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Swami Vivekananda ka Jivan Parichay: स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

शिकागो 1893रामकृष्ण मिशनअपडेट: 16 Oct 2026

swami vivekananda ka jivan parichay केवल 39 वर्ष के जीवन की कहानी है, पर इतने छोटे जीवन में उन्होंने भारत के वेदांत दर्शन को विश्व मंच तक पहुँचाया और सेवा कार्य के लिए रामकृष्ण मिशन जैसी संस्था खड़ी की। उनका जन्मदिन 12 जनवरी भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

लोग इस विषय को swami vivekanand ji ka jivan parichay या vivekanand ki jivani या swami vivekananda jivani या swami vivekananda biography in hindi जैसे नामों से खोजते हैं। स्वामी विवेकानंद जी का जीवन परिचय इन हिंदी में यहाँ क्रम से दिया गया है, साथ में विवेकानंद की जीवनी की समय रेखा, प्रमुख कार्य, पुस्तकें और परीक्षा के लिए छोटा उत्तर भी है।

स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • बचपन का नाम

    नरेंद्रनाथ दत्त (घर में नरेन)
  • जन्म

    12 जनवरी 1863, 3 गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट, कलकत्ता
  • मृत्यु

    4 जुलाई 1902, बेलूर मठ, हावड़ा (आयु 39 वर्ष)
  • माता-पिता

    भुवनेश्वरी देवी और विश्वनाथ दत्त (कलकत्ता हाई कोर्ट में अटॉर्नी)
  • गुरु

    श्री रामकृष्ण परमहंस
  • शिक्षा

    मेट्रोपॉलिटन इंस्टिट्यूशन; जनरल असेंबली इंस्टिट्यूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) से बी.ए. (1884)
  • प्रमुख कार्य

    शिकागो धर्म महासभा में भाषण (1893), न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी (1894), रामकृष्ण मिशन (1 मई 1897), बेलूर मठ
  • पुस्तकें

    राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग, माई मास्टर, कोलंबो से अल्मोड़ा तक के व्याख्यान
  • स्मृति

    12 जनवरी राष्ट्रीय युवा दिवस; कन्याकुमारी में विवेकानंद शिला स्मारक (1970)

swami vivekananda ka jivan parichay: नरेन का बचपन और पढ़ाई

12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट स्थित पैतृक घर में नरेंद्रनाथ दत्त का जन्म हुआ। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाई कोर्ट में अटॉर्नी थे और उदार विचारों के लिए जाने जाते थे। माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक स्वभाव की गृहिणी थीं, जिनसे नरेन ने रामायण और महाभारत की कथाएँ सुनीं।

1871 में उन्होंने ईश्वरचंद्र विद्यासागर के मेट्रोपॉलिटन इंस्टिट्यूशन में प्रवेश लिया। आगे जनरल असेंबली इंस्टिट्यूशन से 1881 में फाइन आर्ट्स परीक्षा और 1884 में बी.ए. पास किया। दर्शन, इतिहास, साहित्य और पश्चिमी विचारकों का उन्होंने गहरा अध्ययन किया। संगीत, व्यायाम और तर्क में भी उनकी रुचि थी। युवावस्था में वे ब्रह्म समाज से भी जुड़े और ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न पूछने वाले जिज्ञासु विद्यार्थी के रूप में जाने गए।

रामकृष्ण परमहंस से भेंट और संन्यास

संभवतः नवंबर 1881 में कलकत्ता में सुरेंद्रनाथ मित्र के घर नरेन की पहली भेंट श्री रामकृष्ण से हुई। इसके बाद वे दक्षिणेश्वर जाने लगे। शुरू में वे रामकृष्ण की बातों को तर्क की कसौटी पर परखते रहे, पर धीरे धीरे उन्हें अपना गुरु मान लिया।

1884 में पिता के अचानक निधन से परिवार आर्थिक संकट में आ गया। इसी कठिन समय में गुरु के प्रति उनकी आस्था और दृढ़ हुई। 16 अगस्त 1886 को काशीपुर में रामकृष्ण का देहांत हुआ। इसके बाद नरेंद्र ने बराहनगर के एक पुराने मकान को मठ बनाकर गुरुभाइयों को साथ रखा और सबने संन्यास का मार्ग अपनाया।

भारत भ्रमण और कन्याकुमारी

1888 में वे मठ छोड़कर परिव्राजक संन्यासी के रूप में लगभग पाँच वर्ष तक भारत भर घूमे। इस यात्रा में उन्होंने राजाओं के महल भी देखे और गरीब किसानों की झोपड़ियाँ भी। देश की गरीबी और अशिक्षा ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।

खेतड़ी के राजा अजीत सिंह उनके प्रिय शिष्य बने और "विवेकानंद" नाम का सुझाव उन्हीं ने दिया। 25 से 27 दिसंबर 1892 तक उन्होंने कन्याकुमारी के समुद्र में स्थित एक शिला पर ध्यान किया। उसी स्थान पर 1970 में विवेकानंद शिला स्मारक बना।

शिकागो धर्म महासभा का भाषण (1893)

11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म महासभा शुरू हुई। स्वामी जी ने अपना संबोधन "अमेरिका के बहनो और भाइयो" शब्दों से आरंभ किया, जिस पर सभा देर तक तालियाँ बजाती रही। अपने भाषण में उन्होंने सहिष्णुता, सब धर्मों के प्रति सम्मान और सार्वभौमिक स्वीकृति की बात रखी।

इस भाषण के बाद वे अमेरिका और इंग्लैंड में व्याख्यान देने लगे। 1894 में न्यूयॉर्क में वेदांत सोसाइटी बनी। नवंबर 1895 में इंग्लैंड में उनकी भेंट मार्गरेट एलिज़ाबेथ नोबल से हुई, जो बाद में "भगिनी निवेदिता" के नाम से भारत आईं और यहाँ बालिकाओं की पढ़ाई के लिए जीवन लगा दिया। 11 सितंबर का दिन विश्व बंधुत्व दिवस के रूप में भी याद किया जाता है।

प्रमुख कार्य: रामकृष्ण मिशन और बेलूर मठ

15 जनवरी 1897 को वे कोलंबो पहुँचे, जहाँ से भारत लौटने की यात्रा में अनेक स्थानों पर भाषण दिए; ये "कोलंबो से अल्मोड़ा तक के व्याख्यान" नाम से छपे। 1 मई 1897 को कलकत्ता में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य शिक्षा, चिकित्सा, अकाल और बाढ़ राहत जैसी सेवा के माध्यम से मनुष्य की सहायता करना था। बेलूर मठ रामकृष्ण मठ और मिशन का मुख्यालय बना।

जून 1899 में वे दोबारा पश्चिम गए और 9 दिसंबर 1900 को कलकत्ता लौटे। 4 जुलाई 1902 की रात बेलूर मठ में ध्यान करते हुए 39 वर्ष की आयु में उनका देहांत हुआ।

विचार और पुस्तकें

स्वामी जी का मुख्य संदेश था कि हर मनुष्य में दिव्यता है और गरीब तथा दुखी की सेवा ही सच्ची पूजा है। वे युवाओं से आत्मविश्वास, चरित्र और शारीरिक बल पर ध्यान देने को कहते थे। कठोपनिषद का मंत्र "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" उनके भाषणों से बहुत प्रसिद्ध हुआ, जिसका भाव है: उठो, जागो और श्रेष्ठ जनों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो।

स्वामी विवेकानंद की प्रमुख पुस्तकें
पुस्तकविषय
राजयोग (1896)न्यूयॉर्क के व्याख्यानों पर आधारित, ध्यान और मन का अनुशासन
कर्मयोगनिष्काम कर्म और कर्तव्य
भक्तियोगप्रेम और भक्ति का मार्ग
ज्ञानयोगवेदांत दर्शन और आत्मज्ञान
माई मास्टरगुरु रामकृष्ण के बारे में व्याख्यान
वर्तमान भारत (बांग्ला)1899 में "उद्बोधन" पत्रिका में छपा भारतीय समाज पर निबंध

विवेकानंद की जीवनी: समय रेखा

सन्क्या हुआ
186312 जनवरी को कलकत्ता में जन्म
1881श्री रामकृष्ण से पहली भेंट
1884बी.ए. पास; पिता का निधन
1886गुरु रामकृष्ण का देहांत, बराहनगर मठ
1888 से 1893भारत भ्रमण
1892कन्याकुमारी शिला पर ध्यान
189311 सितंबर, शिकागो धर्म महासभा
1894न्यूयॉर्क वेदांत सोसाइटी
1897भारत वापसी; 1 मई को रामकृष्ण मिशन की स्थापना
1899 से 1900दूसरी पश्चिम यात्रा
19024 जुलाई को बेलूर मठ में देहांत

प्रभाव और महत्व

स्वामी विवेकानंद ने भारतीय नवजागरण में आत्मगौरव की भावना जगाई। अनेक स्वतंत्रता सेनानियों और विचारकों ने उनके भाषणों से प्रेरणा ली, जिनमें सुभाष चंद्र बोस का नाम प्रायः लिया जाता है। उनके समकालीन बंगाल के कवि रवींद्रनाथ टैगोर का जीवन भी इसी युग की तस्वीर दिखाता है। करुणा और सेवा पर आधारित उनके विचारों की तुलना के लिए गौतम बुद्ध का पृष्ठ भी देखें। ऐसे ही प्रेरक व्यक्तित्वों की सूची मुख्य पृष्ठ पर है।

परीक्षा हेतु स्वामी जी का परिचय: नमूना उत्तर

स्वामी विवेकानंद (1863 से 1902)

स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ। पिता विश्वनाथ दत्त अटॉर्नी थे और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। स्नातक (बी.ए.) की उपाधि उन्हें 1884 में मिली। 1881 में श्री रामकृष्ण परमहंस से भेंट हुई और वे उनके प्रमुख शिष्य बने। 11 सितंबर 1893 को शिकागो की विश्व धर्म महासभा में दिए भाषण से वे विश्व प्रसिद्ध हुए। 1 मई 1897 को उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं। 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में उनका देहांत हुआ। उनका जन्मदिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

अपने ढंग से उत्तर का क्रम तय करने में यह लेखन पृष्ठ सहायक है। इसे छापकर दोहराना आसान रहेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

विवेकानंद संन्यास से पहले किस नाम से जाने जाते थे?

संन्यास से पहले वे नरेंद्रनाथ दत्त थे, घर में उन्हें नरेन कहा जाता था। "विवेकानंद" नाम का सुझाव खेतड़ी के राजा अजीत सिंह ने दिया था।

स्वामी विवेकानंद का जन्म कब हुआ था?

उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ। इसी दिन को भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

शिकागो भाषण कब दिया गया था?

11 सितंबर 1893 को शिकागो की विश्व धर्म महासभा में। उन्होंने भाषण "अमेरिका के बहनो और भाइयो" संबोधन से शुरू किया था।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना कब हुई?

स्वामी विवेकानंद ने 1 मई 1897 को कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसका उद्देश्य शिक्षा, स्वास्थ्य और राहत कार्यों के माध्यम से सेवा करना था।

स्वामी विवेकानंद के गुरु कौन थे?

उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस थे, जिनसे उनकी पहली भेंट 1881 में हुई। गुरु के देहांत के बाद नरेंद्र ने गुरुभाइयों के साथ बराहनगर में मठ बनाया।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु कब और कैसे हुई?

4 जुलाई 1902 की रात बेलूर मठ में ध्यान करते हुए उनका देहांत हुआ। वे तब केवल 39 वर्ष के थे।