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। 1962 में उन्हें भारत रत्न मिला। 28 फरवरी 1963 को पटना में उनका निधन हुआ।
उत्तर में शीर्षक किस क्रम में आएँ, इसकी विधि लेखन टूल वाले पेज पर समझाई गई है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
राजेंद्र प्रसाद की जीवनी में उन्हें देशरत्न क्यों कहा गया?
बिहार और देश के लोगों ने उनकी विद्वता, त्याग और सादगी के कारण उन्हें प्यार से देशरत्न कहा। यह जनता का दिया हुआ नाम था, कोई सरकारी उपाधि नहीं।
डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का जीवन परिचय में राष्ट्रपति कार्यकाल कैसे लिखें?
लिखें कि वे 26 जनवरी 1950 से 13 मई 1962 तक भारत के पहले राष्ट्रपति रहे। 1952 और 1957 में उनका पुनः चुनाव हुआ, इसलिए वे लगभग बारह वर्ष इस पद पर रहे।
डॉ राजेंद्र प्रसाद की जीवनी के अनुसार वे संविधान सभा के अध्यक्ष कब बने?
11 दिसंबर 1946 को वे संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष चुने गए। इससे पहले कुछ दिन डॉ सच्चिदानंद सिन्हा अस्थायी अध्यक्ष रहे थे।
राजेंद्र प्रसाद का जीवन परिचय छोटे रूप में कितने वाक्यों में लिखें?
पाँच अंकों के प्रश्न में आठ से दस वाक्य पर्याप्त हैं। जन्म, माता-पिता, शिक्षा, चंपारण, संविधान सभा, राष्ट्रपति पद, पुस्तकें, भारत रत्न और मृत्यु इसी क्रम में रखें।
डॉ राजेंद्र प्रसाद जीवन परिचय में उनकी आत्मकथा का उल्लेख कैसे करें?
उन्होंने अपनी जीवन कथा को सीधा सा शीर्षक आत्मकथा दिया। हिंदी में लिखी यह पुस्तक 1946 में छपी।
राजेंद्र प्रसाद का निधन कहाँ हुआ?
राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद वे पटना के सदाकत आश्रम में रहने लगे थे। वहीं 28 फरवरी 1963 को उनका निधन हुआ।