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Bhagat Singh ka jivan parichay (भगत सिंह का जीवन परिचय)

इंकलाब जिंदाबादअसेंबली बम 1929अपडेट: 16 Oct 2026

Bhagat singh ka jivan parichay केवल तेईस वर्ष के जीवन का विवरण है, पर इस छोटी सी आयु में उन्होंने जितना पढ़ा, लिखा और किया, वह पीढ़ियों को सोचने पर मजबूर करता है। bhagat singh ki jivani या bhagat singh biography in hindi की तलाश करने वाले विद्यार्थियों को यहाँ परिवार, क्रांतिकारी संगठन, मुकदमे, जेल के लेखन और बलिदान की प्रामाणिक जानकारी एक साथ मिलेगी।

भगत सिंह का जीवन परिचय लिखते समय याद रखें कि वे बंदूक से अधिक विचार के क्रांतिकारी माने जाते हैं। असेंबली में बम फेंककर भी वे भागे नहीं, ताकि अदालत को अपने विचार रखने का मंच बना सकें। उनके साथी चंद्रशेखर आजाद का जीवन भी इसी पेज के साथ पढ़ें, और अन्य क्रांतिकारियों की सूची स्वतंत्रता सेनानी विभाग में है।

शहीद भगत सिंह का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • पूरा नाम

    सरदार भगत सिंह
  • जन्म

    28 सितंबर 1907 (कुछ स्रोत 27 सितंबर), बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब (अब पाकिस्तान)
  • माता-पिता

    विद्यावती और किशन सिंह
  • शिक्षा

    डी.ए.वी. स्कूल और नेशनल कॉलेज, लाहौर
  • संगठन

    नौजवान भारत सभा, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन
  • प्रमुख कार्य / योगदान

    सांडर्स प्रकरण (1928), केंद्रीय असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929), जेल में कैदियों के अधिकारों के लिए भूख हड़ताल
  • रचनाएँ

    मैं नास्तिक क्यों हूँ, जेल नोटबुक, कीर्ति पत्रिका के लेख
  • मृत्यु

    23 मार्च 1931, लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी (शहीद दिवस)

Bhagat singh ka jivan parichay: परिवार में देशभक्ति की परंपरा

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गाँव में हुआ, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान में चला गया। कुछ स्रोत जन्मतिथि 27 सितंबर बताते हैं। पिता किशन सिंह और माता विद्यावती थीं। चाचा अजीत सिंह 1907 के किसान आंदोलन और गदर आंदोलन से जुड़े रहे, इसलिए घर में अंग्रेजी शासन के विरोध की चर्चा सामान्य बात थी।

गाँव के स्कूल के बाद उन्होंने लाहौर के दयानंद एंग्लो वैदिक स्कूल में पढ़ाई की। कहा जाता है कि 1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद बालक भगत सिंह वहाँ गए और खून से भीगी मिट्टी घर ले आए। यह घटना उनके मन पर गहरी छाप छोड़ गई।

नेशनल कॉलेज लाहौर और विचारों का निर्माण

1923 में उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में प्रवेश लिया, जिसे लाला लाजपत राय और भाई परमानंद जैसे नेताओं ने सरकारी शिक्षा के विकल्प के रूप में शुरू किया था। यहाँ इतिहास, राजनीति और दुनिया की क्रांतियों पर खूब पढ़ाई और बहस होती थी।

भगत सिंह ने रूसी, आयरिश और इतालवी स्वतंत्रता आंदोलनों के बारे में पढ़ा। वे हिंदी, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेजी चारों में लिखते पढ़ते थे। विवाह की बात चलने पर वे घर छोड़कर कानपुर चले गए और 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े। यहीं उनकी निकटता चंद्रशेखर आजाद से हुई।

नौजवान भारत सभा से एच.एस.आर.ए. तक

  • 1926: लाहौर लौटकर साथियों के साथ नौजवान भारत सभा बनाई, जो युवाओं को राष्ट्रीय और सामाजिक प्रश्नों पर संगठित करती थी।
  • 1926 से 1927: पंजाबी मासिक कीर्ति के संपादकीय काम से जुड़े।
  • 1927: विद्रोही नाम से लिखे एक लेख के कारण पहली बार गिरफ्तार हुए।
  • सितंबर 1928: दिल्ली में हुई बैठक में संगठन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रखा गया। नाम में सोशलिस्ट शब्द जोड़ने के पीछे भगत सिंह के विचारों की बड़ी भूमिका थी।

लाला लाजपत राय की मृत्यु और सांडर्स प्रकरण

30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध में निकले जुलूस पर लाठीचार्ज हुआ, जिसमें लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए। 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया। क्रांतिकारियों ने पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट को इसका जिम्मेदार माना।

17 दिसंबर 1928 को पहचान की गलती से सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन सांडर्स मारे गए। इस कार्रवाई में भगत सिंह के साथ राजगुरु और आजाद थे, जबकि योजना बनाने में सुखदेव की बड़ी भूमिका थी। इसके बाद भगत सिंह ने बाल कटवाकर और वेश बदलकर लाहौर छोड़ा। यही मामला आगे लाहौर षड्यंत्र केस कहलाया।

केंद्रीय असेंबली बम कांड (8 अप्रैल 1929)

पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल के विरोध में 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केंद्रीय विधानसभा में खाली स्थान पर दो बम फेंके। बम इस तरह बनाए गए थे कि किसी की जान न जाए। दोनों ने पर्चे फेंके, इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और भागने के बजाय गिरफ्तारी दी।

पर्चे का भाव यह था कि बहरी सरकार को सुनाने के लिए ऊँची आवाज चाहिए, और व्यक्तियों को मारा जा सकता है पर विचारों को नहीं। परीक्षा में इसे भावार्थ के रूप में ही लिखें।

इस मामले में दोनों को आजीवन कारावास की सजा मिली।

जेल का संघर्ष, मुकदमा और फाँसी

जेल में भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ होने वाले भेदभाव के विरुद्ध भगत सिंह और साथियों ने 1929 में लंबी भूख हड़ताल की। इसी हड़ताल में 63 दिन के उपवास के बाद 13 सितंबर 1929 को जतींद्रनाथ दास का निधन हुआ, जिससे पूरे देश में आक्रोश फैल गया। भगत सिंह की हड़ताल लगभग 116 दिन बाद 5 अक्टूबर 1929 को समाप्त हुई।

लाहौर षड्यंत्र केस में विशेष न्यायाधिकरण ने 7 अक्टूबर 1930 को तीनों साथियों भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के लिए मृत्युदंड का फैसला सुनाया। तय तारीख 24 मार्च थी, पर 23 मार्च 1931 की शाम लगभग साढ़े सात बजे लाहौर सेंट्रल जेल में तीनों को फाँसी दे दी गई। उनके शव गुप्त रूप से गंडा सिंह वाला गाँव के बाहर सतलुज के किनारे जलाए गए। बाद में हुसैनीवाला में राष्ट्रीय शहीद स्मारक बना।

भगत सिंह का लेखन

रचनाविधाविशेषता
मैं नास्तिक क्यों हूँवैचारिक लेखजेल में लिखा, अपने विचारों की तर्कपूर्ण व्याख्या, 1931 में प्रकाशित
जेल नोटबुकअध्ययन टिप्पणियाँजेल में पढ़ी पुस्तकों के अंश और टिप्पणियाँ, बाद में प्रकाशित
कीर्ति और अन्य पत्रों के लेखपत्रकारितासांप्रदायिकता, छुआछूत और युवाओं के कर्तव्य जैसे विषय
अदालत के बयान और पत्रबयान / पत्रक्रांति का अर्थ अन्याय पर टिकी व्यवस्था में बदलाव बताया

उनकी भाषा तर्क प्रधान और स्पष्ट थी। वे भावुकता से अधिक अध्ययन पर जोर देते थे।

भगत सिंह के जीवन की टाइम लाइन

वर्षघटना
1907बंगा में जन्म
1919जलियाँवाला बाग की घटना का प्रभाव
1923नेशनल कॉलेज, लाहौर
1926नौजवान भारत सभा
1928एच.एस.आर.ए., सांडर्स प्रकरण
1929असेंबली बम कांड, भूख हड़ताल
1930लाहौर षड्यंत्र केस में मृत्युदंड
193123 मार्च को फाँसी

भगत सिंह पर आठ से दस पंक्तियों का उत्तर

शहीद भगत सिंह (1907 से 1931)

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गाँव में हुआ। पिता किशन सिंह और माता विद्यावती थीं। उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ाई की। 1926 में नौजवान भारत सभा बनाई और 1928 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के प्रमुख सदस्य बने। लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद दिसंबर 1928 में सांडर्स प्रकरण हुआ। बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह ने 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की असेंबली में बम फेंके और खुद गिरफ्तारी दी। जेल में उन्होंने भूख हड़ताल की और मैं नास्तिक क्यों हूँ जैसे लेख लिखे। 23 मार्च 1931 को लाहौर में सुखदेव और राजगुरु के साथ उन्हें फाँसी दी गई। इंकलाब जिंदाबाद का नारा उनके नाम से जुड़ गया।

उत्तर का क्रम ठीक करना हो तो लेखन टूल उपयोगी है। आजाद हिंद फौज के नायक सुभाष चंद्र बोस का परिचय भी देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

bhagat singh jivan parichay में जन्मतिथि 27 या 28 सितंबर क्या लिखें?

अधिकतर पाठ्यपुस्तकें 28 सितंबर 1907 लिखती हैं, कुछ स्रोत 27 सितंबर बताते हैं। परीक्षा में 28 सितंबर 1907 लिखें और चाहें तो मतभेद का उल्लेख कर दें।

भगत सिंह ने असेंबली में बम क्यों फेंका?

उद्देश्य किसी को मारना नहीं, बल्कि दमनकारी कानूनों के विरोध में सरकार और देश का ध्यान खींचना था। इसलिए बम खाली स्थान पर फेंके गए और दोनों ने स्वयं गिरफ्तारी दी।

तीनों क्रांतिकारियों को किस दिन फाँसी हुई?

23 मार्च 1931 की शाम लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु फाँसी पर चढ़े। इसी दिन को शहीद दिवस के रूप में याद किया जाता है।

भगत सिंह की प्रसिद्ध रचना कौन सी है?

मैं नास्तिक क्यों हूँ उनका सबसे प्रसिद्ध लेख है, जो उन्होंने जेल में लिखा। उनकी जेल नोटबुक और कीर्ति पत्रिका के लेख भी उनके विचार समझने के लिए पढ़े जाते हैं।

जतींद्रनाथ दास कौन थे?

वे भगत सिंह के साथी क्रांतिकारी थे। लाहौर जेल में राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए 63 दिन की भूख हड़ताल के बाद 13 सितंबर 1929 को उनका निधन हुआ।

भगत सिंह का जीवन परिचय कितने शब्दों में लिखना चाहिए?

लघु उत्तर में 80 से 120 शब्द और दीर्घ उत्तर में 200 से 250 शब्द पर्याप्त हैं। जन्म, परिवार, संगठन, असेंबली बम कांड, लेखन और फाँसी अवश्य शामिल करें।