सीधे सामग्री पर जाएँ

Mirabai ka jivan parichay: मीरा बाई का जीवन परिचय और कृष्ण भक्ति

कृष्ण भक्तिमीरा पदावलीअपडेट: 16 Oct 2026

mirabai ka jivan parichay राजमहल से निकलकर गिरधर गोपाल के मंदिर तक पहुँचने वाली एक राजकुमारी की कथा है, जिसने लोक लाज की परवाह किए बिना कृष्ण को ही अपना पति माना। मीरा हिंदी की सबसे प्रसिद्ध भक्त कवयित्री हैं और उनके पद राजस्थान से गुजरात और ब्रज तक समान प्रेम से गाए जाते हैं।

मीरा के जीवन की कई घटनाएँ इतिहास से अधिक लोक परंपरा में सुरक्षित हैं। इसलिए यहाँ हर बात के साथ बताया गया है कि वह प्रमाणित है या जनश्रुति। पहले परिवार और विवाह, फिर संघर्ष, यात्रा, पदावली, भक्ति का स्वरूप और भाषा, और अंत में याद करने योग्य छोटा उत्तर दिया गया है।

मीराबाई का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • नाम

    मीराबाई (मीरा)
  • जन्म

    सन् 1498 (संवत् 1555) प्रचलित; कुछ पाठ्यपुस्तकें सन् 1503 देती हैं
  • जन्म स्थान

    कुड़की (चोकड़ी) गाँव, मेड़ता क्षेत्र, राजस्थान
  • पिता

    रत्नसिंह राठौड़; दादा राव दूदा (मेड़ता)
  • पति

    कुँवर भोजराज, मेवाड़ के राणा साँगा के पुत्र (विवाह सन् 1516)
  • आराध्य

    गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण)
  • काल / धारा

    भक्तिकाल, सगुण कृष्णभक्ति
  • रचनाएँ

    मीरा पदावली; परंपरा से नरसी जी का मायरा, गीत गोविंद टीका, राग गोविंद, राग सोरठ के पद
  • भाषा

    राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा, गुजराती का प्रभाव
  • मृत्यु

    सन् 1546 के आसपास (कुछ स्रोत 1547), द्वारका

मेड़ता की राजकुमारी: जन्म और बचपन

मीरा का जन्म राठौड़ राजवंश की मेड़ता शाखा में हुआ। उनके पिता रत्नसिंह राठौड़ थे और दादा राव दूदा मेड़ता के शासक थे। अधिकतर पुस्तकें जन्म वर्ष सन् 1498 (संवत् 1555) और स्थान कुड़की (चोकड़ी) गाँव बताती हैं; कुछ पाठ्यपुस्तकें सन् 1503 लिखती हैं, अतः विद्वानों में मतभेद है।

बचपन में माता का साथ छूट जाने पर उनका पालन दादा राव दूदा की देखरेख में मेड़ता में हुआ। दादा स्वयं वैष्णव भक्त थे, और घर का यही धार्मिक वातावरण मीरा के मन में बस गया। एक प्रसिद्ध जनश्रुति है कि बचपन में एक बारात देखकर मीरा ने पूछा कि मेरा दूल्हा कौन है, तो माँ ने हँसकर कृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा कर दिया। मीरा ने उसी दिन से गिरधर को अपना पति मान लिया। यह कथा प्रमाणित नहीं, पर उनके पदों के भाव से मेल खाती है।

mirabai ka jivan parichay: विवाह, वैधव्य और विरोध

सन् 1516 में मीरा का विवाह मेवाड़ के राणा साँगा के बड़े पुत्र और युवराज भोजराज से हुआ। विवाह के कुछ ही वर्ष बाद, लगभग सन् 1521 में, युद्ध में लगे घावों के कारण भोजराज का निधन हो गया। थोड़े समय में ससुर राणा साँगा और पिता रत्नसिंह भी नहीं रहे।

विधवा होने के बाद मीरा ने राजपरिवार की परंपराएँ छोड़ दीं। वे साधु संतों के साथ बैठतीं, मंदिर में नाचती और गाती थीं। ससुराल पक्ष को यह मर्यादा के विरुद्ध लगा। लोक कथाओं में आता है कि उन्हें विष का प्याला और साँप वाली पिटारी भेजी गई, पर कृष्ण कृपा से उनका कुछ नहीं बिगड़ा। ये प्रसंग उनके पदों में भी झलकते हैं, किंतु इतिहासकार इन्हें जनश्रुति मानते हैं।

चित्तौड़ से वृंदावन और द्वारका

बढ़ते विरोध के कारण मीरा ने चित्तौड़ छोड़ दिया। कुछ समय वे मेड़ता में रहीं, फिर ब्रज में वृंदावन गईं, जहाँ कृष्ण भक्तों की संगति में उनका भक्ति भाव और गहरा हुआ। जीवन के अंतिम वर्ष उन्होंने गुजरात के द्वारका में रणछोड़ जी के मंदिर में बिताए।

परंपरा के अनुसार मेवाड़ से उन्हें वापस बुलाने के लिए लोग द्वारका पहुँचे, तो मीरा रणछोड़ जी की मूर्ति में समा गईं। इतिहास में उनका देहांत सन् 1546 के आसपास द्वारका में माना जाता है; कुछ स्रोत 1547 लिखते हैं।

मीरा का जीवन क्रम
समयक्या हुआ
सन् 1498 (संवत् 1555)कुड़की गाँव में जन्म (प्रचलित मत)
बचपनमेड़ता में दादा राव दूदा के संरक्षण में पालन
सन् 1516मेवाड़ के युवराज भोजराज से विवाह
लगभग सन् 1521पति भोजराज का निधन
बाद के वर्षचित्तौड़ त्याग, मेड़ता और वृंदावन में निवास
लगभग सन् 1546द्वारका में देहांत

मीरा की रचनाएँ

मीरा ने कोई बड़ा प्रबंध काव्य नहीं लिखा। उनकी पहचान उनके फुटकर गेय पदों से है, जो बाद में मीरा पदावली के रूप में संकलित हुए। उनके नाम से हज़ारों पद प्रचलित हैं, पर विद्वान कुछ सौ को ही प्रामाणिक मानते हैं, क्योंकि अधिकांश पद बहुत बाद में लिखे गए।

मीरा के नाम से जुड़ी रचनाएँ
रचनाविधाटिप्पणी
मीरा पदावलीगेय पदकृष्ण प्रेम, विरह और समर्पण के पद; सबसे प्रामाणिक
नरसी जी का मायराकथा काव्यगुजराती भक्त नरसी मेहता से जुड़ा प्रसंग; प्रामाणिकता संदिग्ध
गीत गोविंद टीकाटीकाजयदेव के गीत गोविंद की टीका, परंपरा से मीरा की मानी जाती है
राग गोविंदपद संग्रहपरंपरा से जुड़ी रचना
राग सोरठ के पदपद संग्रहसोरठ राग में गाए जाने वाले पद

परीक्षा में मीरा पदावली अवश्य लिखें और बाकी के साथ जोड़ें कि वे परंपरा से मीरा की मानी जाती हैं।

भक्ति का स्वरूप: माधुर्य भाव

मीरा की भक्ति में कृष्ण पति हैं और वे स्वयं उनकी प्रेयसी। इसे माधुर्य भाव की भक्ति कहते हैं। उनके पदों में मिलन की खुशी कम और विरह की तड़प अधिक है, इसलिए करुणा और वियोग श्रृंगार उनके काव्य के मुख्य रस हैं। सबसे प्रसिद्ध पद की आरंभिक पंक्तियाँ हैं:

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥

इन पंक्तियों में मीरा स्पष्ट कहती हैं कि मोर मुकुट धारण करने वाले कृष्ण के अलावा उनका कोई नहीं। यहाँ न कोई दर्शन है, न तर्क; केवल सीधा, निडर प्रेम है, और यही उन्हें बाकी भक्त कवियों से अलग करता है।

क्या संत रैदास मीरा के गुरु थे?

मीरा के कुछ पदों में रैदास का नाम गुरु के रूप में आता है, और चित्तौड़ में मीरा मंदिर के पास एक छतरी पर रैदास के चरण चिह्न बने हैं। इसी आधार पर परंपरा संत रैदास को उनका गुरु मानती है। पर कई इतिहासकार कहते हैं कि दोनों के समय में अंतर है और इसका ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता। परीक्षा में लिख सकते हैं: 'परंपरा के अनुसार संत रैदास मीरा के गुरु माने जाते हैं।'

भाषा-शैली

  • भाषा: राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा; कई पदों में गुजराती और पंजाबी के शब्द भी, क्योंकि पद अलग अलग प्रदेशों में गाए जाते रहे।
  • शैली: गीति शैली; हर पद संगीत के राग में बँधा।
  • रस: श्रृंगार (विशेषकर वियोग) और शांत रस।
  • अलंकार: रूपक, उपमा, अनुप्रास; पर सजावट से अधिक भाव की सच्चाई।
  • गुण: माधुर्य और प्रसाद गुण; पद सरल और तुरंत समझ में आने वाले।

साहित्य में स्थान

भक्तिकाल में जब कविता लगभग पूरी तरह पुरुष कवियों की थी, तब मीरा ने अपनी अनुभूति अपनी आवाज़ में कही। इसी कारण उन्हें हिंदी की प्रथम प्रमुख भक्त कवयित्री माना जाता है। कृष्णभक्ति में सूरदास ने वात्सल्य को ऊँचाई दी, तो मीरा ने दांपत्य भाव की भक्ति को। आधुनिक युग में महादेवी वर्मा को उनकी विरह वेदना के कारण आधुनिक मीरा कहा गया, जो मीरा के प्रभाव का प्रमाण है।

मीरा पर पाँच अंक का उत्तर

नीचे का उत्तर कक्षा 10 के पाँच अंक वाले प्रश्न के माप का है; पृष्ठ छापकर पढ़ने योग्य बनाया गया है।

जीवन परिचय: कृष्णभक्त कवयित्री मीराबाई का जन्म सन् 1498 (संवत् 1555) में राजस्थान के मेड़ता क्षेत्र के कुड़की गाँव में हुआ बताया जाता है, पर कुछ पुस्तकें 1503 लिखती हैं। पिता रत्नसिंह राठौड़ थे और पालन दादा राव दूदा ने किया। सन् 1516 में मेवाड़ के युवराज भोजराज से विवाह हुआ, पर कुछ वर्ष बाद पति का देहांत हो गया। ससुराल के विरोध के बाद वे वृंदावन और फिर द्वारका गईं, जहाँ सन् 1546 के आसपास उनका देहांत हुआ।
रचनाएँ: मीरा पदावली; नरसी जी का मायरा, गीत गोविंद टीका, राग गोविंद।
भाषा-शैली: राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा, गीति शैली, पद छंद, वियोग श्रृंगार।
साहित्य में स्थान: माधुर्य भाव की श्रेष्ठ भक्त कवयित्री।

मीरा की तरह किसी और कवयित्री का उत्तर बनाना हो तो परिचय लेखन की पद्धति पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मीरा बाई का जीवन परिचय: उनका जन्म किस वर्ष हुआ?

सन् 1498 (संवत् 1555) सबसे प्रचलित है। अगर आपकी पाठ्यपुस्तक में सन् 1503 दिया है तो उसी का पालन करें; साथ में एक पंक्ति में बता सकते हैं कि इस पर दो मत हैं।

मीराबाई के पति कौन थे?

मेवाड़ के राणा साँगा के पुत्र कुँवर भोजराज। सन् 1516 में विवाह हुआ और लगभग 1521 में उनका निधन हो गया।

मीरा का जीवन परिचय लिखते समय उनकी मृत्यु कहाँ बताएँ?

गुजरात के द्वारका में, सन् 1546 के आसपास। परंपरा कहती है कि वे रणछोड़ जी की मूर्ति में समा गईं।

मीरा की भक्ति किस भाव की है?

माधुर्य या दांपत्य भाव की। वे कृष्ण को पति मानती थीं, इसलिए उनके पदों में प्रेम, समर्पण और विरह की तीव्रता है।

meera ka jivan parichay और mirabai ki jivani में कौन सी बातें ज़रूरी हैं?

जन्म, परिवार, विवाह, वैधव्य, कृष्ण भक्ति, द्वारका यात्रा और पदावली। mira bai ka jivan parichay या meera bai ka jivan parichay पूछा जाए, उत्तर यही रहेगा।

meera bai ka jeevan parichay के लिए मीरा की भाषा क्या लिखें?

राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा, जिसमें गुजराती का प्रभाव भी है। mirabai jivan parichay में यह भी लिखें कि उनकी शैली गीति शैली है।

मीरा जैसे और भक्त कवि कौन हैं?

कृष्णभक्ति में सूरदास और रसखान, रामभक्ति में तुलसीदास, और निर्गुण धारा में कबीर और रैदास। सबकी सूची कवि परिचय पृष्ठ पर है।