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Ramdhari Singh Dinkar ka Jivan Parichay: ओज के कवि दिनकर

राष्ट्रकविरश्मिरथीअपडेट: 16 Oct 2026

Ramdhari Singh Dinkar ka jivan parichay जानना उस कवि को जानना है जिसकी पंक्तियाँ सुनकर स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में युवाओं का खून खौल उठता था। बिहार के एक साधारण किसान परिवार से निकले दिनकर ने ओज, विद्रोह और राष्ट्रप्रेम को कविता का मुख्य स्वर बनाया, और इसी कारण वे राष्ट्रकवि कहलाए।

पर दिनकर केवल वीर रस के कवि नहीं थे। उर्वशी जैसा कोमल प्रेम काव्य और संस्कृति के चार अध्याय जैसा गंभीर इतिहास ग्रंथ भी उन्हीं की कलम से निकला। नीचे रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय, पद, रचनाएँ, पुरस्कार और परीक्षा उत्तर क्रम से है।

रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय

मुख्य बातें

  • पूरा नाम

    रामधारी सिंह, उपनाम दिनकर
  • जन्म

    23 सितंबर 1908
  • जन्म स्थान

    सिमरिया गाँव, तब मुंगेर ज़िला (अब बेगूसराय), बिहार
  • माता-पिता

    मनरूप देवी, बाबू रवि सिंह
  • शिक्षा

    मोकामा घाट हाई स्कूल, पटना कॉलेज (पटना विश्वविद्यालय)
  • रचनाएँ

    रेणुका, हुंकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा; संस्कृति के चार अध्याय
  • सम्मान

    पद्म भूषण 1959, साहित्य अकादमी 1959, ज्ञानपीठ 1972 (उर्वशी)
  • मृत्यु

    24 अप्रैल 1974, मद्रास (चेन्नई)

Ramdhari Singh Dinkar ka jivan parichay: सिमरिया की मिट्टी से

दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को गंगा किनारे बसे सिमरिया गाँव में हुआ। उस समय यह मुंगेर ज़िले में था, आज बेगूसराय ज़िले में है। पिता बाबू रवि सिंह और माता मनरूप देवी खेती करने वाले साधारण लोग थे। घर में पैसे की कमी थी, इसलिए पढ़ाई के लिए बालक रामधारी को काफ़ी संघर्ष करना पड़ा।

गाँव के स्कूल और राष्ट्रीय मिडिल स्कूल के बाद उन्होंने मोकामा घाट हाई स्कूल से मैट्रिक किया। 1929 में वे पटना कॉलेज पहुँचे और पटना विश्वविद्यालय से स्नातक हुए। इतिहास, राजनीति और दर्शन उनके प्रिय विषय थे। हिंदी के साथ उन्होंने संस्कृत, मैथिली, बांग्ला, उर्दू और अंग्रेज़ी साहित्य भी पढ़ा। यही व्यापक अध्ययन आगे संस्कृति के चार अध्याय जैसी पुस्तक का आधार बना।

कविता का बीज बहुत पहले पड़ गया था। बारडोली सत्याग्रह पर उन्होंने विजय संदेश लिखी, जो 1928 में उनका पहला प्रकाशित संग्रह बनी। इसके बाद प्रणभंग (1929) आया, और 1935 में रेणुका ने उन्हें पूरे हिंदी प्रदेश में पहचान दिला दी।

नौकरी, पद और सार्वजनिक जीवन

दिनकर के प्रमुख पद
समयपद या कार्य
1934 से लगभग नौ वर्षबिहार सरकार में सब-रजिस्ट्रार
1950 से 1952लंगट सिंह कॉलेज, मुज़फ़्फ़रपुर में हिंदी विभाग
1952 से 1964राज्यसभा के सदस्य
1960 के दशक मेंभागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति

सरकारी नौकरी में रहते हुए भी उनकी कविताओं का स्वर अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध रहा। हुंकार (1938) जैसी रचनाओं ने उन्हें विद्रोही कवि के रूप में स्थापित किया। स्वतंत्रता के बाद संसद में रहते हुए भी उन्होंने लेखन जारी रखा और कई महत्वपूर्ण पुस्तकें इसी दौर में लिखीं।

साहित्यिक परिचय: ओज और शृंगार के दो स्वर

दिनकर के काव्य में दो धाराएँ साफ़ दिखती हैं।

पहली धारा ओज की है। रेणुका, हुंकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी और परशुराम की प्रतीक्षा में अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, शोषितों के प्रति सहानुभूति और देश के आत्मसम्मान की पुकार है। कुरुक्षेत्र में महाभारत के बाद भीष्म और युधिष्ठिर के संवाद के माध्यम से युद्ध और शांति के प्रश्न पर विचार किया गया है। रश्मिरथी कर्ण के जीवन पर आधारित खंड काव्य है, जो जन्म के आधार पर भेदभाव के विरुद्ध खड़ा होता है। परशुराम की प्रतीक्षा 1962 के चीनी आक्रमण के बाद लिखी गई ओजस्वी कविताओं का संग्रह है।

दूसरी धारा कोमल भावों की है। उर्वशी (1961) पुरुरवा और उर्वशी की कथा के माध्यम से प्रेम, सौंदर्य और काम के आध्यात्मिक पक्ष पर लिखा गया काव्य नाटक है। इसी कृति पर उन्हें ज्ञानपीठ मिला। इस तरह एक ही कवि में क्रांति की आग और प्रेम की मधुरता दोनों मिलती हैं।

दिनकर की कविता और गद्य कृतियाँ

रचनाविधाविशेषता
रेणुका (1935)काव्य संग्रहअतीत का गौरव और वर्तमान की पीड़ा
हुंकार (1938)काव्य संग्रहविद्रोह और राष्ट्रीय चेतना
कुरुक्षेत्र (1946)प्रबंध काव्ययुद्ध, हिंसा और न्याय पर चिंतन
रश्मिरथी (1952)खंड काव्यकर्ण का संघर्ष और स्वाभिमान
उर्वशी (1961)काव्य नाटकप्रेम और सौंदर्य का दर्शन; ज्ञानपीठ
परशुराम की प्रतीक्षा (1963)काव्य संग्रहराष्ट्र रक्षा का आह्वान
मिट्टी की ओर (1946)निबंधसाहित्य और समाज पर विचार
संस्कृति के चार अध्याय (1956)इतिहास और संस्कृतिभारतीय संस्कृति का विकास; साहित्य अकादमी
काव्य की भूमिका (1958)आलोचनाकाव्य सिद्धांत
लोकदेव नेहरू (1965)संस्मरणप्रथम प्रधानमंत्री पर संस्मरणात्मक पुस्तक

दिनकर की मृत्यु 1974 में हुई, इसलिए इस पेज पर उनकी पंक्तियाँ उद्धृत नहीं की गई हैं; मूल रचनाएँ पुस्तकालय या पाठ्यपुस्तक में पढ़ें।

पुरस्कार और सम्मान

  • 1959: संस्कृति के चार अध्याय पर साहित्य अकादमी पुरस्कार
  • 1959: भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण
  • 1968: राजस्थान विद्यापीठ द्वारा साहित्य चूड़ामणि सम्मान
  • 1972: उर्वशी के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार
  • भागलपुर विश्वविद्यालय से एल.एल.डी. की मानद उपाधि

परीक्षा में रामधारी सिंह दिनकर जीवन परिचय लिखते समय कम से कम तीन सम्मान वर्ष सहित लिखें: पद्म भूषण, साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ। ध्यान रहे कि साहित्य अकादमी पुरस्कार गद्य पुस्तक पर मिला था, कविता पर नहीं, जबकि ज्ञानपीठ एक काव्य कृति पर।

भाषा-शैली

दिनकर की भाषा शुद्ध, प्रवाहपूर्ण खड़ी बोली है। ओजपूर्ण कविताओं में तत्सम शब्द, कठोर ध्वनियाँ और छोटे, चोट करने वाले वाक्य हैं, ताकि पढ़ने वाला जाग उठे। रश्मिरथी जैसी रचनाओं में उर्दू और बोलचाल के शब्द भी सहज रूप से आते हैं, जिससे कविता आम पाठक तक पहुँचती है। उर्वशी में भाषा अधिक अलंकृत, संगीतमय और दार्शनिक है। शैली के मुख्य रूप हैं: ओजस्वी, प्रबंधात्मक, संवादात्मक और विचारात्मक। गद्य में वे तर्कपूर्ण और स्पष्ट लेखक हैं।

दिनकर का साहित्यिक महत्व और रोचक बातें

छायावाद के बाद हिंदी कविता को जनता से जोड़ने वालों में दिनकर सबसे आगे रहे। मैथिलीशरण गुप्त के बाद राष्ट्रकवि की पदवी जिस कवि के साथ सबसे अधिक जुड़ी, वे दिनकर ही हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान की तरह उनकी कविता ने भी स्वाधीनता की भावना को स्वर दिया।

  • उनकी पहली पुस्तक विजय संदेश बारडोली सत्याग्रह पर थी।
  • पद्म भूषण और साहित्य अकादमी, दोनों उन्हें एक ही वर्ष 1959 में मिले।
  • 24 अप्रैल 1974 को मद्रास (चेन्नई) में हृदयाघात से उनका देहांत हुआ।

ओज और राष्ट्रप्रेम वाले दूसरे रचनाकारों से मिलान करना हो तो कवि परिचय खोलें।

दिनकर पर परीक्षा उपयोगी उत्तर

बोर्ड परीक्षा के लिए यह उत्तर पर्याप्त है; इसे प्रिंट कर अपनी कॉपी में चिपका भी सकते हैं। अपना उत्तर तैयार करने में जीवन परिचय कैसे लिखें वाला टूल मदद करेगा।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के सिमरिया गाँव (तब मुंगेर, अब बेगूसराय) में हुआ।
उनके पिता बाबू रवि सिंह और माता मनरूप देवी थीं।
उन्होंने मोकामा घाट हाई स्कूल और पटना कॉलेज से शिक्षा पाई।
वे सब-रजिस्ट्रार, मुज़फ़्फ़रपुर में हिंदी प्राध्यापक, 1952 से 1964 तक राज्यसभा सदस्य और भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।
काव्य: रेणुका, हुंकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा।
गद्य: संस्कृति के चार अध्याय, मिट्टी की ओर, काव्य की भूमिका।
भाषा शुद्ध खड़ी बोली है, शैली ओजस्वी और प्रबंधात्मक है।
उन्हें पद्म भूषण, साहित्य अकादमी (1959) और उर्वशी पर ज्ञानपीठ (1972) मिला।
24 अप्रैल 1974 को मद्रास में उनका निधन हुआ।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दिनकर राष्ट्रकवि के नाम से क्यों प्रसिद्ध हैं?

उनकी कविताओं में देशप्रेम, स्वाभिमान और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का स्वर इतना प्रबल है कि वे पूरे राष्ट्र की भावना बन गईं। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर 1962 के युद्ध तक उन्होंने देश को जगाने वाली कविताएँ लिखीं।

उर्वशी को कौन सा बड़ा सम्मान मिला?

1972 का ज्ञानपीठ पुरस्कार उर्वशी के लिए दिनकर को दिया गया। यह पुरुरवा और उर्वशी की कथा पर आधारित काव्य नाटक है।

रश्मिरथी किसके जीवन पर आधारित है?

रश्मिरथी महाभारत के कर्ण पर आधारित खंड काव्य है, जो 1952 में प्रकाशित हुआ। इसमें कर्ण की वीरता, दानशीलता और सामाजिक अपमान के विरुद्ध उसका संघर्ष दिखाया गया है।

संस्कृति के चार अध्याय किस विषय की पुस्तक है?

यह भारतीय संस्कृति के विकास पर लिखा गया इतिहास ग्रंथ है, जो 1956 में आया। इस पर दिनकर को 1959 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।

दिनकर किस गाँव के थे?

बिहार का सिमरिया गाँव उनकी जन्मभूमि है। उस समय यह मुंगेर ज़िले में था, अब बेगूसराय ज़िले में आता है।

ramdhari dinkar ka jivan parichay छोटे में कैसे याद करें?

चार बिंदु याद रखें: 1908 में सिमरिया में जन्म, सब-रजिस्ट्रार से राज्यसभा तक का सफ़र, रश्मिरथी और उर्वशी जैसी रचनाएँ, और 1974 में मद्रास में निधन। ऊपर का परीक्षा उत्तर इन्हीं बिंदुओं पर बना है।