Jaishankar Prasad ka jivan parichay पढ़ना हो तो शुरुआत काशी की उन गलियों से करनी होगी जहाँ सुँघनी साहु का प्रसिद्ध घराना रहता था। इसी परिवार में जन्मे जयशंकर प्रसाद आगे चलकर छायावाद के प्रवर्तक कवि, ऐतिहासिक नाटकों के अग्रणी लेखक और भावपूर्ण कहानियों के रचनाकार बने। उनकी अमर कृति कामायनी को आधुनिक हिंदी का श्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है।
इस पेज पर जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय क्रम से दिया गया है: परिवार, संघर्ष, रचनाएँ, भाषा-शैली और साहित्य में स्थान। अंत में बोर्ड परीक्षा के लिए 8 से 10 पंक्तियों का उत्तर है। अपने शब्दों वाला उत्तर बनाना हो, उसके लिए जीवन परिचय कैसे लिखें पेज का लेखन टूल काम आएगा।

मुख्य बातें
पूरा नाम
जयशंकर प्रसादजन्म
30 जनवरी 1889 (माघ शुक्ल दशमी, संवत् 1946)जन्म स्थान
काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेशपिता
बाबू देवीप्रसाद साहु (कुछ स्रोतों में देवकी प्रसाद)मृत्यु
15 नवंबर 1937, वाराणसी (क्षय रोग से)युग
छायावाद (आधुनिक काल)प्रमुख रचनाएँ
कामायनी, आँसू, लहर, झरना, स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, कंकाल, तितलीसम्मान
कामायनी पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक
Jaishankar Prasad ka jivan parichay: बचपन, परिवार और संघर्ष
जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889 को काशी में हुआ। विक्रम संवत् के अनुसार यह माघ शुक्ल दशमी, संवत् 1946 की तिथि थी। उनके दादा शिवरत्न साहु तंबाकू और सुँघनी के बड़े व्यापारी थे, इसलिए यह घराना पूरे बनारस में सुँघनी साहु के नाम से जाना जाता था। पिता बाबू देवीप्रसाद साहु भी दानशील और कला-प्रेमी व्यक्ति थे। घर में कवियों, गायकों और विद्वानों का आना-जाना लगा रहता था, जिसका असर बालक जयशंकर पर बचपन से पड़ा।
पढ़ाई की शुरुआत घर पर हुई। संस्कृत, हिंदी, फ़ारसी और उर्दू के लिए अलग शिक्षक रखे गए। फिर उन्हें क्वींस कॉलेज, वाराणसी में भेजा गया, पर वहाँ वे केवल आठवीं कक्षा तक पढ़ सके। लगभग बारह वर्ष की आयु में पिता का देहांत हो गया और दो-तीन वर्ष के भीतर माता भी चल बसीं। बड़े भाई शंभुरत्न की मृत्यु के बाद सत्रह वर्ष के किशोर पर पूरे परिवार और कर्ज़ में डूबे व्यापार का भार आ गया।
इतनी कठिनाइयों के बीच भी उन्होंने स्वाध्याय नहीं छोड़ा। वेद, उपनिषद, पुराण, इतिहास और बौद्ध साहित्य का गहरा अध्ययन उन्होंने अपने बल पर किया। यही अध्ययन आगे उनके ऐतिहासिक नाटकों और कामायनी की दार्शनिक भूमि बना। उनके निजी जीवन में भी दुख कम नहीं थे; पहली दो पत्नियों का निधन कम आयु में हो गया था। लंबी बीमारी के बाद क्षय रोग से 15 नवंबर 1937 को केवल 48 वर्ष की आयु में वाराणसी में उनका निधन हुआ।
साहित्यिक परिचय: एक लेखक, पाँच विधाएँ
प्रसाद जी उन बिरले रचनाकारों में हैं जिन्होंने लगभग हर विधा में ऊँचा काम किया। आरंभ में वे कलाधर उपनाम से ब्रजभाषा में कविता लिखते थे; चित्राधार इसी दौर की रचना है। बाद में उन्होंने खड़ी बोली अपनाई और उसे कोमलता तथा गहराई दी।
कवि के रूप में
झरना, आँसू और लहर में छायावाद की सूक्ष्म भावुकता, प्रकृति का मानवीकरण और प्रेम की वेदना मिलती है। आँसू एक विरह काव्य है, जबकि लहर में ऐतिहासिक प्रसंगों पर आधारित कविताएँ भी हैं।
नाटककार के रूप में
स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु और राज्यश्री जैसे नाटकों में भारत के गौरवशाली अतीत को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ा गया है। हिंदी में ऐतिहासिक नाटक को साहित्यिक ऊँचाई देने का श्रेय मुख्य रूप से उन्हीं को जाता है।
कथाकार और उपन्यासकार के रूप में
छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी और इंद्रजाल उनके कहानी संग्रह हैं। कंकाल और तितली उपन्यास समाज की सच्चाई दिखाते हैं, जबकि इरावती अधूरा रह गया।
निबंधकार के रूप में
काव्य और कला तथा अन्य निबंध में उन्होंने भारतीय काव्य-परंपरा और रहस्यवाद पर गंभीर विचार रखे।
जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएँ (तालिका)
| रचना | विधा | विशेषता |
|---|---|---|
| कामायनी (1936) | महाकाव्य | मनु, श्रद्धा और इड़ा के माध्यम से मानव मन की यात्रा; 15 सर्ग |
| आँसू | गीति काव्य | विरह की वेदना, छायावादी बिंब |
| लहर, झरना | काव्य संग्रह | प्रकृति और प्रेम के कोमल गीत |
| स्कंदगुप्त (1928) | नाटक | गुप्त काल का शौर्य और देशप्रेम |
| चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी | नाटक | इतिहास, नारी सम्मान और राष्ट्रीय भावना |
| कंकाल (1929), तितली (1934) | उपन्यास | सामाजिक यथार्थ, ग्राम जीवन |
| आकाशदीप, आँधी, इंद्रजाल | कहानी संग्रह | भावुक, काव्यात्मक कहानियाँ |
कामायनी के सर्गों के नाम मन की अवस्थाओं पर रखे गए हैं, जैसे चिंता, आशा, श्रद्धा, लज्जा, इड़ा, संघर्ष और आनंद। इसी कारण इसे मनोवैज्ञानिक महाकाव्य भी कहा जाता है।
कामायनी की पहली पंक्तियाँ
कामायनी का आरंभ चिंता सर्ग से होता है। प्रलय के बाद अकेले बचे मनु हिमालय की चोटी पर बैठे जल-प्लावन को देख रहे हैं:
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह,
एक पुरुष, भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह।
इन दो पंक्तियों में ही प्रसाद की शैली की झलक मिल जाती है: तत्सम शब्द, चित्र जैसा दृश्य और भीतर छिपी गहरी उदासी। परीक्षा में कवि की विशेषता बताते समय ये पंक्तियाँ उदाहरण के रूप में लिखी जा सकती हैं।
भाषा-शैली
- भाषा: संस्कृतनिष्ठ, परिष्कृत खड़ी बोली। आरंभिक कविताएँ ब्रजभाषा में।
- शब्द चयन: तत्सम शब्दों की अधिकता, फिर भी लय और संगीत बना रहता है।
- शैली: काव्य में प्रतीकात्मक और चित्रात्मक; नाटकों में संवाद प्रधान; कहानियों में भावात्मक।
- अलंकार: रूपक, उपमा, मानवीकरण और अनुप्रास सहज रूप से आते हैं।
- छंद: तुकांत छंदों के साथ नए गीत-छंदों का प्रयोग।
कुछ आलोचक कहते हैं कि उनके नाटक मंच के लिए कठिन हैं, क्योंकि उनमें लंबे काव्यात्मक संवाद हैं। फिर भी पढ़ने वाले के मन पर उनका असर गहरा होता है।
हिंदी साहित्य में स्थान
छायावाद के चार प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं: प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा। इनमें प्रसाद को प्रवर्तक का दर्जा मिला है। कामायनी ने खड़ी बोली को वह गरिमा दी जो पहले केवल ब्रजभाषा और अवधी के महाकाव्यों में दिखती थी। नाटक के क्षेत्र में भारतेंदु हरिश्चंद्र के बाद सबसे बड़ा नाम उन्हीं का है। अन्य कवियों से तुलना के लिए कवि परिचय सूची देखें।
समय रेखा
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1889 | 30 जनवरी को काशी में जन्म |
| लगभग 1901 | पिता का निधन, कुछ वर्ष बाद माता का भी |
| किशोरावस्था | बड़े भाई शंभुरत्न की मृत्यु, घर और व्यापार की ज़िम्मेदारी |
| 1928 | स्कंदगुप्त नाटक की रचना |
| 1929 | कंकाल उपन्यास |
| 1934 | तितली उपन्यास |
| 1936 | कामायनी का प्रकाशन, बाद में मंगलाप्रसाद पारितोषिक |
| 1937 | 15 नवंबर को वाराणसी में देहांत |
परीक्षा में लिखने योग्य संक्षिप्त उत्तर
जिन विद्यार्थियों को jaishankar prasad ka jivan parichay short mein चाहिए, वे नीचे का उत्तर याद करें। यह पेज प्रिंट करके भी पढ़ा जा सकता है।
छायावाद के प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889 (संवत् 1946) को काशी के प्रसिद्ध सुँघनी साहु परिवार में हुआ।
पिता का नाम बाबू देवीप्रसाद था।
क्वींस कॉलेज में आठवीं तक पढ़ाई के बाद उन्होंने घर पर संस्कृत, हिंदी, उर्दू और फ़ारसी सीखी।
कम आयु में माता, पिता और बड़े भाई के निधन से घर का भार उन पर आ गया।
काव्य रचनाएँ: कामायनी, आँसू, लहर, झरना, चित्राधार।
नाटक: स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु।
उपन्यास: कंकाल, तितली, इरावती (अधूरा); कहानी संग्रह: आकाशदीप, आँधी, इंद्रजाल।
भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है, शैली चित्रात्मक और प्रतीकात्मक है।
कामायनी पर उन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक मिला।
15 नवंबर 1937 को क्षय रोग से उनका निधन हुआ; हिंदी में वे छायावाद के सबसे बड़े कवि और नाटककार माने जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
jaishankar prasad ji ka jivan parichay या जयशंकर प्रसाद जी का जीवन परिचय छोटे में कैसे लिखें?
पहले जन्म (30 जनवरी 1889, काशी) और परिवार लिखें, फिर शिक्षा और संघर्ष, उसके बाद रचनाएँ, भाषा-शैली और साहित्य में स्थान। अंत में मृत्यु (15 नवंबर 1937) लिखें। ऊपर दिया परीक्षा उत्तर इसी क्रम में है।
जयशंकर प्रसाद को छायावाद का प्रवर्तक क्यों कहते हैं?
झरना जैसी रचनाओं में सबसे पहले वह कोमल, प्रतीकात्मक और आत्मानुभूति वाली शैली दिखी जिसे बाद में छायावाद कहा गया। कामायनी ने इस धारा को शिखर तक पहुँचाया।
कामायनी के मुख्य पात्र कौन हैं?
मनु, श्रद्धा और इड़ा इसके मुख्य पात्र हैं। मनु मन का, श्रद्धा हृदय या आस्था का और इड़ा बुद्धि का प्रतीक मानी जाती है। काव्य इन तीनों के संतुलन से आनंद तक पहुँचने की कथा है।
प्रसाद का उपनाम क्या था?
ब्रजभाषा में आरंभिक कविताएँ लिखते समय वे कलाधर उपनाम का प्रयोग करते थे। बाद में वे जयशंकर प्रसाद नाम से ही प्रसिद्ध हुए।
जयशंकर प्रसाद के नाटकों की विशेषता क्या है?
उनके नाटक अधिकतर भारतीय इतिहास, विशेषकर मौर्य और गुप्त काल पर आधारित हैं। इनमें देशप्रेम, नारी गरिमा और सांस्कृतिक गौरव का भाव है, और गीत भी जुड़े रहते हैं।
jay shankar prasad jeevan parichay in hindi और jai shankar prasad ka jeevan parichay में अंतर है क्या?
नहीं, ये एक ही कवि के नाम की अलग वर्तनी हैं। सही नाम जयशंकर प्रसाद है; जय शंकर प्रसाद का जीवन परिचय, jaishankar prasad ki jivani, jaishankar prasad ki jivan parichay या jaishankar prasad ka kavi parichay खोजने पर भी यही जानकारी मिलती है।