surdas ka jivan parichay शुरू करने से पहले ब्रज की उस भूमि की कल्पना कीजिए जहाँ यमुना किनारे बैठा एक नेत्रहीन गायक बालकृष्ण की लीलाओं को इतने सजीव ढंग से गाता था कि सुनने वालों को लगता था, उसने सब अपनी आँखों से देखा है। यही गायक कृष्णभक्ति शाखा के शिरोमणि महाकवि सूरदास हैं।
नीचे सूरदास का जीवन परिचय चार पड़ावों में बाँटा गया है, उसके बाद सूर के ग्रंथ, उनके पदों की खूबियाँ, ब्रज की मिठास और बोर्ड उत्तर का नमूना आता है। जहाँ विद्वानों में मतभेद है, वहाँ दोनों मत साथ में लिखे गए हैं ताकि उत्तर लिखते समय भ्रम न हो।

मुख्य बातें
नाम
सूरदास (सूर, सूरश्याम नाम से भी पद मिलते हैं)जन्म
संवत् 1535 (सन् 1478), वैशाख शुक्ल पंचमी; पुराना मत संवत् 1540 (सन् 1483)जन्म स्थान
रुनकता (आगरा-मथुरा मार्ग) या सीही (दिल्ली के पास); मतभेद हैपिता
रामदास (सारस्वत ब्राह्मण, गायक)गुरु
महाप्रभु वल्लभाचार्यसंप्रदाय
पुष्टिमार्ग; अष्टछाप के प्रमुख कविभाषा
ब्रजभाषारचनाएँ
सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरीमृत्यु
संवत् 1640 (सन् 1583), पारसौली, गोवर्धन के पास
सूरदास जी का जीवन परिचय (surdas ka jivan parichay): चार पड़ाव
1. जन्म और बचपन
पुष्टिमार्ग की परंपरा के अनुसार सूरदास वल्लभाचार्य से दस दिन छोटे थे। इसी आधार पर उनका जन्म संवत् 1535 (सन् 1478) में वैशाख शुक्ल पंचमी को माना जाता है, और पाठ्यपुस्तकें यही तिथि लेती हैं। पहले संवत् 1540 (सन् 1483) का मत चलता था। जन्मस्थान को लेकर भी दो मत हैं: एक मत आगरा-मथुरा मार्ग पर स्थित रुनकता गाँव का है, दूसरा गोस्वामी हरिराय के भावप्रकाश पर आधारित है, जो दिल्ली के पास सीही गाँव बताता है। पिता रामदास एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण और गायक बताए जाते हैं।
2. गऊघाट पर साधना
लगभग अठारह वर्ष की आयु में वे घर छोड़कर आगरा और मथुरा के बीच यमुना किनारे गऊघाट पर रहने लगे। यहाँ वे विनय और दैन्य भाव के पद गाते थे, और उनके कई शिष्य भी बन गए थे।
3. वल्लभाचार्य से दीक्षा
वार्ता साहित्य के अनुसार गऊघाट पर ही उनकी भेंट महाप्रभु वल्लभाचार्य से हुई। आचार्य ने उन्हें पुष्टिमार्ग में दीक्षा दी और दीनता के पदों के स्थान पर भगवान की लीला गाने को कहा। इसके बाद सूरदास गोवर्धन पर्वत पर श्रीनाथ जी के मंदिर में कीर्तन करने लगे। वल्लभाचार्य के पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ ने आठ कीर्तनकार कवियों का जो समूह बनाया, उसे अष्टछाप कहा गया, और सूरदास उसमें सबसे प्रसिद्ध हुए।
4. पारसौली में अंतिम समय
लंबा जीवन श्रीनाथ जी की सेवा और कीर्तन में बिताकर संवत् 1640 (सन् 1583) में गोवर्धन के पास पारसौली गाँव में उनका देहावसान हुआ। कुछ विद्वान संवत् 1642 भी मानते हैं।
क्या सूरदास जन्म से अंधे थे?
यह प्रश्न परीक्षा में भी पूछा जाता है और विद्वानों में इस पर मतभेद है। परंपरा उन्हें जन्मांध मानती है, और वार्ता साहित्य में भी यही लिखा है। दूसरी ओर कई आलोचक कहते हैं कि रंग, रूप, प्रकाश, बाल-चेष्टाओं और प्रकृति का जो सूक्ष्म चित्रण उनके पदों में है, वह किसी ऐसे व्यक्ति का लगता है जिसने कभी संसार को देखा हो। इसलिए एक मत यह भी है कि बाद में किसी कारण उनकी दृष्टि चली गई। परीक्षा में लिखें: 'सूरदास नेत्रहीन थे; वे जन्म से अंधे थे या बाद में हुए, इस पर विद्वानों में मतभेद है।'
सूरदास का जीवन परिचय एवं रचनाएँ
सूरदास के नाम से कई ग्रंथ मिलते हैं, पर तीन को प्रमुख माना जाता है। इनमें भी सूरसागर उनकी कीर्ति का आधार है।
| रचना | विधा | विशेषता |
|---|---|---|
| सूरसागर | गेय पद संग्रह | श्रीमद्भागवत के आधार पर कृष्ण लीला; परंपरा में सवा लाख पद कहे जाते हैं, पर कुछ हज़ार ही उपलब्ध हैं |
| सूरसारावली | पद / छंद | होली के रूपक में सृष्टि और लीला का वर्णन; प्रामाणिकता पर बहस है |
| साहित्य लहरी | दृष्टकूट पद | अलंकार और नायिका भेद से भरे कठिन, पहेलीनुमा पद |
सूरसागर का भ्रमरगीत प्रसंग, जिसमें गोपियाँ उद्धव के ज्ञान का उत्तर प्रेम से देती हैं, कक्षा 10 की पाठ्यपुस्तक में पढ़ाया जाता है। उसका पहला पद 'ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी' से आरंभ होता है। नल-दमयंती और ब्याहलो जैसे ग्रंथ भी उनके नाम से जोड़े जाते हैं, पर वे विवादित हैं।
काव्य की विशेषताएँ: वात्सल्य, श्रृंगार और भक्ति
वात्सल्य के सम्राट: बालकृष्ण का घुटनों चलना, माखन चुराना, दाऊ से रूठना और यशोदा से शिकायत करना, इन सबका ऐसा मनोवैज्ञानिक चित्रण हिंदी में और कहीं नहीं मिलता। एक प्रसिद्ध पद की पहली पंक्ति है:
मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो।
इसमें बालक कृष्ण माँ से शिकायत करते हैं कि बड़े भाई बलराम उन्हें बहुत चिढ़ाते हैं।
श्रृंगार के दोनों पक्ष: राधा-कृष्ण और गोपियों के प्रेम में संयोग का आनंद और कृष्ण के मथुरा चले जाने पर वियोग की पीड़ा, दोनों गहराई से आए हैं। भ्रमरगीत में वियोग श्रृंगार अपने चरम पर है।
सखा भाव की भक्ति: पुष्टिमार्ग में दीक्षा के बाद सूर की भक्ति सख्य भाव की हो गई। वे कृष्ण को आराध्य के साथ सखा की तरह भी देखते हैं, इसलिए उनके पदों में डर से अधिक अपनापन है।
भाषा-शैली
| पक्ष | विवरण |
|---|---|
| भाषा | साहित्यिक ब्रजभाषा; मधुर, कोमल और लोक जीवन के शब्दों से भरी |
| शैली | गीति शैली; हर पद किसी राग में गाने योग्य |
| छंद | मुख्य रूप से पद; कहीं कहीं दोहा और चौपाई |
| रस | वात्सल्य और श्रृंगार प्रमुख, शांत रस भी |
| अलंकार | उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा; साहित्य लहरी में श्लेष और दृष्टकूट |
| गुण | माधुर्य गुण की प्रधानता |
ब्रजभाषा को साहित्य की सबसे लोकप्रिय भाषा बनाने का श्रेय बहुत हद तक सूरदास को जाता है। उनके बाद तीन सौ वर्ष तक हिंदी कविता मुख्यतः ब्रज में ही लिखी जाती रही।
हिंदी साहित्य में सूरदास का स्थान
भक्तिकाल में सूरदास और तुलसीदास को हिंदी कविता के दो सबसे ऊँचे शिखर माना जाता है। एक प्रसिद्ध पुराने दोहे की पहली पंक्ति है: 'सूर सूर तुलसी ससी, उडुगन केसवदास', अर्थात सूर सूर्य हैं, तुलसी चंद्रमा और केशवदास तारे। आलोचकों ने एक ओर उनके वात्सल्य वर्णन को अद्वितीय माना, दूसरी ओर वियोग श्रृंगार में भी उन्हें बेजोड़ कहा। कृष्णभक्ति की यही धारा आगे मीराबाई और रसखान तक दिखाई देती है।
सूरदास: बोर्ड परीक्षा में लिखने का छोटा रूप
सूर पर प्रश्न प्रायः कक्षा 10 में आता है; नीचे का अनुच्छेद उसी माप का है और कागज़ पर छापकर दोहराया जा सकता है।
जीवन परिचय: महाकवि सूरदास का जन्म संवत् 1535 (सन् 1478) में रुनकता गाँव में माना जाता है; कुछ विद्वान सीही (दिल्ली के पास) को जन्मस्थान मानते हैं। पिता का नाम रामदास था। वे नेत्रहीन थे। गऊघाट पर वल्लभाचार्य से भेंट हुई, जिन्होंने उन्हें पुष्टिमार्ग में दीक्षा दी। वे श्रीनाथ जी के मंदिर में कीर्तन करते थे और अष्टछाप के प्रमुख कवि थे। संवत् 1640 (सन् 1583) में पारसौली में उनका देहांत हुआ।
रचनाएँ: सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी।
भाषा-शैली: मधुर ब्रजभाषा, गीति शैली, पद छंद; वात्सल्य और श्रृंगार रस।
साहित्य में स्थान: कृष्णभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि और वात्सल्य रस के सम्राट।
शीर्षकों का सही क्रम उत्तर लेखन का अभ्यास वाले पन्ने पर मिलेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सूरदास किस वर्ष जन्मे थे?
पाठ्यपुस्तकों के अनुसार संवत् 1535 (सन् 1478) में, वैशाख शुक्ल पंचमी को। पुराने विद्वान संवत् 1540 (सन् 1483) मानते थे, इसलिए विद्वानों में मतभेद है।
surdas ji ka jivan parichay लिखते हुए उनके दीक्षा गुरु कौन बताएँ?
महाप्रभु वल्लभाचार्य। उन्होंने गऊघाट पर सूरदास को पुष्टिमार्ग में दीक्षा दी और कृष्ण लीला गाने की प्रेरणा दी।
अष्टछाप क्या है?
गोस्वामी विट्ठलनाथ द्वारा चुने गए आठ कृष्णभक्त कीर्तनकार कवियों का समूह अष्टछाप कहलाता है। इसमें सूरदास, नंददास, परमानंददास, कुंभनदास, कृष्णदास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी और गोविंदस्वामी थे।
सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट क्यों कहते हैं?
क्योंकि उन्होंने बालकृष्ण की हर छोटी हरकत और माँ यशोदा के स्नेह का जितना सजीव और बारीक चित्रण किया, उतना किसी अन्य कवि ने नहीं किया।
surdas kavi parichay और surdas ki jivani में क्या फर्क है?
कवि परिचय में जीवन की घटनाओं के अलावा ग्रंथ, शैली और हिंदी में कवि का दर्जा भी बताया जाता है। जीवनी केवल जीवन की घटनाओं का विस्तृत वर्णन होती है। surdas ka kavi parichay, surdas ke jivan parichay या surdas ka jeevan parichay, किसी भी नाम से प्रश्न आए, ऊपर का संक्षिप्त उत्तर उपयोग करें।
सूरदास की मृत्यु कहाँ हुई?
गोवर्धन के पास पारसौली गाँव में, संवत् 1640 (सन् 1583) में। कुछ विद्वान संवत् 1642 को मृत्यु वर्ष मानते हैं।
क्या surdas jivan parichay in hindi में साहित्य लहरी लिखना ज़रूरी है?
तीनों प्रमुख रचनाएँ लिखना अच्छा रहता है, पर सबसे ज़रूरी सूरसागर है। साहित्य लहरी लिखें तो बताएँ कि इसमें दृष्टकूट पद हैं। अन्य कवियों की सूची के लिए कवि परिचय पृष्ठ देखें।