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Rahim das ka jivan parichay: अब्दुर्रहीम खानखाना (रहीम) का जीवन परिचय

नीति के दोहेखानखानाअपडेट: 16 Oct 2026

rahim das ka jivan parichay हमें उस व्यक्ति से मिलवाता है जो एक साथ मुगल सेना का सेनापति, कई भाषाओं का विद्वान, दानवीर और हिंदी का लोकप्रिय नीति कवि था। जिन दोहों को हम बचपन से 'रहिमन' शब्द के साथ सुनते आए हैं, वे अकबर के दरबार के इसी बड़े अधिकारी अब्दुर्रहीम खानखाना के लिखे हैं।

लोग प्रायः उन्हें रहीम दास कहते हैं, पर उनका असली नाम अब्दुर्रहीम था और 'खानखाना' अकबर की दी हुई उपाधि थी। इस पृष्ठ पर उनका जीवन तीन भागों में बाँटा गया है: बचपन, अकबर का दरबार और अंतिम वर्ष। उसके बाद ग्रंथों की सूची, दोहों का सौंदर्य, भाषा और अंत में एक तैयार उत्तर है।

रहीम का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • पूरा नाम

    अब्दुर्रहीम खानखाना (काव्य नाम रहीम, रहिमन)
  • जन्म

    17 दिसंबर 1556, लाहौर
  • पिता

    बैरम खाँ, अकबर के संरक्षक
  • उपाधि

    खानखाना (सन् 1584, गुजरात विजय के बाद)
  • दरबार

    अकबर के नवरत्नों में गिने जाते हैं; जहाँगीर के समय तक सेवा
  • काल

    भक्तिकाल (नीति काव्य)
  • रचनाएँ

    रहीम दोहावली (सतसई), बरवै नायिका भेद, शृंगार सोरठा, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, नगर शोभा
  • भाषा

    ब्रज, अवधी; फ़ारसी, अरबी, तुर्की और संस्कृत के ज्ञाता
  • मृत्यु

    सन् 1627; मकबरा दिल्ली में निज़ामुद्दीन के पास

बचपन: बैरम खाँ का बेटा, अकबर की छाया में

रहीम का जन्म 17 दिसंबर 1556 को लाहौर में हुआ। उनके पिता बैरम खाँ बालक अकबर के संरक्षक और मुगल साम्राज्य के प्रधान सेनापति थे। माता मेवात के जमाल खाँ की पुत्री थीं। सन् 1561 में गुजरात की यात्रा के दौरान बैरम खाँ की हत्या हो गई, तब रहीम लगभग पाँच वर्ष के थे।

अकबर ने अनाथ बालक को अपने दरबार में बुला लिया और उसकी शिक्षा की उत्तम व्यवस्था की। रहीम ने अरबी, फ़ारसी, तुर्की, संस्कृत और हिंदी की ब्रज तथा अवधी बोलियाँ सीखीं, साथ ही युद्ध कला में भी निपुण हुए। अकबर ने बाद में उनका विवाह मिर्ज़ा अज़ीज़ कोका की बहन माह बानो से कराया।

rahim das ka jivan parichay: अकबर के दरबार का सितारा

युवा होते ही रहीम को बड़े सैनिक और प्रशासनिक काम सौंपे गए। सन् 1584 में गुजरात में मुज़फ़्फ़र शाह के विद्रोह को उन्होंने सरखेज के युद्ध में बहुत छोटी सेना के साथ दबा दिया। इस विजय से प्रसन्न होकर अकबर ने उन्हें 'खानखाना' बना दिया; इस उपाधि से आशय है खानों का खान, अर्थात सबसे बड़ा सरदार।

सन् 1589 में अकबर के कहने पर उन्होंने बाबर की आत्मकथा बाबरनामा का तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद किया, जो वाक़ियात-ए-बाबरी नाम से प्रसिद्ध है। वे अकबर के नवरत्नों में गिने जाते हैं। दक्षिण के अभियानों में भी उन्होंने सेना का नेतृत्व किया।

रहीम अपनी उदारता के लिए भी प्रसिद्ध थे। कहा जाता है कि दान देते समय वे आँखें नीची रखते थे, ताकि लेने वाले को संकोच न हो। विद्वानों और कवियों को वे खुले हाथ से सहायता देते थे।

अंतिम वर्ष और मृत्यु

अकबर की मृत्यु के बाद जहाँगीर के शासन में रहीम को कई उतार चढ़ाव देखने पड़े। पत्नी माह बानो का देहांत तो अकबर के समय में ही हो चुका था, और बाद के वर्षों में पारिवारिक दुख भी बढ़ते गए। जीवन के उत्तरार्ध की यह पीड़ा और अनुभव उनके कई दोहों में दिखाई देता है, जहाँ वे विपत्ति में सच्चे मित्र की पहचान की बात करते हैं।

सन् 1627 में उनका देहांत हुआ। कुछ स्रोत मृत्यु स्थान आगरा और कुछ दिल्ली बताते हैं। उन्हें दिल्ली में निज़ामुद्दीन के पास उसी मकबरे में दफ़नाया गया, जो उन्होंने सन् 1598 में अपनी पत्नी के लिए बनवाया था। यह मकबरा हुमायूँ के मकबरे के पास मथुरा रोड पर स्थित है।

रहीम: वर्षवार घटनाएँ
तिथि / वर्षघटना
17 दिसंबर 1556लाहौर में जन्म
सन् 1561पिता बैरम खाँ की हत्या; अकबर के संरक्षण में पालन
सन् 1584सरखेज विजय के बाद खानखाना की उपाधि
सन् 1589बाबरनामा का फ़ारसी अनुवाद
सन् 1598दिल्ली में पत्नी के लिए मकबरे का निर्माण
सन् 1627देहांत; दिल्ली के मकबरे में दफ़न

रचनाएँ

रहीम की प्रमुख रचनाएँ
रचनाभाषा / छंदविषय
रहीम दोहावली (सतसई)ब्रज, दोहानीति, व्यवहार, प्रेम और भक्ति के दोहे
बरवै नायिका भेदअवधी, बरवै छंदनायिकाओं के भेदों का वर्णन
शृंगार सोरठाब्रज, सोरठाश्रृंगार रस के छंद
मदनाष्टकसंस्कृत मिश्रित ब्रजकृष्ण लीला पर आठ छंद
रास पंचाध्यायीब्रजभागवत के रास प्रसंग पर आधारित
नगर शोभाब्रज, दोहानगर के अलग अलग व्यवसायों से जुड़ी स्त्रियों का श्रृंगारिक वर्णन
खेटकौतुकम्संस्कृतज्योतिष ग्रंथ
वाक़ियात-ए-बाबरीफ़ारसीबाबरनामा का अनुवाद

उनकी हिंदी रचनाएँ रहीम ग्रंथावली में संकलित हैं। परीक्षा में रहीम दोहावली, बरवै नायिका भेद, मदनाष्टक और शृंगार सोरठा लिखना पर्याप्त है।

रहीम के दोहे: अनुभव से निकली नीति

रहीम की प्रसिद्धि का सबसे बड़ा आधार उनके नीति के दोहे हैं। इनमें दरबार, युद्ध, धन और विपत्ति, सबका निजी अनुभव बोलता है। प्रेम संबंधों की नाज़ुकता पर उनका यह दोहा कक्षा 9 में पढ़ाया जाता है:

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय।
टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय॥

अर्थात प्रेम का धागा झटके से मत तोड़ो; टूटने पर वह फिर जुड़ता नहीं, और जुड़े भी तो बीच में गाँठ रह जाती है। परोपकार पर उनका एक और दोहा है:

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियत न पान।
कहि रहीम परकाज हित, संपति सँचहिं सुजान॥

पेड़ अपने फल नहीं खाता और सरोवर अपना पानी नहीं पीता; उसी तरह सज्जन दूसरों के हित के लिए धन जोड़ते हैं। इन दोहों में उपदेश सीधा नहीं, बल्कि रोज़ की वस्तुओं के उदाहरण से दिया गया है, यही रहीम की कला है।

भाषा-शैली

रहीम ब्रज और अवधी दोनों में समान सहजता से लिखते थे। दोहावली की भाषा ब्रज है, जबकि बरवै नायिका भेद में पूर्वी अवधी का मधुर रूप मिलता है। मदनाष्टक में संस्कृत और ब्रज का मेल है। उनकी शैली मुक्तक और दृष्टांत प्रधान है: पहले एक बात कही, फिर प्रकृति या जीवन से उदाहरण देकर उसे पक्का कर दिया। दोहा, सोरठा और बरवै उनके प्रिय छंद हैं। दृष्टांत, उपमा और अन्योक्ति अलंकार सबसे अधिक आते हैं, और भाषा इतनी सरल है कि उनके दोहे कहावतों की तरह बोले जाते हैं।

हिंदी साहित्य में रहीम का स्थान

नीति काव्य में रहीम की बराबरी का कवि ढूँढना कठिन है। कबीर ने साखियों में जो नैतिक शिक्षा दी, रहीम ने उसे दरबारी जीवन के अनुभव और काव्य की मिठास के साथ कहा। रसखान की तरह वे भी हिंदी और कृष्ण भक्ति साहित्य से गहरे जुड़े रहे। लोक में यह भी प्रसिद्ध है कि तुलसीदास से उनकी मित्रता थी, हालाँकि इसके प्रमाण कम हैं। एक सेनापति होते हुए भी इतना कोमल काव्य लिखना उन्हें बहुत विशेष बनाता है।

रहीम पर परीक्षा का उत्तर एक नज़र में

पाँच अंक वाले प्रश्न का यह उत्तर छापकर दोहराने योग्य रूप में दिया गया है।

जीवन परिचय: अब्दुर्रहीम खानखाना का जन्म 17 दिसंबर 1556 को लाहौर में हुआ। उनके पिता बैरम खाँ अकबर के संरक्षक थे। पिता की मृत्यु के बाद अकबर ने उनका पालन किया। उन्होंने अरबी, फ़ारसी, तुर्की, संस्कृत और हिंदी सीखी। गुजरात विजय के बाद सन् 1584 में उन्हें खानखाना की उपाधि मिली। वे अकबर के नवरत्नों में थे। सन् 1627 में उनका देहांत हुआ।
रचनाएँ: रहीम दोहावली, बरवै नायिका भेद, शृंगार सोरठा, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी, नगर शोभा।
भाषा-शैली: ब्रज और अवधी; मुक्तक और दृष्टांत शैली; दोहा, सोरठा, बरवै छंद।
साहित्य में स्थान: हिंदी के श्रेष्ठ नीति कवि।

दोहाकार कवियों के उत्तर का ढाँचा उत्तर लेखन मार्गदर्शिका से मिलाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

रहीम दास का जीवन परिचय लिखते समय उनका पूरा नाम क्या लिखें?

अब्दुर्रहीम खानखाना। रहीम उनका काव्य नाम है और खानखाना अकबर द्वारा दी गई उपाधि है। लोक में उन्हें रहीम दास भी कहा जाता है।

रहीम कहाँ और किस तारीख को जन्मे?

17 दिसंबर 1556 को लाहौर में। उनके पिता बैरम खाँ थे।

रहीम को खानखाना की उपाधि क्यों मिली?

सन् 1584 में गुजरात के सरखेज युद्ध में मुज़फ़्फ़र शाह को हराने पर अकबर ने उन्हें यह उपाधि दी। इसका अर्थ है खानों का खान।

rahim ka jivan parichay में कौन सी रचनाएँ लिखें?

रहीम दोहावली (सतसई), बरवै नायिका भेद, शृंगार सोरठा, मदनाष्टक, रास पंचाध्यायी और नगर शोभा। फ़ारसी में बाबरनामा का अनुवाद भी उल्लेखनीय है।

क्या rahim das ji ka jivan parichay तथा rahim ji ka jivan parichay अलग अलग कवियों के हैं?

बिलकुल नहीं; दोनों नाम उसी अब्दुर्रहीम खानखाना की ओर इशारा करते हैं। प्रश्न किसी भी रूप में आए, ऊपर का संक्षिप्त उत्तर लिखा जा सकता है।

रहीम की मृत्यु कब हुई और मकबरा कहाँ है?

सन् 1627 में। उनका मकबरा दिल्ली में निज़ामुद्दीन के पास हुमायूँ के मकबरे के निकट है, जिसे उन्होंने अपनी पत्नी के लिए बनवाया था।

रहीम दास का जीवन परिचय पढ़ने के बाद और किन कवियों को पढ़ें?

नीति और भक्ति के लिए कबीर, कृष्ण प्रेम के लिए रसखान और सूरदास। सभी कवियों की सूची कवि परिचय पर मिलेगी।