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Nagarjun ka Jivan Parichay: नागार्जुन का जीवन परिचय

जनकविप्रगतिवादअपडेट: 16 Oct 2026

nagarjun ka jivan parichay एक ऐसे लेखक की कहानी है जिसने तीन नाम जिए: घर का नाम वैद्यनाथ मिश्र, मैथिली कविता का नाम "यात्री" और हिंदी संसार का नाम नागार्जुन। खेत, किसान, अकाल और साधारण आदमी की हँसी उनकी कविता के केंद्र में रहे, इसलिए पाठकों ने उन्हें "जनकवि" और प्यार से "बाबा" कहा।

नीचे नागार्जुन का जीवन परिचय, उनके उपन्यासों और कविता संग्रहों की सारणी, पुरस्कारों का क्रम, भाषा-शैली के बिंदु और class 10 के विद्यार्थियों के लिए छोटा उत्तर दिया गया है। उनकी मृत्यु 1998 में हुई, इसलिए उनकी रचनाएँ अभी कॉपीराइट में हैं; यहाँ कविताओं का केवल परिचय दिया गया है, पंक्तियाँ नहीं।

नागार्जुन का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • मूल नाम

    वैद्यनाथ मिश्र
  • उपनाम

    नागार्जुन (हिंदी), यात्री (मैथिली); लोग "बाबा" कहते थे
  • जन्म

    30 जून 1911, सतलखा गाँव (ननिहाल), मधुबनी, बिहार; पैतृक गाँव तरौनी, दरभंगा
  • मृत्यु

    5 नवंबर 1998, ख्वाजासराय, दरभंगा, बिहार
  • पिता / पत्नी

    गोकुल मिश्र / अपराजिता देवी
  • युग

    प्रगतिवाद, स्वतंत्रता के बाद की जनवादी कविता
  • रचनाएँ

    युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, तालाब की मछलियाँ (कविता); रतिनाथ की चाची, बलचनमा, बाबा बटेसरनाथ, वरुण के बेटे (उपन्यास)
  • भाषा

    हिंदी, मैथिली और संस्कृत
  • सम्मान

    साहित्य अकादमी पुरस्कार (मैथिली, पत्रहीन नग्न गाछ), भारत भारती (1983), साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप (1994)

nagarjun ka jivan parichay: वैद्यनाथ मिश्र से नागार्जुन तक

नागार्जुन का जन्म 30 जून 1911 को बिहार के मधुबनी जिले के सतलखा गाँव में, अपने ननिहाल में हुआ। उनका पैतृक गाँव दरभंगा जिले का तरौनी था। उनके पिता का नाम गोकुल मिश्र था। मिथिला का ग्रामीण वातावरण आगे चलकर उनके लेखन की जड़ बना।

उनकी आरंभिक पढ़ाई पारंपरिक पद्धति से संस्कृत में हुई। घर में बँधकर रहना उनके स्वभाव में नहीं था; वे लगातार घूमते रहे, और यही घुमक्कड़ी उनके मैथिली उपनाम "यात्री" में दिखती है। 1930 के दशक के आरंभ में वे इसी नाम से मैथिली कविताएँ लिखने लगे। उनका विवाह अपराजिता देवी से हुआ।

सन् 1935 में वे श्रीलंका गए और केलानिया के एक बौद्ध विहार में भिक्षु के रूप में दीक्षित होकर बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन किया। दीक्षा के समय उन्हें "नागार्जुन" नाम मिला, जो आगे उनकी स्थायी पहचान बना। भारत लौटकर वे गाँव और जनजीवन से गहराई से जुड़े रहे और कविता, उपन्यास तथा लेखों के माध्यम से गाँव का दुख शहर तक पहुँचाते रहे। 5 नवंबर 1998 को दरभंगा के ख्वाजासराय में 87 वर्ष की अवस्था में उन्होंने अंतिम साँस ली।

साहित्यिक परिचय

नागार्जुन प्रगतिवादी धारा के सबसे जनप्रिय कवियों में गिने जाते हैं। उनकी कविता में किसान की फसल, मजदूर की थकान, बच्चे की मुसकान और प्रकृति के दृश्य एक साथ मिलते हैं। वे जितने गंभीर करुणा के कवि हैं, उतने ही तीखे व्यंग्यकार भी; सत्ता, दिखावे और पाखंड पर उनकी व्यंग्य कविताएँ बहुत चर्चित रहीं।

उपन्यासकार के रूप में उन्होंने मिथिला के गाँवों को हिंदी कथा में जीवित कर दिया। "बलचनमा" एक खेतिहर मजदूर की आत्मकथा जैसी शैली में लिखा गया है, जबकि "वरुण के बेटे" मछुआरों के जीवन पर आधारित है। गाँव के यथार्थ को लिखने की यह परंपरा प्रेमचंद से जुड़ती है, और प्रकृति के प्रति उनका लगाव कई बार निराला की याद दिलाता है।

प्रमुख रचनाएँ: उपन्यास और कविता संग्रह

नागार्जुन के उपन्यास और काव्य
कृतिप्रकारकिस बारे में
रतिनाथ की चाची (1948)उपन्यासमिथिला के ग्रामीण समाज में स्त्री की पीड़ा
बलचनमा (1952)उपन्यासखेतिहर मजदूर की नजर से गाँव की व्यवस्था
नई पौध (1953)उपन्यासनई पीढ़ी और पुरानी रूढ़ियों का टकराव
बाबा बटेसरनाथ (1954)उपन्यासबरगद का पेड़ गाँव का इतिहास सुनाता है
वरुण के बेटे (1957)उपन्यासमछुआरा समुदाय का संघर्ष
युगधारा (1952)कविता संग्रहआरंभिक हिंदी कविताएँ
सतरंगे पंखों वालीकविता संग्रहप्रकृति और जीवन के रंग
पत्रहीन नग्न गाछमैथिली कविता संग्रहसाहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त

अन्य कविता संग्रहों में "तालाब की मछलियाँ", "खिचड़ी विप्लव देखा हमने" और "हजार-हजार बाँहों वाली" प्रसिद्ध हैं। संस्कृत में उन्होंने "धर्मलोक शतकम्" की रचना की। दुखमोचन, कुंभीपाक और उग्रतारा भी उनके उपन्यास हैं।

पाठ्यपुस्तक की कविताएँ: क्या पढ़ें, क्या समझें

एनसीईआरटी की कक्षा 10 की पुस्तक "क्षितिज" में नागार्जुन की दो कविताएँ हैं: "यह दंतुरित मुसकान" और "फसल"।

  • यह दंतुरित मुसकान: नए-नए दाँत निकले शिशु की हँसी देखकर कवि का कठोर मन भी पिघल जाता है। प्रवास से लौटे पिता और अनजान बच्चे के बीच माँ कड़ी बनती है। यहाँ वात्सल्य और प्रकृति के बिंब मुख्य हैं।
  • फसल: कवि बताते हैं कि फसल केवल बीज का फल नहीं, उसमें नदियों का पानी, अनेक हाथों का श्रम, मिट्टी का गुण, सूरज की किरणें और हवा का स्पर्श सब शामिल है।

इनके अलावा "अकाल और उसके बाद" में अकाल से घिरे घर का चित्र है, जहाँ अनाज लौटने पर घर के जीव-जंतु तक प्रसन्न होते दिखते हैं। "बादल को घिरते देखा है" उनकी प्रसिद्ध प्रकृति कविता है। परीक्षा में इन कविताओं का भाव अपने शब्दों में लिखें।

भाषा-शैली की विशेषताएँ

  • बोलचाल की खड़ी बोली, जिसमें मैथिली, भोजपुरी, संस्कृत और उर्दू के शब्द स्वाभाविक रूप से आते हैं।
  • व्यंग्यात्मक, वर्णनात्मक और आत्मीय संबोधन वाली शैली।
  • देशज बिंब: धान, कटहल, बगुला, तालाब, बरगद जैसे शब्द चित्र खड़ा कर देते हैं।
  • छंदबद्ध और मुक्त छंद दोनों में समान अधिकार; कई कविताएँ गेय भी हैं।
  • तत्सम शब्दों का प्रयोग जहाँ होता है, वहाँ भी अर्थ सरल रहता है।

सम्मान और साहित्य में स्थान

मैथिली कविता संग्रह "पत्रहीन नग्न गाछ" के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला (अकादमी की सूची में 1969 वर्ष दर्ज है)। उत्तर प्रदेश सरकार ने 1983 में उन्हें भारत भारती सम्मान दिया और 1994 में साहित्य अकादमी ने अपनी फ़ेलोशिप दी, जो किसी लेखक को मिलने वाला अकादमी का सबसे बड़ा सम्मान है।

हिंदी में वे प्रगतिवाद के स्तंभ माने जाते हैं और मैथिली में "यात्री" के रूप में आधुनिक कविता के प्रमुख कवि। दो भाषाओं में समान प्रतिष्ठा पाने वाले लेखक कम हैं। उनके समकालीन दिनकर और हरिशंकर परसाई के पृष्ठ भी तुलना के लिए उपयोगी हैं।

जीवन की मुख्य तिथियाँ

वर्षघटना
191130 जून को सतलखा, मधुबनी में जन्म
1930 के दशक"यात्री" नाम से मैथिली कविताएँ
1935श्रीलंका के केलानिया में बौद्ध भिक्षु की दीक्षा, नाम नागार्जुन
1948पहला उपन्यास "रतिनाथ की चाची"
1952"बलचनमा" और "युगधारा" प्रकाशित
1969साहित्य अकादमी पुरस्कार (मैथिली)
1983भारत भारती सम्मान
1994साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप
19985 नवंबर को दरभंगा में देहांत

बोर्ड परीक्षा हेतु नागार्जुन पर छोटा उत्तर

नागार्जुन (1911 से 1998)

जनकवि नागार्जुन का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उनका जन्म 30 जून 1911 को बिहार के मधुबनी जिले के सतलखा गाँव में हुआ; पैतृक गाँव तरौनी (दरभंगा) था। संस्कृत की पारंपरिक शिक्षा के बाद 1935 में वे श्रीलंका गए और बौद्ध दीक्षा लेकर नागार्जुन नाम पाया। मैथिली में वे "यात्री" नाम से लिखते थे। 5 नवंबर 1998 को दरभंगा में उनका निधन हुआ।

प्रमुख रचनाएँ: युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, तालाब की मछलियाँ (कविता); रतिनाथ की चाची, बलचनमा, वरुण के बेटे (उपन्यास)।

भाषा-शैली: बोलचाल की खड़ी बोली, देशज शब्द, व्यंग्य और आत्मीयता।

सम्मान: साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारत भारती, अकादमी फ़ेलोशिप।

स्थान: प्रगतिवादी काव्य के जनकवि के रूप में अमर।

यह पृष्ठ प्रिंट करने योग्य है। उत्तर का क्रम बदलना हो तो लेखन विधि वाला पृष्ठ देखें, और अन्य कवियों के लिए कवि सूची।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नागार्जुन का असली नाम क्या था?

नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था। मैथिली में वे "यात्री" नाम से लिखते थे और बौद्ध दीक्षा के बाद उन्हें नागार्जुन नाम मिला।

नागार्जुन किस तिथि को और किस गाँव में जन्मे?

वे 30 जून 1911 को बिहार के मधुबनी जिले के सतलखा गाँव में जन्मे, जो उनका ननिहाल था। उनका पैतृक गाँव दरभंगा जिले का तरौनी है।

साहित्य अकादमी ने नागार्जुन की किस कृति को पुरस्कृत किया?

मैथिली कविता संग्रह "पत्रहीन नग्न गाछ" पर। बाद में 1994 में उन्हें साहित्य अकादमी की फ़ेलोशिप भी मिली।

कक्षा 10 में नागार्जुन की कौन सी कविताएँ हैं?

एनसीईआरटी की पुस्तक क्षितिज में "यह दंतुरित मुसकान" और "फसल" कविताएँ हैं। पहली में शिशु की मुसकान का वात्सल्य है और दूसरी में फसल के पीछे छिपे प्रकृति और श्रम के योगदान का वर्णन।

नागार्जुन को जनकवि क्यों कहा जाता है?

उन्होंने किसान, मजदूर और गाँव के साधारण लोगों के सुख दुख को उन्हीं की भाषा में लिखा। उनकी कविताएँ सभाओं और आंदोलनों में पढ़ी जाती थीं, इसलिए वे जनता के कवि कहलाए।

नागार्जुन के प्रसिद्ध उपन्यास कौन से हैं?

रतिनाथ की चाची, बलचनमा, नई पौध, बाबा बटेसरनाथ, दुखमोचन और वरुण के बेटे उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। इनमें मिथिला का ग्रामीण जीवन विस्तार से आता है।