सीधे सामग्री पर जाएँ

Hazari Prasad Dwivedi ka jivan parichay: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

ललित निबंधबाणभट्ट की आत्मकथाअपडेट: 16 Oct 2026

Hazari prasad dwivedi ka jivan parichay एक ऐसे विद्वान की कहानी है जो ज्योतिष पढ़कर निकले, शांतिनिकेतन में हिंदी पढ़ाने पहुँचे और लौटे तो हिंदी के सबसे बड़े आलोचकों, ललित निबंधकारों और उपन्यासकारों में गिने जाने लगे। कबीर को नए ढंग से समझाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है।

बोर्ड परीक्षा में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय अक्सर पूछा जाता है, खासकर 12th के हिंदी प्रश्नपत्र में। खोज में इसे acharya hazari prasad dwivedi ka jivan parichay, dr hazari prasad dwivedi ka jivan parichay और hajari prasad dwivedi ka jivan parichay भी लिखा जाता है। नीचे पहले तथ्य हैं, फिर उनके तीन रूप (आलोचक, निबंधकार, उपन्यासकार), फिर रचनाओं की तालिका और अंत में लिखने लायक उत्तर। रिवीजन के लिए इसका प्रिंट रखना उपयोगी रहेगा।

हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • बचपन का नाम

    वैद्यनाथ द्विवेदी
  • जन्म

    19 अगस्त 1907, आरत दुबे का छपरा (ओझवलिया), ज़िला बलिया, उत्तर प्रदेश
  • मृत्यु

    19 मई 1979, दिल्ली
  • माता-पिता

    माता ज्योतिष्मती, पिता पंडित अनमोल द्विवेदी (संस्कृत के विद्वान)
  • शिक्षा

    काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 1930 में ज्योतिषाचार्य
  • कार्यक्षेत्र

    शांतिनिकेतन, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़
  • प्रमुख रचनाएँ

    बाणभट्ट की आत्मकथा, अशोक के फूल, कुटज, आलोक पर्व, कबीर, हिंदी साहित्य की भूमिका
  • सम्मान

    पद्म भूषण (1957), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1973, आलोक पर्व)
  • युग

    शुक्लोत्तर युग, आधुनिक हिंदी गद्य

Hazari prasad dwivedi ka jivan parichay: बलिया का बालक, काशी का विद्यार्थी

उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के आरत दुबे का छपरा गाँव में 19 अगस्त 1907 को उनका जन्म हुआ। पिता पंडित अनमोल द्विवेदी संस्कृत के अच्छे जानकार थे और माता का नाम ज्योतिष्मती था। घर में बालक को वैद्यनाथ कहकर बुलाया जाता था। संस्कृत और ज्योतिष का वातावरण बचपन से मिला, जो बाद में उनकी हर रचना में झलकता है।

1920 में बसरिकापुर के मिडिल स्कूल से प्रथम श्रेणी में परीक्षा पास करने के बाद वे 1923 में काशी आ गए। वहाँ कमच्छा की रणवीर संस्कृत पाठशाला से प्रवेशिका की परीक्षा दी। 1927 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हाई स्कूल, 1929 में इंटरमीडिएट और संस्कृत में शास्त्री, तथा 1930 में ज्योतिष विषय में आचार्य की उपाधि ली। यहीं से उनके नाम के साथ आचार्य शब्द जुड़ गया।

शांतिनिकेतन के बीस वर्ष

8 नवंबर 1930 को वे शांतिनिकेतन पहुँचे और लगभग बीस वर्ष वहाँ हिंदी पढ़ाई। यह समय उनके जीवन की दिशा तय करने वाला रहा। रवींद्रनाथ ठाकुर के सान्निध्य में उन्होंने भारतीय संस्कृति, लोक जीवन और साहित्य को खुली दृष्टि से देखना सीखा। गुरुदेव ठाकुर के प्रभाव से उनकी भाषा में सहजता और विचार में मानवीयता आई।

इसी दौर में सूर साहित्य (1936), हिंदी साहित्य की भूमिका (1940) और कबीर (1942) जैसी पुस्तकें आईं। कबीर पुस्तक में उन्होंने कबीरदास को केवल संत नहीं, बल्कि साहसी समाज चिंतक और बड़े कवि के रूप में प्रतिष्ठित किया। बाणभट्ट की आत्मकथा (1946) भी इन्हीं वर्षों की देन है।

काशी, चंडीगढ़ और फिर काशी

जुलाई 1950 में वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर और अध्यक्ष बने। मई 1960 में वहाँ से हटने के बाद जुलाई 1960 से पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर और अध्यक्ष रहे। अक्टूबर 1967 में वे फिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय लौटे और मार्च 1968 में रेक्टर बनाए गए। लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट्. की उपाधि से सम्मानित किया।

अध्यापन के साथ उनका लेखन लगातार चलता रहा। चारु चंद्रलेख, पुनर्नवा और अनामदास का पोथा इसी लंबे दौर के उपन्यास हैं। 19 मई 1979 को दिल्ली में ब्रेन ट्यूमर के कारण उनका देहांत हुआ।

साहित्यिक परिचय: एक लेखक, तीन रूप

आलोचक और इतिहासकार

उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास को लोक परंपरा और भारतीय चिंतन की लंबी धारा से जोड़कर देखा। हिंदी साहित्य का आदिकाल, नाथ संप्रदाय और मध्यकालीन धर्मसाधना में उनका शोध दिखता है।

ललित निबंधकार

अशोक के फूल, कुटज और शिरीष के फूल जैसे निबंधों में किसी पेड़ या फूल से बात शुरू होती है और इतिहास, संस्कृति, जीवन दर्शन तक पहुँच जाती है। हिंदी में ललित निबंध को प्रतिष्ठा दिलाने वालों में वे सबसे आगे हैं। एनसीईआरटी की 12वीं की पुस्तक आरोह में उनका निबंध शिरीष के फूल पढ़ाया जाता है।

उपन्यासकार

उनके चारों उपन्यास इतिहास की पृष्ठभूमि पर हैं। बाणभट्ट की आत्मकथा में हर्षकाल के कवि बाणभट्ट को कथा का नायक बनाकर उस युग का जीवन रचा गया है।

रचना संसार: उपन्यास, निबंध और आलोचना

रचनाविधाविशेषता
बाणभट्ट की आत्मकथा (1946)उपन्यासहर्षकालीन भारत, आत्मकथा शैली
चारु चंद्रलेख (1963)उपन्यासमध्यकाल का राजनीतिक, सांस्कृतिक चित्र
पुनर्नवा (1973)उपन्यासगुप्तकालीन पृष्ठभूमि
अनामदास का पोथा (1976)उपन्यासउपनिषद काल की कथा
अशोक के फूल (1950)निबंध संग्रहललित निबंधों की पहचान
कल्पलता (1951)निबंध संग्रहसंस्कृति और सौंदर्य
विचार और वितर्क (1957)निबंध संग्रहविचार प्रधान लेख
कुटज (1964)निबंध संग्रहपहाड़ी पौधे के बहाने जीवट का संदेश
आलोक पर्व (1972)निबंध संग्रहसाहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त
कबीर (1942)आलोचनाकबीर का नया मूल्यांकन
हिंदी साहित्य की भूमिका (1940)साहित्य इतिहासभारतीय चिंतन धारा से जोड़ा गया इतिहास
हिंदी साहित्य का आदिकाल (1952)साहित्य इतिहासआरंभिक हिंदी पर व्याख्यान

भाषा-शैली

द्विवेदी जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है, पर उसमें बोझ नहीं है। गंभीर विषय समझाते हुए वे बीच में बोलचाल के तद्भव शब्द, देशज शब्द और कभी कभी उर्दू अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्द भी ले आते हैं। उनके निबंध पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई गुरु सामने बैठकर बात कर रहा हो।

  • गवेषणात्मक शैली: शोध और इतिहास वाले लेखों में।
  • विचारात्मक शैली: साहित्य और समाज पर गंभीर चिंतन में।
  • भावात्मक शैली: प्रकृति और संस्कृति पर ललित निबंधों में।
  • व्यंग्यात्मक शैली: पाखंड और रूढ़ि पर हल्की चोट में।
  • आत्मपरक शैली: जहाँ लेखक अपने अनुभव से बात खोलता है।

जीवन क्रम एक तालिका में

वर्षघटना
1907बलिया में जन्म
1923पढ़ाई के लिए काशी आगमन
1930ज्योतिषाचार्य; 8 नवंबर को शांतिनिकेतन पहुँचे
1942कबीर पुस्तक प्रकाशित
1946बाणभट्ट की आत्मकथा
1950बनारस लौटकर हिंदी विभाग के अध्यक्ष
1957पद्म भूषण
1960पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़
1968काशी हिंदू विश्वविद्यालय के रेक्टर
1973आलोक पर्व पर साहित्य अकादमी पुरस्कार
197919 मई को दिल्ली में निधन

आलोचना और निबंध में द्विवेदी जी का महत्व

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद हिंदी आलोचना को नई दिशा देने वालों में द्विवेदी जी का नाम सबसे पहले आता है। शुक्ल जी ने जहाँ लोकमंगल और तुलसी को केंद्र में रखा, वहीं द्विवेदी जी ने कबीर और लोक परंपरा का महत्व दिखाया। ललित निबंध की विधा उनके हाथों में निखरी और ऐतिहासिक उपन्यास को उन्होंने सांस्कृतिक गहराई दी। इसलिए उन्हें आलोचक, निबंधकार और उपन्यासकार, तीनों रूपों में एक साथ याद किया जाता है। समान रुचि वाले विद्वान वासुदेव शरण अग्रवाल का परिचय भी पढ़ें।

बोर्ड परीक्षा के लिए आचार्य द्विवेदी का छोटा उत्तर

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म 19 अगस्त 1907 को बलिया ज़िले के आरत दुबे का छपरा गाँव में हुआ। पिता पंडित अनमोल द्विवेदी और माता ज्योतिष्मती थीं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 1930 में ज्योतिषाचार्य की उपाधि लेकर वे शांतिनिकेतन में हिंदी अध्यापक बने। बाद में काशी हिंदू विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे।

प्रमुख रचनाएँ: उपन्यास, बाणभट्ट की आत्मकथा, चारु चंद्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा; निबंध संग्रह, अशोक के फूल, कल्पलता, कुटज, आलोक पर्व; आलोचना, कबीर, सूर साहित्य, हिंदी साहित्य की भूमिका।

भाषा संस्कृतनिष्ठ, प्रवाहपूर्ण खड़ी बोली; शैली गवेषणात्मक, विचारात्मक, भावात्मक और व्यंग्यात्मक। 1957 में पद्म भूषण और 1973 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 19 मई 1979 को दिल्ली में वे चल बसे। हिंदी में ललित निबंध और सांस्कृतिक आलोचना के वे शिखर लेखक हैं।

शीर्षकों का क्रम इस मार्गदर्शिका में दिया है, और बाकी लेखकों की सूची मुख्य पेज पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हजारी प्रसाद का जीवन परिचय लिखते समय जन्म स्थान क्या लिखें?

उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के आरत दुबे का छपरा गाँव में हुआ, जिसे ओझवलिया के पास बताया जाता है। परीक्षा में बलिया ज़िला अवश्य लिखें।

द्विवेदी जी के किस निबंध संग्रह को साहित्य अकादमी ने सम्मानित किया?

1973 का साहित्य अकादमी पुरस्कार उन्हें आलोक पर्व के लिए दिया गया। इससे पहले 1957 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण दिया था।

बाणभट्ट की आत्मकथा किस प्रकार की रचना है?

यह 1946 में प्रकाशित ऐतिहासिक उपन्यास है। इसमें सम्राट हर्ष के समय के संस्कृत कवि बाणभट्ट अपनी कथा स्वयं कहते हुए दिखाए गए हैं, इसलिए इसका नाम आत्मकथा रखा गया।

द्विवेदी जी को आचार्य क्यों कहा जाता है?

उन्होंने 1930 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिष में आचार्य की उपाधि ली थी। आगे चलकर उनके अध्यापन और विद्वत्ता के कारण भी यह संबोधन उनके नाम का हिस्सा बन गया।

acharya hazari prasad dwivedi jivan parichay में कितने भाग लिखें?

जीवन की घटनाएँ, साहित्यिक योगदान, कृतियाँ, भाषा और शैली, तथा हिंदी में महत्व; ये पाँच भाग लिखना अच्छा रहता है। ऊपर दिया छोटा उत्तर इन्हीं भागों में बँटा है।

उनके प्रसिद्ध ललित निबंध कौन से हैं?

अशोक के फूल, कुटज, शिरीष के फूल और नाखून क्यों बढ़ते हैं उनके बहुत पढ़े जाने वाले निबंध हैं। इनमें प्रकृति के किसी रूप से शुरू करके जीवन और संस्कृति की बड़ी बात कही गई है।