Bharatendu harishchandra ka jivan parichay चौंतीस बरस की छोटी सी उम्र में सिमटा हुआ है, फिर भी इतने समय में उन्होंने हिंदी को पत्रिकाएँ दीं, मंच के लिए नाटक दिए, खड़ी बोली गद्य को रास्ता दिखाया और लेखकों की एक पूरी मंडली तैयार कर दी। इसीलिए उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक कहा जाता है और उनके समय को भारतेंदु युग।
नीचे भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन परिचय इन हिस्सों में बँटा है: परिवार, पुरी यात्रा, पत्रकारिता, उपाधि, नाटक, काव्य, उनका प्रसिद्ध दोहा, लेखन की भाषा और सबसे आखिर में बोर्ड उत्तर। जो पाठक bhartendu harishchandra ka jeevan parichay या bharatendu harishchandra ji ka jivan parichay खोजते हुए यहाँ पहुँचे हैं, उनके लिए भी यही सामग्री है। पेज को प्रिंट करके रिवीजन में रखा जा सकता है।

मुख्य बातें
मूल नाम
हरिश्चंद्र; उर्दू रचनाओं में उपनाम रसाजन्म
9 सितंबर 1850, काशी (वाराणसी)मृत्यु
6 जनवरी 1885, काशी, लगभग 34 वर्ष की आयु मेंमाता-पिता
माता पार्वती देवी, पिता गोपालचंद्र (कवि, उपनाम गिरिधरदास)उपाधि
भारतेंदु, 1880 में काशी के विद्वानों की सभा द्वारापत्रिकाएँ
कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगज़ीन (बाद में हरिश्चंद्र चंद्रिका), बालाबोधिनीप्रमुख रचनाएँ
अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा, सत्य हरिश्चंद्र, नीलदेवी, चंद्रावली, प्रेम मालिका, प्रेम सरोवरभाषा
कविता में ब्रजभाषा, गद्य और नाटक में खड़ी बोलीयुग
आधुनिक काल, भारतेंदु युग
Bharatendu harishchandra ka jivan parichay: काशी का बालक कवि
हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को काशी के एक प्रतिष्ठित और संपन्न परिवार में हुआ। पिता गोपालचंद्र ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे और गिरिधरदास उपनाम से लिखते थे। माता का नाम पार्वती देवी था। घर में कविता और भक्ति का वातावरण था, इसलिए बालक हरिश्चंद्र ने बहुत कम उम्र में ही छंद जोड़ना सीख लिया।
सुख सुविधा के बीच भी उनका बचपन दुख से अछूता नहीं रहा। पिता का देहांत संवत् 1917 (सन् 1860) में हुआ, जब हरिश्चंद्र लगभग दस वर्ष के थे। स्कूली पढ़ाई ज़्यादा नहीं चली, पर घर पर उन्होंने हिंदी, संस्कृत, उर्दू, बांग्ला और अंग्रेज़ी का ज्ञान अर्जित किया। यही बहुभाषी अध्ययन आगे उनके अनुवादों और नाटकों में दिखाई देता है।
पुरी यात्रा और बदली हुई दृष्टि
सन् 1865 में, पंद्रह वर्ष की आयु में, वे परिवार के साथ जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए। रास्ते में बंगाल के नए साहित्य, नाटक और सामाजिक सुधार के माहौल से उनका परिचय हुआ। इस यात्रा ने उनके मन पर गहरी छाप छोड़ी। लौटकर उन्होंने तय किया कि हिंदी में भी वैसे ही नाटक, उपन्यास और पत्र पत्रिकाएँ होनी चाहिए।
उन्होंने बांग्ला और संस्कृत के कई नाटकों का अनुवाद और रूपांतर किया। संस्कृत के मुद्राराक्षस, प्राकृत की कर्पूरमंजरी और बांग्ला के विद्यासुंदर के हिंदी रूप इसी लगन का परिणाम हैं। शेक्सपियर के मर्चेंट ऑफ़ वेनिस को उन्होंने दुर्लभ बंधु नाम से हिंदी में ढाला।
पत्रकारिता: कविवचन सुधा से हरिश्चंद्र चंद्रिका तक
भारतेंदु हिंदी पत्रकारिता के भी अगुआ हैं। उनकी पहली पत्रिका कविवचन सुधा थी, जो सन् 1868 में निकली (कुछ स्रोत 1867 बताते हैं)। इसमें पहले पुरानी कविताएँ छपती थीं, बाद में समाचार और लेख भी आने लगे।
1873 में उन्होंने हरिश्चंद्र मैगज़ीन शुरू की। आठ अंकों के बाद इसका नाम हरिश्चंद्र चंद्रिका कर दिया गया। स्त्रियों में पढ़ने लिखने की रुचि जगाने के लिए उन्होंने बालाबोधिनी पत्रिका निकाली। इन पत्रिकाओं में देश की दशा, अंग्रेज़ी शासन में बढ़ती गरीबी, स्त्री शिक्षा और समाज सुधार पर खुलकर लिखा गया। अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा उन्होंने साहित्य, पत्रिकाओं और लेखकों की सहायता में खर्च कर दिया।
भारतेंदु की उपाधि और भारतेंदु मंडल
उनके लेखन, उदारता और साहित्य सेवा से प्रभावित होकर सन् 1880 में काशी के विद्वानों की एक सभा ने उन्हें भारतेंदु (भारत का चंद्रमा) की उपाधि दी। तब से यही उनका नाम बन गया।
उनके आसपास लेखकों का एक दल जुड़ गया, जिसे भारतेंदु मंडल कहा जाता है। प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट और बदरीनारायण चौधरी प्रेमघन इसके प्रमुख सदस्य थे। इन लेखकों ने निबंध, नाटक और पत्रकारिता के द्वारा खड़ी बोली गद्य को मज़बूत किया। यही प्रेमघन आगे चलकर मिर्ज़ापुर में युवा रामचंद्र शुक्ल के प्रेरक बने। भारतेंदु युग के बाद द्विवेदी युग आया, जिसमें खड़ी बोली कविता की भाषा भी बनी; उस दौर के प्रमुख कवि मैथिलीशरण गुप्त थे।
नाटक: मौलिक और अनूदित
भारतेंदु को हिंदी नाटक का जनक माना जाता है। उन्होंने मौलिक नाटक भी लिखे और अनुवाद भी किए। उनके नाटकों में हास्य और व्यंग्य के साथ देश की दुर्दशा का दर्द भी है।
| नाटक | वर्ष | विशेषता |
|---|---|---|
| वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति | 1873 | धर्म के नाम पर हिंसा पर व्यंग्य |
| भारत दुर्दशा | 1875 | अंग्रेज़ी राज में भारत की बदहाली का प्रतीकात्मक चित्र |
| सत्य हरिश्चंद्र | 1876 | सत्य के लिए सब कुछ त्यागने वाले राजा की कथा |
| चंद्रावली | 1876 | कृष्ण भक्ति और प्रेम |
| नीलदेवी | 1881 | वीर नारी की ऐतिहासिक कथा |
| अंधेर नगरी | 1881 | मूर्ख राजा और अन्यायी व्यवस्था पर प्रहसन |
| विषस्य विषमौषधम् | वर्ष अनिश्चित | देशी रियासतों की दशा पर व्यंग्य |
| प्रेम जोगिनी, भारत जननी | वर्ष अनिश्चित | समाज और देश की दशा |
| मुद्राराक्षस, कर्पूरमंजरी, विद्यासुंदर, दुर्लभ बंधु | वर्ष अनिश्चित | संस्कृत, प्राकृत, बांग्ला और अंग्रेज़ी से रूपांतर |
अंधेर नगरी की कहावत जैसी पंक्ति, अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा, लोक जीवन में कहावत की तरह बोली जाने लगी।
काव्य रचनाएँ
कविता में भारतेंदु ने भक्ति, शृंगार, प्रकृति और देशभक्ति, चारों तरह के विषय लिए। उनकी कविता की भाषा ब्रजभाषा है, जिसमें मिठास और प्रवाह दोनों हैं।
- प्रेम और भक्ति की रचनाएँ: प्रेम मालिका (1872), प्रेम माधुरी (1875), प्रेम तरंग (1877), प्रेम फुलवारी, प्रेम सरोवर, प्रेम प्रलाप, कृष्णचरित्र।
- ऋतु और गीत: वर्षा विनोद (1880), मधु मुकुल (1881), राग संग्रह (1880), फूलों का गुच्छा (1882)।
- देशभक्ति: भारत भिक्षा, भारत वीरत्व और निज भाषा से जुड़ी रचनाएँ।
- भक्तों का परिचय: उत्तरार्द्ध भक्तमाल।
उनकी रचनाएँ उनके निधन के बाद भारतेंदु ग्रंथावली के रूप में संकलित हुईं।
निज भाषा वाला प्रसिद्ध दोहा
भारतेंदु का यह दोहा हिंदी दिवस से लेकर बोर्ड परीक्षा तक सबसे अधिक उद्धृत होता है:
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥
अर्थ: अपनी भाषा की उन्नति ही हर तरह की उन्नति की जड़ है। अपनी भाषा का ज्ञान न हो तो मन का दुख (सूल, यानी काँटे जैसी पीड़ा) दूर नहीं होता। भारतेंदु मानते थे कि विदेशी भाषा में पढ़कर ज्ञान तो मिल सकता है, पर जनता तक उसे पहुँचाने के लिए अपनी भाषा ही सबसे सशक्त माध्यम है।
भाषा-शैली
भाषा के क्षेत्र में भारतेंदु की खास उपलब्धि यह रही कि उन्होंने कविता के लिए ब्रजभाषा और गद्य के लिए खड़ी बोली, दोनों को साथ साधा। उनके गद्य में न तो संस्कृत का बोझ है और न ही फ़ारसी की कठिनाई; वह जनता की समझ में आने वाली सरल हिंदी है। लोकोक्तियाँ, मुहावरे और व्यंग्य उसे जीवंत बनाते हैं।
- भावात्मक शैली: भक्ति और प्रेम की कविताओं में।
- व्यंग्यात्मक और हास्य शैली: अंधेर नगरी और वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति में।
- विचारात्मक शैली: निबंधों और व्याख्यानों में।
- वर्णनात्मक शैली: यात्रा और समाज के चित्रण में।
भारतेंदु के जीवन की प्रमुख घटनाएँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1850 | 9 सितंबर को काशी में जन्म |
| 1860 | पिता गोपालचंद्र का देहांत |
| 1865 | परिवार के साथ जगन्नाथ पुरी यात्रा |
| 1868 | कविवचन सुधा का आरंभ |
| 1873 | हरिश्चंद्र मैगज़ीन; वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति |
| 1875 | भारत दुर्दशा |
| 1876 | सत्य हरिश्चंद्र, चंद्रावली |
| 1880 | भारतेंदु की उपाधि |
| 1881 | अंधेर नगरी, नीलदेवी |
| 1885 | 6 जनवरी को काशी में निधन |
हिंदी साहित्य में उनका स्थान युग निर्माता का है। उन्होंने रीतिकाल की परंपरा से निकलकर साहित्य को देश और समाज से जोड़ा। उनके बिना प्रेमचंद के यथार्थवादी गद्य तक पहुँचने का रास्ता बहुत लंबा होता।
भारतेंदु पर परीक्षा उत्तर, संक्षेप में
जीवन परिचय: भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को काशी में हुआ। पिता गोपालचंद्र गिरिधरदास उपनाम से कविता लिखते थे और माता पार्वती देवी थीं। उन्होंने घर पर ही हिंदी, संस्कृत, उर्दू, बांग्ला और अंग्रेज़ी सीखी। 1865 की पुरी यात्रा से उन्हें नए साहित्य की प्रेरणा मिली। 1880 में उन्हें भारतेंदु की उपाधि दी गई। 6 जनवरी 1885 को, मात्र 34 बरस जीकर, वे संसार से विदा हुए।
रचनाएँ: नाटक: अंधेर नगरी, भारत दुर्दशा, सत्य हरिश्चंद्र, नीलदेवी, चंद्रावली। काव्य: प्रेम मालिका, प्रेम सरोवर, प्रेम माधुरी, वर्षा विनोद। पत्रिकाएँ: कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र चंद्रिका, बालाबोधिनी।
भाषा-शैली: कविता में ब्रजभाषा, गद्य में सरल खड़ी बोली; भावात्मक, व्यंग्यात्मक और विचारात्मक शैली।
साहित्य में स्थान: वे आधुनिक हिंदी साहित्य और हिंदी नाटक के जनक माने जाते हैं।
दस अंकों वाले प्रश्न की तैयारी में लेखन विधि वाला पेज काम आएगा। ब्रजभाषा परंपरा के दूसरे कवि कवियों की सूची और मुख्य पेज उपयोगी हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारतेंदु कब जन्मे और कब उनका देहांत हुआ?
जन्म 9 सितंबर 1850, काशी और मृत्यु 6 जनवरी 1885, काशी लिखें। उनकी आयु केवल 34 वर्ष थी।
हरिश्चंद्र को भारतेंदु की उपाधि कब मिली?
सन् 1880 में काशी के विद्वानों की एक सार्वजनिक सभा ने उन्हें भारतेंदु की उपाधि दी। इसका अर्थ है भारत का चंद्रमा।
भारतेंदु युग किसे कहते हैं?
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध का वह समय, जब भारतेंदु और उनके मंडल के लेखकों ने हिंदी में नाटक, निबंध और पत्रकारिता की नींव रखी, भारतेंदु युग कहलाता है। इसे आधुनिक हिंदी साहित्य का पहला चरण माना जाता है।
अंधेर नगरी नाटक का विषय क्या है?
यह एक प्रहसन है जिसमें एक मूर्ख राजा के राज्य में हर चीज़ एक ही दाम पर बिकती है और न्याय का भी कोई ठिकाना नहीं है। इसके माध्यम से अन्यायी और विवेकहीन शासन पर व्यंग्य किया गया है।
bharatendu harishchandra ka jeevan parichay में पत्रिकाओं के नाम कौन से लिखें?
कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगज़ीन (जिसका नाम बाद में हरिश्चंद्र चंद्रिका हुआ) और स्त्रियों के लिए बालाबोधिनी। ये तीनों नाम लिखना पर्याप्त है।
भारतेंदु को आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक क्यों कहते हैं?
उन्होंने खड़ी बोली गद्य को लोकप्रिय बनाया, हिंदी में मौलिक नाटक लिखे, पत्रिकाएँ निकालीं और लेखकों की नई पीढ़ी तैयार की। साहित्य को दरबार और भक्ति से निकालकर देश और समाज की समस्याओं से जोड़ना उनकी सबसे बड़ी देन है।